900 मंदिरों वाला अनोखा पर्वत: जानिए सूर्यास्त होते ही क्यों पूरी तरह खाली हो जाती है गुजरात की पवित्र शत्रुंजय पहाड़ी?

900 मंदिरों वाला अनोखा पर्वत: जानिए सूर्यास्त होते ही क्यों पूरी तरह खाली हो जाती है गुजरात की पवित्र शत्रुंजय पहाड़ी?

भारत की पावन भूमि पर कई ऐसे तीर्थ और ऐतिहासिक स्थल मौजूद हैं, जिनकी भव्यता और आध्यात्मिक नियम पूरी दुनिया को हैरान कर देते हैं। आमतौर पर पहाड़ों का जिक्र होते ही हसीन वादियां, ठंडी हवाएं और प्राकृतिक दृश्य आंखों के सामने आते हैं। लेकिन गुजरात के भावनगर जिले में स्थित पालीताना की शत्रुंजय पहाड़ी दुनिया भर में अपने अनोखे धार्मिक स्वरूप के लिए विख्यात है। यह दुनिया का एकमात्र ऐसा पर्वत है, जिसके शिखर और ढलानों पर 900 से अधिक भव्य, नक्काशीदार जैन मंदिर स्थापित हैं। इस पवित्र पर्वत की सबसे विस्मयकारी और अटूट परंपरा यह है कि जैसे ही शाम ढलती है और सूरज क्षितिज में समाता है, पूरी पहाड़ी पूरी तरह से खाली हो जाती है। रात के सन्नाटे में यहां न तो कोई श्रद्धालु रुक सकता है और न ही मंदिरों का कोई पुजारी।

शत्रुंजय पर्वत: दुनिया का एकमात्र ऐसा पहाड़ जहां बसे हैं 900 से ज्यादा मंदिर

गुजरात के भावनगर शहर से लगभग 51 किलोमीटर की दूरी पर पालीताना नगर बसा हुआ है। इसी नगर के आंचल में स्थित है शत्रुंजय पर्वत, जिसे जैन धर्म में 'तीर्थराज' यानी तीर्थों का राजा कहा जाता है। इस पहाड़ी पर 900 से अधिक छोटे-बड़े मंदिरों का एक विशाल संकुल (Tuks) बना हुआ है। सफेद और मखमली संगमरमर से तराशे गए ये मंदिर सदियों पुरानी भारतीय स्थापत्य कला का बेजोड़ उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

जब सूर्य की पहली किरणें इन शिखरों पर पड़ती हैं, तो पूरा पर्वत सफेद मोतियों की तरह चमक उठता है। इन 900 मंदिरों का निर्माण किसी एक राजा या कालखंड में नहीं हुआ, बल्कि 11वीं शताब्दी से लेकर 19वीं शताब्दी के बीच अलग-अलग पीढ़ियों के दानवीरों, राजाओं और श्रावकों ने अपनी अगाध आस्था से इन देवालयों का निर्माण कराया। हर मंदिर की नक्काशी, खंभों की बनावट और गुंबदों का सौंदर्य देखने वाले को मंत्रमुग्ध कर देता है।

सूर्यास्त के बाद पहाड़ी खाली होने का धार्मिक रहस्य: देवताओं का निवास स्थान

शत्रुंजय पहाड़ी पर सदियों से एक कठोर नियम का पालन किया जा रहा है। सूर्यास्त होते ही पर्वत के मुख्य प्रवेश द्वार बंद कर दिए जाते हैं और वहां मौजूद हर इंसान को नीचे उतरना अनिवार्य होता है। इस नियम के पीछे गहरी धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं:

  • देवताओं का विचरण और विश्राम: जैन पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, शत्रुंजय पर्वत अत्यंत पावन और सिद्ध भूमि है। ऐसी मान्यता है कि सूर्यास्त के बाद यह संपूर्ण पर्वत देवी-देवताओं, यक्षों और गंधर्वों के विचरण तथा ध्यान के लिए समर्पित हो जाता है। रात के समय अलौकिक शक्तियां तीर्थंकरों की वंदना करने पर्वत पर उतरती हैं। मनुष्यों की उपस्थिति से इस दैवीय वातावरण और तपोभूमि की पवित्रता में विघ्न न पड़े, इसलिए इंसानों का रात्रि विश्राम यहां पूर्णतः वर्जित है।

  • अहिंसा के सिद्धांत का सर्वोच्च पालन: जैन धर्म का मूल आधार 'अहिंसा परमो धर्म:' है। सूर्यास्त के बाद अंधकार होने पर पहाड़ी रास्तों, जंगलों और पत्थरों पर कई प्रकार के सूक्ष्म कीट-पतंगे और रात्रिचर जीव बाहर निकलते हैं। अंधेरे में अनजाने में किसी भी जीव की हत्या न हो या पैरों तले कोई जीव न दब जाए, इसलिए रात में चलना और वहां रुकना शास्त्र सम्मत नहीं माना गया है।

  • भोजन और रात्रि विश्राम पर निषेध: जैन परंपरा में 'चौविहार' यानी सूर्यास्त के बाद अन्न-जल ग्रहण न करने का नियम है। पर्वत के ऊपर चूल्हा जलाना, भोजन पकाना, खाना अथवा सोना तीर्थ की मर्यादा के विरुद्ध माना जाता है। इसी कारण संध्या आरती के पश्चात मुख्य पुजारियों सहित सुरक्षा दल भी तलहटी में वापस लौट आता है।

