27 साल बाद रक्षाबंधन पर बन रहा दुर्लभ महासंयोग! भद्रा के साए से मुक्त रहेगा पावन पर्व; जानिए राखी बांधने का सबसे सटीक शुभ मुहूर्त
सनातन धर्म में भाई-बहन के अटूट विश्वास, असीम स्नेह और रक्षा के संकल्प का प्रतीक पावन पर्व 'रक्षाबंधन' इस वर्ष ज्योतिषीय दृष्टिकोण से अत्यंत दुर्लभ और मंगलकारी होने जा रहा है। वैदिक पंचांग और खगोलीय गणनाओं के अनुसार, श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि पर पूरे 27 वर्षों बाद एक साथ कई विशिष्ट शुभ योगों का निर्माण हो रहा है। ज्योतिष शास्त्रियों के मुताबिक, इस दिन 'सर्वार्थ सिद्धि योग', 'रवि योग', 'शोभन योग' के साथ-साथ सूर्य और बुध की युति से बनने वाला शक्तिशाली 'बुधादित्य राजयोग' सक्रिय रहेगा। इसके साथ ही, रक्षाबंधन का पर्व इस बार अपने मूल नक्षत्र यानी 'श्रवण नक्षत्र' के शुभ प्रभाव में मनाया जाएगा, जो इस दिन की आध्यात्मिक और धार्मिक ऊर्जा को कई गुना बढ़ा देता है।
ग्रह-नक्षत्रों का ऐसा दुर्लभ मेल 27 वर्ष पूर्व देखने को मिला था। इन महासंयोगों में रक्षा सूत्र (राखी) बांधने से न केवल भाई-बहन के रिश्ते में आपसी प्रेम, विश्वास और सौहार्द में अपार वृद्धि होती है, बल्कि भाई के जीवन में आने वाले संकट, नकारात्मक ऊर्जा, रोग और आर्थिक बाधाएं भी हमेशा के लिए समाप्त हो जाती हैं।
राखी बांधने का सबसे सटीक शुभ मुहूर्त और भद्रा का प्रभाव
शास्त्रों में स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि रक्षाबंधन का पावन पर्व कभी भी 'भद्रा काल' में नहीं मनाया जाना चाहिए। पौराणिक मान्यता है कि रावण की बहन शूर्पणखा ने रावण को भद्रा काल में ही रक्षा सूत्र बांधा था, जिसके कारण रावण के कुल का विनाश हो गया था। इसलिए भद्रा रहित शुभ मुहूर्त में ही रक्षा सूत्र बांधना शास्त्रसम्मत और कल्याणकारी माना गया है।
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पूर्णिमा तिथि का प्रारंभ: श्रावण शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि का आरंभ सुबह से होकर अगले दिन तड़के तक रहेगा।
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भद्रा का साया: इस वर्ष सबसे राहत की बात यह है कि भद्रा का प्रभाव सूर्योदय से पूर्व ही समाप्त हो जाएगा, जिससे बहनों को पूरे दिन अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधने के लिए लंबा और अत्यंत शुभ समय मिलेगा।
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राखी बांधने का मुख्य शुभ समय: दोपहर के 'अभिजीत मुहूर्त' और 'अपराह्न काल' (दोपहर 1:30 बजे से शाम 4:30 बजे तक) में राखी बांधना सर्वोत्तम फलदायी रहेगा। इसके अलावा 'प्रदोष काल' (शाम 6:45 बजे से रात 8:30 बजे तक) में भी राखी बांधी जा सकती है।
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चौघड़िया अनुसार श्रेष्ठ मुहूर्त: 'अमृत' और 'शुभ' चौघड़िया के दौरान राखी बांधने से भाई के यश, कीर्ति और धन-वैभव में निरंतर वृद्धि होती है।
भगवान श्री कृष्ण और द्रौपदी की अमर रक्षाबंधन कथा: जब एक धागे ने बचाया सम्मान
रक्षाबंधन के ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व की जब भी चर्चा होती है, तो महाभारत काल के भगवान श्री कृष्ण और महारानी द्रौपदी के पावन संबंध की कथा सबसे पहले स्मरण की जाती है। यह कथा बताती है कि रक्षा सूत्र केवल रेशम का एक साधारण धागा नहीं है, बल्कि यह समर्पण, आस्था और निस्वार्थ प्रेम का वह दिव्य बंधन है जिसे स्वयं जगन्नाथ श्री कृष्ण ने भी सर्वोच्च मर्यादा दी थी।
