लाव-लश्कर के साथ दिल्ली आएंगे शी जिनपिंग: 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत-चीन रिश्तों पर नया दांव
राजधानी नई दिल्ली 12 और 13 सितंबर को 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन की मेजबानी के लिए पूरी तरह तैयार है। इस वैश्विक कूटनीतिक महामंथन में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग एक बड़े और उच्चस्तरीय कारोबारी प्रतिनिधिमंडल (लाव-लश्कर) के साथ भारत पहुंच रहे हैं। 2020 में गलवान घाटी संघर्ष के बाद दोनों देशों के बीच बने तनावपूर्ण माहौल के बीच शी जिनपिंग का यह दिल्ली दौरा द्विपक्षीय संबंधों और विशेषकर आर्थिक-व्यापारिक रिश्तों के लिहाज से बेहद निर्णायक माना जा रहा है।
सम्मेलन के इतर भारत और चीन के शीर्ष नेतृत्व के बीच आर्थिक प्राथमिकताओं, सीमा पार व्यापार और दोनों देशों के बीच जारी कारोबारी असंतुलन को लेकर गहन बातचीत की उम्मीद है। भारत इस मंच का उपयोग चीनी प्रतिबंधों के चलते घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को हो रहे नुकसान को उठाने और आपूर्ति श्रृंखला में समान अधिकार (पारस्परिकता) की मांग करने के लिए करने जा रहा है।
भारत उठाएगा हाईटेक सामान और अहम टेक्नोलॉजी पर चीनी पाबंदियों का मुद्दा
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के चीन डेस्क ने भारतीय उद्योग परिसंघों के साथ विचार-विमर्श कर उन प्रमुख टेक्नोलॉजी और कंपोनेंट्स की सूची तैयार की है, जिन पर चीनी कस्टम्स ने पिछले 12 से 15 महीनों में कड़े निर्यात प्रतिबंध (Export Restrictions) लगाए हैं।
सरकारी और उद्योग विशेषज्ञों के मुताबिक, इन प्रतिबंधों के चलते भारत में सोलर और रिन्यूएबल एनर्जी से जुड़े 'बैकवर्ड इंटीग्रेशन' और घरेलू विनिर्माण क्षमता को गहरा झटका लग रहा है। भारत मुख्य रूप से इन चार प्रमुख तकनीकों पर लगी पाबंदियों को हटाने का दबाव बनाएगा:
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इंगट और वेफर टेक्नोलॉजी (Ingot & Wafer Tech): सोलर सेल और पैनल निर्माण का सबसे बुनियादी आधार।
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बैटरी सेल व स्टोरेज टेक्नोलॉजी: इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) और ग्रिड स्टोरेज के लिए अनिवार्य कंपोनेंट।
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हाई वोल्टेज डायरेक्ट करंट (HVDC) उपकरण: लंबी दूरी तक बिजली पारेषण और ग्रीन एनर्जी को मुख्य ग्रिड से जोड़ने के लिए जरूरी तकनीक, जिससे पारेषण के दौरान बिजली की बर्बादी न्यूनतम होती है।
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विशेष ट्रांसमिशन कंपोनेंट्स: पावर ग्रिड की स्थिरता और सुरक्षा बनाए रखने वाले महत्वपूर्ण पुर्जे।
भारतीय वार्ताकार इस बात पर जोर देंगे कि यदि चीन भारत के विशाल बाजार में अपने उत्पादों की पहुंच चाहता है, तो उसे भारत की आपूर्ति श्रृंखला को बाधित करने वाली इन गैर-पारदर्शी अड़चनों को तुरंत खत्म करना होगा।
व्यापार में नरमी के संकेत: चीन को भारतीय निर्यात में 28% का उछाल
सख्त रणनीतिक रुख के बावजूद हाल के महीनों में भारत-चीन व्यापारिक रिश्तों में कई सकारात्मक और व्यावहारिक बदलाव भी देखे गए हैं:
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निर्यात में तेज वृद्धि: आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में भारत से चीन को होने वाला निर्यात 28 प्रतिशत से अधिक बढ़कर 5.55 अरब डॉलर तक पहुंच गया। अमेरिकी टैरिफ से भारतीय सीफूड व समुद्री उत्पादों के निर्यात को जो झटका लगा था, चीनी बाजार ने उसे काफी हद तक संभाल लिया।
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बिजली क्षेत्र में नियमों में ढील: अमेरिकी टैरिफ की अनिश्चितता के बीच भारत सरकार ने सरकारी कंपनी बीएचईएल (BHEL) को चीन से 21 महत्वपूर्ण वस्तुओं की 5 साल तक खरीद की अनुमति दी है।
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4 चीनी कंपनियों को टेंडर छूट: जून में वित्त मंत्रालय ने भारत में विनिर्माण संयंत्र रखने वाली चार प्रमुख चीनी बिजली उपकरण कंपनियों (TBEA एनर्जी, नानजिंग इलेक्ट्रिक इंडिया, न्यू नॉर्थईस्ट इलेक्ट्रिक इंडिया और ताइकाई इलेक्ट्रिक इंडिया) को सरकारी खरीद नियमों के कड़े सुरक्षा प्रावधानों से छूट देते हुए टेंडरों में भाग लेने की मंजूरी दे दी।
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सीमा व्यापार और सीधी उड़ानें: नाथू ला दर्रे से सीमा व्यापार की बहाली, दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानों को फिर से शुरू करने की तैयारी और लैंड बॉर्डर साझा करने वाले देशों से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के नियमों का सरलीकरण दोनों पक्षों के बीच नरमी के स्पष्ट संकेत हैं।
कूटनीतिक बैकग्राउंड: राजदूत शू फेइहोंग से पीयूष गोयल तक बैठकों का दौर
नई दिल्ली ब्रिक्स समिट की यह बातचीत अचानक नहीं हो रही है, बल्कि इसकी पृष्ठभूमि पिछले कुछ महीनों से तैयार की जा रही थी:
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भारत में चीनी राजदूत शू फेइहोंग ने 1 सितंबर को वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल से औपचारिक मुलाकात कर आर्थिक सहयोग और पीपुल-टू-पीपुल संपर्क बढ़ाने पर सहमति जताई थी।
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इससे पहले अप्रैल में कैमरून में डब्ल्यूटीओ (WTO) की मंत्रिस्तरीय बैठक के दौरान केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल और चीनी वाणिज्य मंत्री वांग वेंटाओ के बीच 2019 के आरसीईपी (RCEP) समझौते से बाहर होने के बाद पहली द्विपक्षीय व्यापार वार्ता हुई थी।
2020 के कड़े सुरक्षा प्रतिबंधों के बीच 'पारस्परिकता' का नया संतुलन
2020 में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर हुए तनाव के बाद भारत ने 'प्रेस नोट 3' के तहत जमीनी सीमा साझा करने वाले देशों से आने वाले निवेश और कंपनियों के लिए गृह और विदेश मंत्रालय की सुरक्षा क्लीयरेंस अनिवार्य कर दी थी।
अब ब्रिक्स 2026 के मंच पर भारत राष्ट्रीय सुरक्षा से कोई समझौता किए बिना व्यापारिक व्यावहारिकताओं (Economic Pragmatism) पर आगे बढ़ने की नीति अपना रहा है। भारत का साफ संदेश होगा कि आर्थिक साझेदारी एकतरफा नहीं चल सकती—यदि चीन भारतीय बाजार का लाभ लेना चाहता है, तो उसे अपनी सीमाओं के भीतर भारतीय फार्मा, आईटी और कृषि उत्पादों को भी खुला और बाधा-मुक्त बाजार उपलब्ध कराना होगा।