INDIA गठबंधन में लंच डिप्लोमेसी पर क्यों मचा सियासी घमासान: धरना साथ, पर भोज से अखिलेश और सपा की दूरी की

INDIA गठबंधन में लंच डिप्लोमेसी पर क्यों मचा सियासी घमासान: धरना साथ, पर भोज से अखिलेश और सपा की दूरी की

दिल्ली की सड़कों पर चुनाव आयोग और 'वोट चोरी' के मुद्दों को लेकर विपक्ष के साझा प्रदर्शन के दौरान एक दिलचस्प सियासी तस्वीर सामने आई। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने न केवल एक साथ मार्च निकाला, बल्कि दोनों नेताओं ने हिरासत में लिए जाने तक संयुक्त रूप से आक्रामकता दिखाई। हालांकि, इस एकजुटता के ठीक अगले दिन कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे द्वारा दिल्ली के जनपथ स्थित एक दक्षिण भारतीय रेस्टोरेंट में आयोजित 'लंच' और उसके बाद जंतर-मंतर की ओर बढ़े विपक्षी मार्च से अखिलेश यादव और सपा का एक भी सांसद नजर नहीं आया। इस दूरी ने तुरंत राजनीतिक गलियारों में सवाल खड़े कर दिए कि क्या गठबंधन के भीतर सब कुछ ठीक है या यह किसी गहरी नाराजगी का संकेत है।

कांग्रेस की दलील: देर रात लिया गया फैसला और सांसदों की रवानगी

सपा सांसदों की गैरमौजूदगी पर सवाल उठते ही कांग्रेस की तरफ से औपचारिक सफाई सामने आई। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने स्थिति को संभालते हुए स्पष्ट किया कि इस भोज का निर्णय बहुत देर रात लिया गया था और उसी समय अन्य सहयोगी दलों को सूचना भेजी गई थी। कांग्रेस के अनुसार, मंगलवार के विरोध प्रदर्शन के बाद सपा के कई सांसद अपने-अपने संसदीय क्षेत्रों के लिए रवाना हो चुके थे और अखिलेश यादव खुद मंगलवार रात ही लखनऊ लौट आए थे। कांग्रेस ने इसे किसी भी तरह के राजनीतिक मनमुटाव या गठबंधन में दरार के रूप में देखने से साफ इनकार किया और कहा कि विपक्ष वोट चोरी, एसआईआर और परिसीमन के खिलाफ पूरी मजबूती से एकजुट है।

सपा का पक्ष: देर से मिला न्योता और क्रेडिट पॉलिटिक्स की खींचतान

समाजवादी पार्टी के खेमे से आ रही प्रतिक्रियाएं केवल यात्रा या व्यस्तता तक सीमित नहीं हैं। सपा नेताओं का कहना है कि उन्हें लंच का निमंत्रण या तो बहुत देर से मिला या समय रहते स्पष्ट निर्देश नहीं दिए गए, जिससे दिल्ली में मौजूद सांसद भी शामिल नहीं हो सके। इसके साथ ही अंदरखाने यह चर्चा भी तेज है कि साझा प्रदर्शन के दौरान सारा मीडिया फुटेज और राजनीतिक क्रेडिट कांग्रेस और गांधी परिवार के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गया। सपा नेताओं का मानना है कि उत्तर प्रदेश में जिस जमीन और प्रभाव के दम पर गठबंधन टिका है, वहां लड़ाई की मुख्य धुरी समाजवादी पार्टी है, लेकिन दिल्ली में कांग्रेस इसे पूरी तरह अपनी 'गुरिल्ला पॉलिटिक्स' और नेतृत्व का मंच बनाने की कोशिश कर रही थी।

यूपी चुनाव 2027 और राजनीतिक स्पेस की जमीनी लड़ाई

इस घटनाक्रम का सीधा तार उत्तर प्रदेश की आगामी सियासी बिसात से जुड़ा हुआ है। 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव को लेकर समाजवादी पार्टी अपने मजबूत कैडर और आधार के बूते खुद को बड़े भाई की भूमिका में मानती है, जबकि कांग्रेस अपने बढ़े हुए जनाधार के सहारे अधिक सीटों और राजनीतिक स्पेस की मांग पर जोर दे रही है। कांग्रेस के कुछ प्रदेश स्तरीय नेताओं के हालिया आक्रामक बयानों से भी सपा आलाकमान असहज बताया जा रहा है। ऐसे में लंच से दूरी बनाकर अखिलेश यादव ने संभवतः यह सूक्ष्म कूटनीतिक संदेश दिया है कि सपा को किसी के पीछे चलने वाली पार्टी के बजाय बराबरी के साझेदार के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।

'लंच पर न सही, चाय-समोसे पर मिलेंगे': अखिलेश का सधा हुआ रुख

मामले के तूल पकड़ने पर अखिलेश यादव ने बेहद सधे हुए अंदाज में प्रतिक्रिया देकर तनाव को ज्यादा बढ़ने नहीं दिया। उन्होंने लखनऊ में इसे गठबंधन की निरंतर चलने वाली कूटनीति बताते हुए कहा कि यह सब केवल एक लंच तक सीमित नहीं है; आगे बैठकों का दौर जारी रहेगा और नेता चाय-समोसे पर भी एक साथ बैठेंगे। भले ही दोनों दलों के शीर्ष नेताओं ने सार्वजनिक तौर पर एकजुटता का दावा किया हो, लेकिन लंच की यह गैरहाजिरी यह साफ दर्शाती है कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ खड़े होने के बावजूद, राज्यों के स्तर पर अपना वर्चस्व और अस्तित्व बचाए रखने की खींचतान अभी खत्म नहीं हुई है।