सेमिनार हॉल का वह लाल गद्दा, टूटी ऐनक और आंखों से बहता खून; 36 घंटे की ड्यूटी के बाद दरिंदगी की शिकार डॉक्टर 'अभया' के खौफनाक मंजर

सेमिनार हॉल का वह लाल गद्दा, टूटी ऐनक और आंखों से बहता खून; 36 घंटे की ड्यूटी के बाद दरिंदगी की शिकार डॉक्टर 'अभया' के खौफनाक मंजर

9 अगस्त 2024 की वह काली सुबह आज भी जब याद आती है, तो देश के हर संवेदनशील नागरिक और खासकर दिन-रात अस्पतालों में जिंदगी बचाने वाले डॉक्टरों की रूह कांप उठती है। कोलकाता के 138 साल पुराने प्रतिष्ठित आरजी कर मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के तीसरे माले पर स्थित चेस्ट मेडिसिन विभाग का वह वीरान सेमिनार हॉल केवल एक अपराध का गवाह नहीं था, बल्कि वह उस जर्जर व्यवस्था का आईना बन गया था जहां जान बचाने वाली एक 31 वर्षीय महिला रेजिडेंट डॉक्टर खुद अपनी जान की भीख मांगते-मांगते दम तोड़ गई। 36 घंटे की अमानवीय और थका देने वाली लगातार ड्यूटी के बाद चंद घंटों की नींद तलाशने गई उस होनहार बेटी के साथ जो बर्बरता हुई, उसकी एक-एक तस्वीर ने पूरे भारत की अंतरात्मा को हिलाकर रख दिया था। टूटी हुई ऐनक, फर्श और गद्दे पर बिखरा खून, शरीर पर 25 से अधिक घावों के निशान और फिर मामले को दबाने की संगठित प्रशासनिक साजिश—आरजी कर का वह घाव आज भी इतना ताजा है कि उसकी टीस देश की स्वास्थ्य और सुरक्षा व्यवस्था को लगातार कटघरे में खड़ा करती है।

9 अगस्त की वह खौफनाक रात: 36 घंटे की ड्यूटी और सेमिनार हॉल का लाल गद्दा

उस भयावह रात की कहानी 8 अगस्त की शाम से शुरू होती है। चेस्ट मेडिसिन विभाग की द्वितीय वर्ष की परास्नातक (PGT) छात्रा डॉक्टर रात भर वार्ड में गंभीर मरीजों की तीमारदारी कर रही थीं। अस्पताल में डॉक्टरों के लिए न तो कोई सुरक्षित रेस्ट रूम था, न उचित टॉयलेट की सुविधा और न ही बुनियादी सुरक्षा का कोई पुख्ता इंतजाम। आधी रात के बाद करीब 3 बजे अपने साथियों के साथ खाना खाने के बाद वह बेहद थकी हुई हालत में थोड़ा आराम करने के लिए तीसरे तल पर बने सेमिनार हॉल में चली गईं। वहां लोहे के खांचे पर बिछा एक पुराना लाल-नीला गद्दा ही उनका अस्थायी विश्राम स्थल बना।

सुबह करीब 9:30 बजे जब उनके साथी डॉक्टर उन्हें जगाने और राउंड के लिए बुलाने पहुंचे, तो सामने का नजारा देखकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। पोडियम के पास जमीन पर रखे गद्दे पर उस होनहार डॉक्टर का शव अर्धनग्न और क्षत-विक्षत अवस्था में पड़ा था। चश्मे का शीशा टूटकर चेहरे में धंसा हुआ था, दोनों आंखों से खून बहकर सूख चुका था, होठों, गर्दन और चेहरे पर दांतों से काटने व नोंचने के गहरे जख्म थे। थायरॉयड कार्टिलेज और कॉलर बोन टूटी हुई थी, जो इस बात की चीख-चीखकर गवाही दे रही थी कि दरिंदे ने किस बेरहमी से मुंह दबाकर और गला घोंटकर उसकी सांसों की डोर तोड़ी थी। ऑटोप्सी रिपोर्ट ने बाद में यह साबित किया कि मौत से पहले पीड़िता ने बर्बर यौन हिंसा और अमानवीय शारीरिक प्रताड़ना झेली थी।

