गरुड़ पुराण: मृत्यु के बाद कितने दिनों तक घर के आसपास भटकती है आत्मा? जानें क्या कहती है सनातन मान्यता
सनातन धर्म में 'गरुड़ पुराण' को महापुराणों में विशेष स्थान प्राप्त है। इसमें जन्म से लेकर मृत्यु, जीवन के रहस्यों, यमलोक की यात्रा और पुनर्जन्म का विस्तार से वर्णन मिलता है। जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो उसके परिवार में शोक की लहर दौड़ जाती है, लेकिन इसके साथ ही धार्मिक और आध्यात्मिक स्तर पर कई अनुष्ठान शुरू होते हैं, जिनका सीधा संबंध गरुड़ पुराण में वर्णित नियमों से होता है।
मृत्यु के बाद आत्मा का क्या होता है और वह अपनों के बीच कितने दिनों तक वास करती है, यह एक ऐसा सवाल है जिसके बारे में हर कोई जानना चाहता है। गरुड़ पुराण के अनुसार, प्राण छूटने के बाद आत्मा को अपनी मृत्यु का अहसास होता है, लेकिन मोह और वासना के कारण वह तुरंत इस संसार को छोड़ना नहीं चाहती है। आइए जानते हैं कि गरुड़ पुराण के मुताबिक मृत्यु के बाद आत्मा कितने दिनों तक घर के आसपास रहती है और इस दौरान क्या मान्यताएं जुड़ी हैं।
गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के बाद कितने दिन घर के पास रहती है आत्मा?
गरुड़ पुराण के प्रेत कल्प के अनुसार, जब यमराज के दूत प्राणी के प्राण लेकर जाते हैं, तो उसे कुछ समय के लिए उसकी मृत देह के पास और घर में लाया जाता है। आत्मा की यह स्थिति इस बात पर निर्भर करती है कि उसके कर्म कैसे थे और उसकी मृत्यु कैसे हुई (स्वाभाविक या अस्वाभाविक)।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मृत्यु के बाद शव को अग्नि देने और तेरहवीं (13 दिनों) के संस्कार पूरे होने तक आत्मा ज्यादातर अपने घर और प्रियजनों के आसपास ही भटकती रहती है। इन 13 दिनों के दौरान की स्थिति को इस प्रकार समझा जा सकता है:
शवदाह से लेकर पहले 3 दिन मृत्यु के तुरंत बाद शुरुआती तीन दिनों तक आत्मा अपने घर-परिवार के सदस्यों को देखने और उनके विलाप को सुनने का प्रयास करती है। वह अपनी मृत देह और प्रियजनों से अलग होने के कारण अत्यधिक मोह और दुख में होती है। इस दौरान वह घर के कोनों, अपने कमरे और अपनों के बीच ही चक्कर लगाती है।
पिंड दान और प्रेत शरीर की प्राप्ति गरुड़ पुराण में बताया गया है कि परिवार द्वारा पहले 10 दिनों तक जो पिंड दान किया जाता है, उससे आत्मा को धीरे-धीरे एक सूक्ष्म शरीर (जिसे 'यातना शरीर' या 'प्रेत शरीर' कहा जाता है) की प्राप्ति होती है। इन 10 दिनों में दिए जाने वाले पिंडों से आत्मा के अंगों (अस्थि, मांस, त्वचा आदि) का निर्माण होता है, ताकि वह यमलोक की लंबी और कठिन यात्रा तय कर सके।
13 दिनों का चक्र और यमलोक की यात्रा तेरहवें दिन जब गरुड़ पुराण का पाठ और ब्राह्मण भोज का अनुष्ठान पूरा होता है, तब आत्मा का घर से पूरी तरह मोह भंग होने लगता है। तेरहवें दिन के पिंड दान और शोक समाप्ति के अनुष्ठान के बाद आत्मा यमराज के मार्ग पर आगे बढ़ जाती है। इसके बाद वह अपने घर-परिवार से लगभग पूरी तरह कट जाती है और अपने कर्मों के अनुसार आगे की यात्रा शुरू करती है।
क्या सभी आत्माएं 13 दिन तक घर के पास रहती हैं?
गरुड़ पुराण में यह भी स्पष्ट किया गया है कि सभी आत्माओं के लिए यह नियम एक जैसा नहीं होता। यदि किसी व्यक्ति की अकाल मृत्यु (दुर्घटना, आत्महत्या या हिंसा) हुई हो, तो उसकी आत्मा भटकती रहती है और उसे मुक्ति मिलने में लंबा समय लग सकता है। इसके विपरीत, यदि किसी पुण्यात्मा या संत प्रवृत्ति के व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो वे मोह-माया से परे होकर बहुत जल्दी दिवलोक की ओर प्रस्थान कर जाते हैं।
परिवार द्वारा किए जाने वाले अनुष्ठानों का महत्व
यही कारण है कि सनातन संस्कृति में मृत्यु के बाद 10वें, 11वें, 12वें और 13वें दिन विशेष कर्म-कांड और दान-पुण्य का विधान बताया गया है। परिजनों द्वारा किया गया तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन ही मृत आत्मा को मार्ग में बल, शांति और तृप्ति प्रदान करता है, जिससे वह बिना कष्ट के अपनी अगली यात्रा पूरी कर सके।