इंटरनेट पर पोर्नोग्राफी कंट्रोल से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, सीजेआई बोले- 'यह नीतिगत मामला, सरकार फैसला ले'

इंटरनेट पर पोर्नोग्राफी कंट्रोल से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, सीजेआई बोले- 'यह नीतिगत मामला, सरकार फैसला ले'

नई दिल्ली: इंटरनेट पर मौजूद अश्लील सामग्री (पोर्नोग्राफी) पर पूर्ण प्रतिबंध और कड़ा नियंत्रण लगाने की मांग वाली एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने से सुप्रीम कोर्ट ने साफ इनकार कर दिया है। देश की शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मुद्दा बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील है, लेकिन यह पूरी तरह से एक नीतिगत (Policy) विषय है, जिस पर फैसला लेने का अधिकार कोर्ट के पास नहीं बल्कि केंद्र सरकार के पास है।

सीजेआई सूर्यकांत की बेंच ने सुनाया अहम फैसला

इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच कर रही थी। सीजेआई ने याचिका का निपटारा करते हुए कहा:

"मुद्दा निश्चित रूप से बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन इस मामले में कानून से जुड़ा ऐसा कोई संवैधानिक सवाल नहीं है, जिस पर अदालत को विचार करने की आवश्यकता हो। यह मामला तकनीकी विशेषज्ञों और खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के अधिकार क्षेत्र में आता है। हमें उम्मीद है कि सरकार इस दिशा में जरूरी कदम उठाएगी।"

अदालत ने याचिकाकर्ता को छूट दी है कि वे अपनी चिंताओं और सुझावों को लेकर सीधे संबंधित सरकारी अधिकारियों और मंत्रालय के पास जा सकते हैं।

नाबालिगों को बचाने के लिए नेशनल पॉलिसी बनाने की थी मांग

यह जनहित याचिका बीएल जैन द्वारा दायर की गई थी, जिनकी तरफ से वकील वरुण ठाकुर ने कोर्ट में पैरवी की। याचिका में मांग की गई थी कि केंद्र सरकार को ऑनलाइन पोर्नोग्राफी को नियंत्रित करने के लिए एक सख्त राष्ट्रीय नीति (National Policy) बनानी चाहिए। याचिकाकर्ता का मुख्य जोर एक ऐसा फूलप्रूफ डिजिटल सिस्टम तैयार करने पर था, जिससे 18 साल से कम उम्र के नाबालिग बच्चे इंटरनेट पर किसी भी तरह की अश्लील सामग्री न देख सकें।

याचिकाकर्ता का तर्क: अश्लील कंटेंट की लत से बढ़ रहे हैं यौन अपराध

अदालत के सामने अपनी दलील रखते हुए याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि आज के डिजिटल युग में इंटरनेट के व्यापक प्रसार के कारण अश्लील सामग्री हर किसी के लिए बेहद आसानी से उपलब्ध हो गई है। इसकी वजह से युवाओं और बच्चों में इसकी खतरनाक लत (Addiction) लग रही है। याचिका में दावा किया गया था कि इंटरनेट पर अश्लील कंटेंट के अत्यधिक उपभोग के कारण ही समाज में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी देखी जा रही है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कोई भी न्यायिक आदेश देने के बजाय नीति निर्धारण का काम पूरी तरह कार्यपालिका पर छोड़ दिया है।