सुसाइड की फर्जी थ्योरी और 3 घंटे का इंतजार: सबूत मिटाने का खुला षड्यंत्र

इस जघन्य हत्याकांड के बाद जिस तरह अस्पताल प्रशासन और स्थानीय पुलिस का रवैया सामने आया, उसने पूरे देश के गुस्से में घी डालने का काम किया। सुबह जब पानीहाटी (उत्तर 24 परगना) में रहने वाले डॉक्टर के माता-पिता को अस्पताल से फोन किया गया, तो उन्हें यह नहीं बताया गया कि उनकी बेटी की हत्या हो चुकी है। उन्हें बार-बार फोन करके गुमराह किया गया कि 'आपकी बेटी बहुत बीमार है' और अगले ही फोन में कह दिया गया कि 'उसने आत्महत्या कर ली है।'

जब बिलखते माता-पिता बदहवास हालत में आरजी कर अस्पताल पहुंचे, तो उन्हें तुरंत बेटी का चेहरा तक नहीं देखने दिया गया। अस्पताल के गलियारे में उस बेबस मां-बाप को साढ़े तीन घंटे से अधिक समय तक रोते-बिलखते इंतजार कराया गया। इस दौरान अंदर क्या हो रहा था? तत्कालीन प्रिंसिपल डॉ. संदीप घोष और उनकी कोर टीम पर आरोप लगे कि वे अपराध स्थल (क्राइम सीन) को सुरक्षित करने के बजाय सबूतों को नष्ट करने और कहानी गढ़ने में जुटे थे। बिना किसी पुख्ता पड़ताल के शुरू में इसे 'अस्वाभाविक मौत' दर्ज किया गया और आनन-फानन में पोस्टमार्टम कराकर देर रात भारी पुलिस बल के पहरे में शव का अंतिम संस्कार करवा दिया गया। हद तो तब हो गई जब घटना के कुछ ही दिनों बाद सेमिनार हॉल के ठीक बगल वाले कमरे को 'रेनोवेशन' के नाम पर हथौड़े चलाकर तोड़ना शुरू कर दिया गया, जिससे यह साफ हो गया कि संस्थागत स्तर पर किस कदर सच को दफनाने की कोशिश हो रही थी।

'रिक्लेम द नाइट' और डॉक्टरों का ऐतिहासिक अनशन: जब सड़कों पर उतरा जनसैलाब

आरजी कर की इस नृशंसता ने पश्चिम बंगाल ही नहीं, बल्कि पूरे देश को एक अभूतपूर्व जनांदोलन की आग में झोंक दिया। 14-15 अगस्त 2024 की मध्यरात्रि को, जब देश अपनी आजादी की 78वीं वर्षगांठ मना रहा था, तब कोलकाता की सड़कों पर लाखों की संख्या में महिलाएं, छात्राएं, गृहिणियां और बुजुर्ग हाथों में मोमबत्तियां और मशालें लेकर उतर पड़े। 'रिक्लेम द नाइट' (अपनी रात वापस पाओ) का यह नारा देखते ही देखते वैश्विक आंदोलन बन गया। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु से लेकर लंदन और न्यूयॉर्क तक प्रदर्शन हुए।

इस जनआक्रोश को कुचलने के लिए 14 अगस्त की देर रात आरजी कर अस्पताल में एक अज्ञात उपद्रवी भीड़ ने धावा बोला, इमरजेंसी वार्ड में तोड़फोड़ की और सेमिनार हॉल की तरफ बढ़ने की कोशिश की, जिससे साफ था कि किसी भी कीमत पर डिजिटल और भौतिक साक्ष्यों को मिटाने की साजिश रची जा रही थी। इसके बावजूद जूनियर डॉक्टरों का हौसला नहीं टूटा। 'वेस्ट बंगाल जूनियर डॉक्टर्स फ्रंट' (WBJDF) के बैनर तले युवा डॉक्टरों ने काम बंद कर दिया और आमरण अनशन पर बैठ गए। 17 दिनों तक चले इस भूख हड़ताल ने सरकार की चूलें हिला दीं और स्वास्थ्य तंत्र के भीतर पनप रहे 'थ्रेट सिंडिकेट' (धमकी तंत्र) को बेनकाब कर दिया।

हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक: सीबीआई जांच और संदीप घोष की गिरफ्तारी

राज्य पुलिस की संदिग्ध भूमिका और जनता के अविश्वास को देखते हुए 13 अगस्त 2024 को कलकत्ता हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक आदेश पारित करते हुए जांच कोलकाता पुलिस से छीनकर केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंप दी। सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने मामले का स्वतः संज्ञान लिया। सुप्रीम कोर्ट ने जांच की दिशा, क्राइम सीन पर हुई छेड़छाड़ और एफआईआर दर्ज करने में हुई 14 घंटे की देरी पर बंगाल सरकार और पुलिस को कड़ी फटकार लगाई।