भगवान आदिनाथ से जुड़ा पावन इतिहास और रायन पेड़ की महत्ता

शत्रुंजय पर्वत जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (जिन्हें आदिनाथ के नाम से भी जाना जाता है) की मुख्य तपोस्थली रहा है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, भगवान आदिनाथ ने अपने जीवनकाल में अनगिनत बार इस पावन पर्वत की यात्रा की थी। उन्होंने पहाड़ी की चोटी पर स्थित 'रायन' (खिरनी) के वृक्ष के नीचे बैठकर कठोर तपस्या की थी और लोक कल्याण के लिए अपना प्रथम उपदेश (देशना) भी इसी भूमि पर दिया था।

आज भी मुख्य मंदिर परिसर में भगवान आदिनाथ के पवित्र चरण चिह्न और वह ऐतिहासिक रायन वृक्ष श्रद्धालुओं की असीम आस्था का केंद्र है। जैन मान्यता यह भी कहती है कि 24 तीर्थंकरों में से भगवान नेमिनाथ को छोड़कर शेष 23 तीर्थंकरों ने किसी न किसी समय शत्रुंजय तीर्थ की वंदना अवश्य की थी। यही कारण है कि जैन धर्मावलंबी अपने जीवन में कम से कम एक बार पालीताना की यात्रा करना परम सौभाग्य मानते हैं।

3800 से अधिक सीढ़ियों की कठिन चढ़ाई और तीर्थयात्रा का आध्यात्मिक अनुभव

शत्रुंजय शिखर पर स्थित मुख्य मंदिर तक पहुंचना किसी कठिन तपस्या से कम नहीं है। तलहटी (पर्वत का निचला हिस्सा) से लेकर शिखर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को करीब 3,750 से 3,800 से अधिक खड़ी पत्थर की सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। यह मार्ग लगभग 3.5 से 4 किलोमीटर लंबा है।

  • कड़े नियमों का पालन: इस यात्रा को शुरू करने से पहले श्रद्धालु शुद्ध श्वेत वस्त्र धारण करते हैं। चढ़ाई के दौरान चमड़े की वस्तुएं (बेल्ट, पर्स, जूते) ले जाना पूरी तरह से प्रतिबंधित होता है।

  • डोली की व्यवस्था: बुजुर्गों, दिव्यांगों और बच्चों के लिए तलहटी में पारंपरिक डोली (पालकी) की सुविधा उपलब्ध रहती है, जिसे स्थानीय कहार कंधों पर उठाकर ऊपर ले जाते हैं।

  • कार्तिक पूर्णिमा का महापर्व: हर वर्ष कार्तिक पूर्णिमा (नवंबर-दिसंबर) और फाल्गुन सुद तेरस पर यहां 'छह गाऊ फेरी' की विशाल परिक्रमा होती है, जिसमें देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पर्वत की लगभग 20 किलोमीटर लंबी कठिन पैदल परिक्रमा पूरी करते हैं।

पालीताना: दुनिया का पहला कानूनी रूप से शाकाहारी शहर

शत्रुंजय पर्वत की पवित्रता का प्रभाव पूरे पालीताना शहर पर देखा जा सकता है। वर्ष 2014 में गुजरात सरकार ने जैन मुनियों के अनशन और अहिंसा के सिद्धांतों का सम्मान करते हुए पालीताना को विश्व का पहला आधिकारिक तौर पर 'शाकाहारी शहर' (Vegetarian City) घोषित किया था। यहां मांस-मच्छी की बिक्री, पशु वध और मांसाहार पर कानूनी प्रतिबंध लागू है, जो इस स्थान को वैश्विक पटल पर और भी विशिष्ट बनाता है।

पालीताना कैसे पहुंचें और यात्रा का सर्वोत्तम समय

  • वायु मार्ग: सबसे नजदीकी हवाई अड्डा भावनगर (लगभग 51 किमी) और अहमदाबाद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (लगभग 215 किमी) है।

  • रेल मार्ग: पालीताना का अपना रेलवे स्टेशन है, जो भावनगर, अहमदाबाद और मुंबई से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।

  • सड़क मार्ग: गुजरात राज्य परिवहन निगम की बसें और निजी टैक्सियां अहमदाबाद, वडोदरा, सूरत और राजकोट से पालीताना के लिए आसानी से उपलब्ध हैं।

  • यात्रा का सबसे अच्छा समय: अक्टूबर से मार्च के बीच का मौसम यहां की चढ़ाई के लिए सबसे अनुकूल माना जाता है, क्योंकि गर्मियों में दोपहर की तेज धूप में सीढ़ियां अत्यधिक गर्म हो जाती हैं।

शत्रुंजय पर्वत केवल पत्थरों और नक्काशीदार मंदिरों का एक समूह नहीं है, बल्कि यह सनातन और जैन संस्कृति के त्याग, तपस्या, अहिंसा और आध्यात्मिक अनुशासन का जीवंत प्रतीक है। शाम ढलते ही सन्नाटे की चादर ओढ़ लेने वाली यह पहाड़ी मनुष्य को यह सिखाती है कि आस्था के सामने नियमों और प्रकृति की मर्यादा का पालन करना ही सच्ची भक्ति है।

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