सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध थाली में रखें ये 5 दिव्य भोग, पितृ दोष से तुरंत मिलेगी राहत
पितृपक्ष की विदाई वेला यानी सर्वपितृ अमावस्या वह पावन दिन है जब सभी ज्ञात-अज्ञात पितृ अपने लोक लौटने से पूर्व परिजनों के द्वार पर अन्न और जल की अभिलाषा लेकर आते हैं। गरुड़ पुराण और मत्स्य पुराण के अनुसार, मृत्यु के उपरांत जीवात्मा स्थूल भोजन ग्रहण नहीं करती, बल्कि भोजन की सुगंध, पवित्र भाव और उसमें प्रयुक्त सात्विक तत्वों के सूक्ष्म अंश से तृप्त होती है। यदि पूरे पितृपक्ष के दौरान आप अपने पूर्वजों की तिथि पर श्राद्ध न कर पाए हों, तो केवल सर्वपितृ अमावस्या के दिन विधि-विधान से तैयार की गई एक थाली समस्त पितरों को परम शांति प्रदान कर सकती है। श्राद्ध की थाली में शास्त्रों द्वारा अनुमोदित विशेष खाद्य पदार्थों का होना अनिवार्य माना गया है, क्योंकि यही तत्व पितरों के ताप को शांत कर उन्हें तृप्त करते हैं और कुंडली में मौजूद भारी पितृ दोष को समाप्त कर वंश में सुख-समृद्धि का मार्ग खोलते हैं।
गाय के दूध और चावल की खीर: पितरों का सर्वप्रिय अमृत भोग
श्राद्ध की थाली में सबसे अनिवार्य और मुख्य व्यंजन गाय के ताजे दूध से बनी चावल की खीर को माना गया है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि चंद्रमा का कारक होने के कारण चावल और अमृत तुल्य गौ-दुग्ध का सम्मिश्रण पितृलोक तक शीतलता पहुंचाता है। इस खीर को बनाते समय ध्यान रखना चाहिए कि इसमें मिट्टी या तांबे-पीतल के पात्र का उपयोग हो और चीनी के स्थान पर देसी खांड या मिश्री डाली जाए। जब इस खीर का भोग पितरों को समर्पित किया जाता है, तो पूर्वजों की अग्नि शांत होती है और वे तृप्त होकर परिवार को दीर्घायु, निरोगी काया और अखंड धन-धान्य का आशीर्वाद देते हैं। बिना खीर के परोसी गई श्राद्ध की थाली को शास्त्र अधूरा और निष्फल मानते हैं।
उड़द की दाल के बड़े और पूरी: नकारात्मक ऊर्जा के शमन का अचूक विधान
श्राद्ध के पावन भोजन में शुद्ध घी में तली हुई पूरियां और उड़द की दाल से बने वड़े (बड़ा) अवश्य शामिल किए जाने चाहिए। उड़द की दाल का संबंध यमराज और पितरों से माना गया है, जो तामसिक प्रवृत्तियों और अदृश्य बाधाओं को दूर करने की अद्भुत क्षमता रखती है। उड़द के दाल की कचौड़ी या वड़े बनाते समय उसमें हींग और जीरे का छौंक लगाया जाता है, किंतु लहसुन या प्याज का लेशमात्र भी प्रयोग पूरी तरह वर्जित रहता है। यह व्यंजन पितरों को तृप्ति देने के साथ-साथ परिवार पर मंडरा रहे दुर्भाग्य और अचानक आने वाले संकटों को टालने में ढाल की तरह काम करता है।
अरबी और कद्दू (काशीफल) की सात्विक सब्जी: शास्त्रों में वर्णित अनिवार्य व्यंजन
पितरों के भोजन में सब्जियों के चयन को लेकर अत्यंत कड़े नियम बनाए गए हैं। श्राद्ध की थाली में अरबी (घुइयां) और पीले कद्दू (काशीफल/कोहड़ा) की सब्जी का होना परम आवश्यक माना जाता है। गरुड़ पुराण में स्पष्ट निर्देश है कि श्राद्ध के दिन जमीन के नीचे उगने वाले कुछ कंदों में अरबी पितरों को अत्यंत प्रिय होती है, जबकि कद्दू को सात्विक और शांति प्रदायक माना गया है। इस दिन बैंगन, गाजर, मूली, परवल, लहसुन, प्याज या ज्यादा तीखे मसालों का इस्तेमाल पूर्णतः वर्जित है। केवल सेंधा नमक या सादे नमक, हरी मिर्च, अदरक और शुद्ध घी में तैयार की गई अरबी व कद्दू की सब्जी ही पितरों को समर्पित की जानी चाहिए।
काले तिल और जौ का जल-अक्षत युक्त स्पर्श: तर्पण का मुख्य आधार
भोजन की थाली परोसते समय उसके प्रत्येक अन्न भाग पर काले तिल और जौ के दाने छिड़कने का विशेष विधान है। काले तिल साक्षात भगवान विष्णु के पसीने से उत्पन्न माने गए हैं, जो पितरों को प्रेत योनि के कष्टों से मुक्त कराकर देवलोक की यात्रा सुगम बनाते हैं। बिना काले तिल के पितृ किसी भी भोजन को स्वीकार नहीं करते। इसके अतिरिक्त थाली के साथ एक पात्र में शुद्ध जल, थोड़ी गंगाजल की बूंदें और कुशा का तिनका अवश्य रखें, ताकि भोजन के उपरांत पितृ तृप्त होकर आचमन कर सकें। इस सात्विक स्पर्श से भोजन सीधे पितरों की चेतना तक पहुंचता है और जन्मकुंडली के कालसर्प व पितृ दोष के प्रभाव को शून्य कर देता है।
पंचबलि भोग और परोसने के कड़े नियम जिनका पालन है जरूरी
श्राद्ध की थाली तैयार करने के बाद सबसे पहले भोजन को स्वयं ग्रहण नहीं करना चाहिए और न ही केवल ब्राह्मण को सीधे खिलाना चाहिए। थाली से पांच छोटे-छोटे हिस्से निकालकर 'पंचबलि' का विधान पूरा करना अनिवार्य है, जिसमें पहला भाग गौमाता (गाय), दूसरा श्वान (कुत्ता), तीसरा काक (कौआ), चौथा देवादि (अग्नि में आहुति) और पांचवां पिपीलिका (चींटियों) के लिए निकाला जाता है। इसके पश्चात ही ब्राह्मण या किसी सुयोग्य सात्विक व्यक्ति को आदरपूर्वक उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करवाकर भोजन कराएं। भोजन परोसते समय दोनों हाथों का उपयोग करें और मन में केवल श्रद्धा व कृतज्ञता का भाव रखें; क्रोध या जल्दबाजी में परोसा गया भोजन पितरों को स्वीकार नहीं होता।