अदालत की निगरानी में जब सीबीआई ने शिकंजा कसा, तो आरजी कर मेडिकल कॉलेज में चल रहे वित्तीय भ्रष्टाचार, अवैध टेंडर, बायोमेडिकल कचरे की तस्करी और दवाओं के सिंडिकेट की परतें खुलने लगीं। सीबीआई ने पूर्व प्रिंसिपल डॉ. संदीप घोष को वित्तीय घपलों के साथ-साथ सबूतों से छेड़छाड़ और हत्या के मामले में साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। इसके साथ ही टाला थाने के तत्कालीन थाना प्रभारी (OC) अभिजीत मंडल को भी ड्यूटी में घोर लापरवाही और सबूत नष्ट करने की साजिश के तहत सलाखों के पीछे भेज दिया गया।

संजय रॉय पर चार्जशीट, लेकिन अनसुलझे सवाल: क्या एक ही दरिंदा था?

कोलकाता पुलिस ने घटना के 24 घंटे के भीतर सीसीटीवी फुटेज और सेमिनार हॉल से मिले एक टूटे हुए ब्लूटूथ हेडसेट के आधार पर कोलकाता पुलिस के एक सिविक वॉलंटियर संजय रॉय को मुख्य आरोपी के रूप में गिरफ्तार किया था। संजय रॉय, जो पुलिस बैरक में रहता था और अस्पताल के हर कोने में बेरोकटोक आता-जाता था, एक विकृत और हिंसक पृष्ठभूमि का व्यक्ति निकला। सीबीआई ने सियालदह कोर्ट में दाखिल अपनी मुख्य चार्जशीट में संजय रॉय को ही बलात्कार और हत्या का एकमात्र प्राथमिक आरोपी बनाया।

हालांकि, पीड़िता के परिवार, आंदोलनकारी डॉक्टरों और देश के बड़े तबके के मन में आज भी कई गंभीर सवाल अनुत्तरित हैं। क्या 36 घंटे की ड्यूटी से थकी 5 फीट से अधिक लंबी, स्वस्थ महिला डॉक्टर के साथ इतनी भयानक और घातक दरिंदगी केवल एक व्यक्ति अकेले कर सकता था? क्या क्राइम सीन पर मौजूद अन्य लोगों की भूमिका की पूरी तरह निष्पक्ष जांच हुई? जिस तेजी से उस सुबह सेमिनार हॉल में संदिग्ध लोगों की आवाजाही हुई और जिस तरह रेनोवेशन का खेल रचा गया, उसने इस आशंका को हमेशा जीवित रखा कि संजय रॉय तो केवल एक मोहरा था, जबकि असली चेहरे उस 'मेडिकल माफिया' के पीछे छिपे रह गए जो उस अस्पताल को अपनी जागीर समझकर चला रहे थे।

व्यवस्था पर अब भी एक बड़ा सवाल: क्या सुरक्षित हैं हमारे कार्यस्थल?

आरजी कर की घटना को बीते समय हो चुका है, अदालतों में सुनवाई चल रही है और नेशनल टास्क फोर्स (NTF) ने देश के अस्पतालों में डॉक्टरों की सुरक्षा को लेकर कई सिफारिशें भी की हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या आज भी सरकारी मेडिकल कॉलेजों में आधी रात को ड्यूटी करने वाली महिला रेजिडेंट डॉक्टरों को सुरक्षित माहौल मिल पाया है?

'अभया' की वह टूटी हुई ऐनक और लाल गद्दे पर फैला खून केवल एक बेटी की मौत का साक्ष्य नहीं है, बल्कि वह हमारे समाज, लचर कानून-व्यवस्था और भ्रष्ट संस्थागत ढांचे के माथे पर लगा वह बदनुमा दाग है जिसे कोई भी लीपापोती मिटा नहीं सकती। आरजी कर का यह मामला देश के हर नागरिक को हमेशा यह याद दिलाता रहेगा कि जब तक समाज में महिलाओं के लिए रातें सुरक्षित नहीं होंगी और कार्यस्थलों पर व्यवस्थाएं पारदर्शी नहीं बनेंगी, तब तक किसी भी बेटी के लिए सच्ची आजादी और सुरक्षा केवल एक खोखला दावा बनकर रह जाएगी।