महाभारत की कथा के अनुसार, इंद्रप्रस्थ में जब सम्राट युधिष्ठिर ने 'राजसूय यज्ञ' का आयोजन किया था, तब उस भव्य सभा में देश-विदेश के समस्त राजा, ऋषि और प्रतिष्ठित गणमान्य उपस्थित थे। उसी सभा में चेदि नरेश शिशुपाल भी मौजूद था। शिशुपाल भगवान श्री कृष्ण का ममेरा भाई था, लेकिन वह भगवान से घोर द्वेष रखता था। यज्ञ के दौरान शिशुपाल ने भगवान श्री कृष्ण का घोर अपमान करना शुरू कर दिया और भरी सभा में उन्हें अपशब्द कहे। श्री कृष्ण ने शिशुपाल की माता को दिए गए वचन के अनुसार उसके 100 अपराधों को क्षमा कर दिया।
जैसे ही शिशुपाल ने 101वां अपशब्द कहा, भगवान श्री कृष्ण ने अपने अमोघ अस्त्र 'सुदर्शन चक्र' का आह्वान किया। सुदर्शन चक्र ने पलक झपकते ही शिशुपाल का शीश धड़ से अलग कर दिया और पुनः लौटकर भगवान की तर्जनी उंगली पर विराजमान हो गया। लेकिन इस प्रक्रिया में सुदर्शन चक्र के तीव्र वेग के कारण भगवान श्री कृष्ण की उंगली कट गई और उससे रक्त की तेज धारा बहने लगी।
द्रौपदी का त्याग: चीर का पल्लू फाड़कर बांधी थी पट्टी
भगवान के हाथ से बहते रक्त को देखकर भरी सभा में हड़कंप मच गया। महारानी रुक्मणी, सत्यभामा और अन्य रानियां व सेवक तुरंत औषधि और रेशमी पट्टी लाने के लिए दौड़े। पांडव भी व्याकुल हो उठे। लेकिन उसी सभा में उपस्थित द्रौपदी ने बिना एक क्षण भी गंवाए, अपनी कीमती और सुंदर रेशमी साड़ी का पल्लू अपने हाथों से फाड़ दिया और दौड़कर भगवान श्री कृष्ण की कटी हुई उंगली पर बड़े ही आदर और चिंता के साथ बांध दिया।
द्रौपदी के इस निःस्वार्थ और त्वरित समर्पण को देखकर भगवान श्री कृष्ण अत्यंत द्रवित हो उठे। रक्त बहना तुरंत बंद हो गया। भगवान श्री कृष्ण ने मुस्कुराते हुए द्रौपदी को अपनी सगी बहन का दर्जा दिया और कहा, "हे द्रौपदी! आज तुमने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा बांधकर मेरे रक्त को रोका है। मैं तुम्हारे इस एक-एक सूत (धागे) का ऋणी हो गया हूं। मैं वचन देता हूं कि जब भी तुम्हारे जीवन में कोई संकट आएगा और तुम मुझे पुकारोगी, मैं तुम्हारे इस उपकार के हर एक धागे का कर्ज ब्याज सहित चुकाऊंगा और तुम्हारी रक्षा करूंगा।"
कौरवों की भरी सभा में चीरहरण: जब श्री कृष्ण ने निभाया रक्षा का वचन
भगवान श्री कृष्ण द्वारा दिए गए इस पावन वचन की परीक्षा का समय तब आया जब द्युत क्रीड़ा (जुआ) में पांडव अपना सब कुछ हार गए। दुर्योधन और दुशासन ने भरी सभा में असहाय द्रौपदी को अपमानित करने का षड्यंत्र रचा। दुशासन ने द्रौपदी के केश पकड़कर घसीटते हुए उसे सभा के बीच में खड़ा कर दिया और भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य व धृतराष्ट्र जैसे महारथियों के सामने उसका वस्त्रहरण (चीरहरण) करना शुरू कर दिया।
जब द्रौपदी ने देखा कि उसके पांचों बलशाली पति सिर झुकाए बैठे हैं और सभा में कोई भी उसकी लाज बचाने आगे नहीं आ रहा है, तब उसने अपने दोनों हाथ ऊपर उठाकर दीन-बंधु, करुणा-निधान भगवान श्री कृष्ण का अनन्य भाव से ध्यान किया और पुकारा—"हे गोविंद! हे द्वारकाधीश! मेरी रक्षा करो।"
द्रौपदी की यह पुकार सुनते ही भगवान श्री कृष्ण ने अपने उसी रक्षा सूत्र के वचन को साकार किया। भगवान अदृश्य रूप से द्रौपदी की साड़ी में समा गए और उसकी साड़ी को अनंत बना दिया। दुशासन द्रौपदी की साड़ी खींचते-खींचते बुरी तरह थककर बेदम होकर जमीन पर गिर पड़ा, वस्त्रों का विशाल पर्वत लग गया, लेकिन वह द्रौपदी के तन से साड़ी को अलग नहीं कर सका। इस प्रकार भगवान श्री कृष्ण ने उस दिन कटी उंगली पर बांधे गए साड़ी के एक छोटे से टुकड़े का कर्ज उतारकर भरी सभा में अपनी बहन द्रौपदी के मान-सम्मान, लज्जा और धर्म की रक्षा की थी।
