कल सप्तमी से शुरू हो रहा जीवित्पुत्रिका महापर्व: नहाय-खाय से लेकर निर्जला उपवास और पारण तक जानें हर दिन का पूरा नियम

कल सप्तमी से शुरू हो रहा जीवित्पुत्रिका महापर्व: नहाय-खाय से लेकर निर्जला उपवास और पारण तक जानें हर दिन का पूरा नियम

सनातन परंपरा में संतान की लंबी आयु, आरोग्य और सुख-समृद्धि के लिए रखा जाने वाला सबसे कठिन और पावन व्रत 'जीवित्पुत्रिका' यानी जितिया कल से विधिवत प्रारंभ होने जा रहा है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि से शुरू होकर नवमी तिथि तक चलने वाला यह त्रिदिवसीय महापर्व मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पड़ोसी देश नेपाल के तराई क्षेत्रों में अत्यंत श्रद्धा व भक्ति भाव से मनाया जाता है। इस व्रत को 'जिउतिया' या 'जीमूतवाहन व्रत' के नाम से भी जाना जाता है। संतान की रक्षा के लिए माताएं इस दौरान लगभग 24 घंटे से भी अधिक समय तक बिना अन्न और जल की एक बूंद ग्रहण किए कठोर 'निर्जला' तप करती हैं। यह पर्व केवल एक उपवास नहीं है, बल्कि इसके तीनों दिनों से जुड़ी विशेष धार्मिक परंपराएं, खान-पान के नियम और पौराणिक मान्यताएं हैं। आइए विस्तार से जानते हैं कि कल सप्तमी के पहले दिन से लेकर नवमी के पारण तक किस दिन क्या-क्या अनुष्ठान और परंपराएं निभाई जाएंगी।

पहला दिन (सप्तमी): नहाय-खाय की सात्विक परंपरा और 'ओठगन' का विशेष नियम

जीवित्पुत्रिका व्रत का पहला दिन नहाय-खाय कहलाता है, जो कल यानी सप्तमी तिथि को पूरी पवित्रता के साथ संपन्न होगा। इस दिन व्रती महिलाएं सुबह सवेरे किसी पवित्र नदी, सरोवर या घर पर ही गंगाजल मिले जल से स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं। इसके बाद पूजा-अर्चना कर पूरी तरह से सात्विक भोजन तैयार किया जाता है।

  • पारंपरिक भोजन: नहाय-खाय के दिन मुख्य रूप से मड़ुआ (रागी) की रोटी, नोनी का साग, तोरी (नेनुआ) और कद्दू (लौकी) की सब्जी खाने का विशेष विधान है। नोनी के साग में भरपूर मात्रा में पोषक तत्व और पानी रोकने की क्षमता होती है, जो अगले दिन के कठिन निर्जला व्रत के लिए शरीर को ऊर्जा और नमी प्रदान करता है।

  • ओठगन या सरगही की रस्म: सप्तमी की रात ढलने के बाद और अष्टमी तिथि लगने से ठीक पहले (तड़के ब्रह्म मुहूर्त में) व्रती महिलाएं 'ओठगन' यानी सरगही करती हैं। इसमें मीठा भोजन, फल या चूड़ा-दही ग्रहण किया जाता है। परंपरा के अनुसार, इस भोजन का कुछ अंश छत पर चील और सियारिन के नाम से रखा जाता है। इसके बाद जैसे ही सूर्योदय की लालिमा दिखती है, जल और अन्न का त्याग कर निर्जला व्रत का संकल्प शुरू हो जाता है।

दूसरा दिन (अष्टमी): 24 घंटे का अखंड निर्जला व्रत और जीमूतवाहन देव की पूजा

व्रत का दूसरा दिन यानी अष्टमी तिथि इस पूरे अनुष्ठान का सबसे मुख्य और कठिन पड़ाव होता है। इस दिन व्रती माताएं दिन भर और पूरी रात अन्न अथवा जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं करती हैं।

  • पूजा की तैयारी: शाम के समय महिलाएं समूह में एकत्र होकर भगवान जीमूतवाहन की आराधना करती हैं। पूजा स्थल पर गाय के गोबर या पवित्र मिट्टी से एक छोटा सा तालाब जैसा घेरा बनाया जाता है। उसके पास पाकड़ की डाल लगाई जाती है।

  • चील और सियारिन की कथा: मिट्टी या कुश (घास) से भगवान जीमूतवाहन के साथ-साथ चील और सियारिन की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं। इनकी पूजा में लाल और पीले रंग का धागा (जिसे जितिया का धागा कहा जाता है), सरसों का तेल, खली, दूब, पान-सुपारी और मौसमी फल अर्पित किए जाते हैं।

  • कथा श्रवण: महिलाएं बैठकर श्रद्धापूर्वक जीवित्पुत्रिका की पावन पौराणिक कथा सुनती हैं, जिसमें गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन द्वारा नागों की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने और राजा शालिवाहन व चील-सियारिन की निष्ठा का वृत्तांत होता है। पूजा संपन्न होने के बाद उस पवित्र रक्षा सूत्र को माताएं अपने गले में धारण करती हैं, जो संतान के लिए सुरक्षा कवच का काम करता है।

तीसरा दिन (नवमी): सूर्य को अर्घ्य और सात्विक पारण के साथ व्रत का समापन

नवमी तिथि के दिन इस 36 घंटे के लंबे और कठिन अनुष्ठान का समापन होता है। इसे व्रत का 'पारण' कहा जाता है।

  • स्नान और दान: नवमी की सुबह व्रती महिलाएं सूर्योदय से पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनती हैं। इसके बाद उगते हुए सूर्य देव को जल और लाल पुष्पों से अर्घ्य दिया जाता है। कुलदेवता और भगवान जीमूतवाहन का ध्यान कर संतान की लंबी उम्र का आशीर्वाद मांगा जाता है।

  • पारण का भोजन: पारण हमेशा सात्विक तरीके से किया जाता है। परंपरा के मुताबिक, पारण में भी नोनी का साग, मड़ुआ की रोटी, चावल और चने की दाल या कद्दू की सब्जी का उपयोग होता है। कुछ क्षेत्रों में सबसे पहले गुड़, जल या अंकुरित चना खाकर उपवास तोड़ा जाता है।

  • ब्राह्मण व जरूरतमंदों को दान: व्रत खोलने से पहले ब्राह्मणों, पंडितों या जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र और यथाशक्ति दक्षिणा दान करने की परंपरा है। इसके बाद ही व्रती माताएं स्वयं भोजन ग्रहण करती हैं और परिवार के सभी सदस्यों में प्रसाद का वितरण किया जाता है।

संतान की रक्षा और संकटों से मुक्ति का सबसे बड़ा आध्यात्मिक कवच

धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, जीवित्पुत्रिका व्रत का प्रभाव कभी निष्फल नहीं होता। मान्यता है कि जो माताएं पूरी निष्ठा, श्रद्धा और विधि-विधान के साथ इस व्रत के तीनों दिनों के नियमों का पालन करती हैं, उनके बच्चों पर आने वाली बड़ी से बड़ी विपत्ति और अकाल मृत्यु का खतरा टल जाता है। भगवान जीमूतवाहन की असीम कृपा से संतान को दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य, तेजस्वी बुद्धि और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मान-सम्मान व सफलता प्राप्त होती है। साथ ही जिन दंपतियों को संतान प्राप्ति में अड़चनें आ रही हों, उन्हें भी इस व्रत के पुण्य प्रभाव से कुल को आगे बढ़ाने वाली योग्य संतान की प्राप्ति होती है।