रक्षाबंधन से जुड़ी अन्य पावन कथाएं: माता लक्ष्मी और राजा बलि का प्रसंग
श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर असुरराज बलि से तीन पग में संपूर्ण ब्रह्मांड नाप लिया और बलि को पाताल लोक का राज्य सौंप दिया, तब बलि की अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने स्वयं बलि के पाताल लोक का पहरेदार (द्वारपाल) बनना स्वीकार कर लिया। जब काफी समय बीत गया और भगवान बैकुंठ नहीं लौटे, तो माता लक्ष्मी अत्यंत चिंतित हो गईं।
देवर्षि नारद की सलाह पर माता लक्ष्मी एक गरीब स्त्री का वेश धारण कर पाताल लोक पहुंचीं और राजा बलि को रक्षा सूत्र बांधकर अपना भाई बना लिया। जब राजा बलि ने अपनी बहन से उपहार मांगने को कहा, तो माता लक्ष्मी ने पहरेदार के रूप में खड़े भगवान विष्णु को मांग लिया। बलि ने अपनी बहन के मान की रक्षा करते हुए भगवान को सहर्ष विदा किया। जिस दिन माता लक्ष्मी ने बलि को राखी बांधी थी, वह श्रावण मास की पूर्णिमा का ही दिन था। इसलिए इस पर्व को 'बलेव' और 'सलोनो' के नाम से भी जाना जाता है।
रक्षा सूत्र बांधने की वैदिक विधि और अचूक रक्षा मंत्र
रक्षाबंधन के दिन बहन-भाई दोनों को स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। पूजा की थाली को अत्यंत पवित्र और सुसज्जित तरीके से तैयार करना चाहिए।
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पूजा की थाली में क्या रखें: थाली में रोली (कुमकुम), अक्षत (अखंडित चावल), चंदन, दीपक, ताजे फूल, मिठाई और पवित्र रक्षा सूत्र (राखी) रखें।
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तिलक और अक्षत: सबसे पहले भाई को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बिठाएं। भाई के सिर पर रुमाल या कपड़ा होना चाहिए। इसके बाद बहन भाई के माथे पर कुमकुम और चंदन का तिलक लगाए और उस पर अक्षत लगाए।
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दाहिने हाथ पर रक्षा सूत्र: शास्त्रों के अनुसार, पुरुषों और अविवाहित कन्याओं को हमेशा दाहिने (Right) हाथ की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधना चाहिए।
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वैदिक रक्षा मंत्र का उच्चारण: राखी बांधते समय बहनों को इस महा-मंत्र का उच्चारण अवश्य करना चाहिए:
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥ अर्थ: जिस रक्षा सूत्र से अत्यंत बलशाली दानवेंद्र राजा बलि को बांधा गया था, उसी रक्षा सूत्र से मैं तुम्हारी कलाई बांधती हूं। हे रक्षा सूत्र! तुम स्थिर रहना और आजीवन इस भाई की सभी संकटों से रक्षा करना।
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आरती और मिष्ठान: राखी बांधने के बाद बहन दीपक से भाई की आरती उतारे, उसका मुंह मीठा कराए और उसके उज्ज्वल भविष्य व दीर्घायु की मंगलकामना करे। भाई को भी अपनी सामर्थ्य अनुसार बहन को उपहार देना चाहिए और जीवन भर उसकी रक्षा व सम्मान का संकल्प लेना चाहिए।
पवित्र रिश्तों का सम्मान ही है रक्षाबंधन का वास्तविक संदेश
रक्षाबंधन केवल एक पारंपरिक रस्म या त्योहार नहीं है, बल्कि यह हमारे सनातन समाज में महिलाओं के सम्मान, बहनों के प्रति कर्तव्य और पारिवारिक संस्कारों की अटूट नींव है। भगवान श्री कृष्ण और द्रौपदी की कथा यह संदेश देती है कि जब कोई भाई किसी बहन के प्रति निस्वार्थ भाव से समर्पण रखता है, तो साक्षात ईश्वर भी उस रिश्ते की लाज रखने के लिए दौड़े चले आते हैं। 27 वर्षों बाद बने इस दुर्लभ महासंयोग में मनाया जाने वाला यह रक्षाबंधन पर्व हर परिवार में सुख, शांति, समृद्धि और भाई-बहन के बीच अगाध प्रेम का नया संचार करेगा।