कजरी तीज 2026: आज बड़ी तीज पर पंचक का साया, जानिए क्या पूजा में होगी बाधा
भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को सुहागिन महिलाओं के सबसे बड़े पर्वों में से एक 'कजरी तीज' (बड़ी तीज अथवा सातुड़ी तीज) का निर्जला व्रत पूरे श्रद्धाभाव और उत्साह के साथ रखा जा रहा है। पति की दीर्घायु, अखंड सौभाग्य और परिवार में सुख-समृद्धि की कामना के साथ रखा जाने वाला यह पावन व्रत महिलाओं की कठोर तपस्या का प्रतीक है। हालांकि इस वर्ष कजरी तीज पर ग्रहों और नक्षत्रों का एक विशेष संयोग बन रहा है, जिसमें चंद्रमा के मीन राशि में संचरण के चलते 'पंचक' का साया भी विद्यमान है।
पंचक का नाम सुनते ही अक्सर श्रद्धालुओं और व्रती महिलाओं के मन में यह संशय उत्पन्न हो जाता है कि क्या इस दौरान पूजा-पाठ करना शुभ रहेगा या नहीं। ज्योतिष शास्त्र के प्रकांड विद्वानों और पंचांग गणना के अनुसार पंचक का प्रभाव किन-किन कार्यों पर पड़ता है और कजरी तीज की पूजा के लिए दिन और रात के कौन से मुहूर्त सबसे श्रेष्ठ और फलदायी रहेंगे, आइए इसका विस्तृत और प्रामाणिक विश्लेषण समझते हैं।
क्या पंचक में कजरी तीज की पूजा वर्जित है? जानिए ज्योतिषीय नियम और समाधान
वैदिक ज्योतिष में जब चंद्रमा कुंभ और मीन राशि में गोचर करते हैं, तब धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती नक्षत्रों के समूह को 'पंचक' कहा जाता है। लोक मान्यताओं में पंचक को लेकर कई भ्रांतियां हैं, लेकिन धर्मग्रंथों में इसके स्पष्ट नियम बताए गए हैं:
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पंचक में कौन से कार्य वर्जित हैं: शास्त्रों के अनुसार पंचक काल में केवल पांच प्रकार के भौतिक और सांसारिक कार्यों की मनाही होती है—घर की छत ढालना, चारपाई या पलंग बनवाना, दक्षिण दिशा की यात्रा करना, तृण (घास-फूस या लकड़ी) एकत्र करना और शवदाह (जिसके लिए विशेष शांति विधान है)।
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पूजा-पाठ और व्रत पर प्रभाव: पंचक का देवी-देवताओं की उपासना, उपवास, हवन, आरती और पौराणिक व्रतों पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता है। कजरी तीज स्वयं देवाधिदेव महादेव और माता पार्वती का संयुक्त पर्व है। भगवान शिव की कृपा से समस्त ग्रह जनित दोष स्वतः ही निष्प्रभावी हो जाते हैं। इसलिए व्रती महिलाएं बिना किसी भय या संशय के पूरे भक्तिभाव के साथ कजरी तीज का व्रत और पूजन संपन्न कर सकती हैं।
कजरी तीज 2026: पूजा के सबसे शुभ चौघड़िया मुहूर्त और सर्वोत्तम समय
कजरी तीज के दिन नीमड़ी माता और भगवान शिव-पार्वती के पूजन के लिए संध्याकालीन प्रदोष काल और अमृत चौघड़िया को सर्वोत्तम माना गया है। यदि आप आज पूजा की तैयारी कर रही हैं, तो इन श्रेष्ठ मुहूर्तों का चयन कर सकती हैं:
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प्रातःकालीन शुभ मुहूर्त: सुबह 09:10 बजे से सुबह 10:45 बजे तक (शुभ चौघड़िया)
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दोपहर का अभिजित मुहूर्त: दोपहर 11:55 बजे से दोपहर 12:46 बजे तक
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विजय मुहूर्त: दोपहर 02:28 बजे से दोपहर 03:19 बजे तक
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गोधूलि व प्रदोष काल (सर्वश्रेष्ठ तीज पूजन समय): शाम 06:40 बजे से रात 08:50 बजे तक
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अमृत - सर्वोत्तम चौघड़िया: शाम 05:08 बजे से शाम 06:44 बजे तक
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चर - सामान्य मुहूर्त: शाम 06:44 बजे से रात 08:08 बजे तक
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निशिता काल (मध्यरात्रि पूजन): रात 11:58 बजे से देर रात 12:44 बजे तक (1 सितंबर)
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चंद्रोदय और अर्घ्य का समय: रात 09:20 बजे के बाद (अलग-अलग शहरों में स्थानीय समयानुसार 5 से 10 मिनट का अंतर संभव)
नीमड़ी माता और शिव-पार्वती की संपूर्ण पूजा विधि: ऐसे बनाएं तालाब और देखें प्रतिबिंब
कजरी तीज के दिन दोपहर ढलने के बाद पूजा की मुख्य तैयारी शुरू की जाती है। इस व्रत की मुख्य पहचान नीमड़ी माता की स्थापना और जल के तालाब में प्रतिबिंब दर्शन की परंपरा है।
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तालाब निर्माण: घर के आंगन, छत या स्वच्छ पूजा स्थल पर शुद्ध मिट्टी और गाय के गोबर से एक छोटा सा घेरा बनाकर तालाब का स्वरूप दिया जाता है। इस तालाब के किनारे पर नीम की एक हरी टहनी (नीमड़ी माता) रोपी जाती है।
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श्रृंगार व सामग्री: तालाब के जल में थोड़ा सा कच्चा दूध, रोली, अक्षत और ताजे पुष्प डाले जाते हैं। नीमड़ी माता को लाल चुनरी, सिंदूर, कुमकुम, मेंहदी, बिंदी, चूड़ी और फल अर्पित किए जाते हैं।
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प्रतिबिंब दर्शन का नियम: पूजन के समय सुहागिन महिलाएं जल से भरे उस तालाब में नींबू, ककड़ी, सत्तू का पिंडा (सातू), अपनी सोने की नथ या अंगूठी और जलते हुए घी के दीपक की लौ का प्रतिबिंब देखती हैं। मान्यता है कि इस प्रतिबिंब दर्शन से वैवाहिक जीवन में किसी भी प्रकार का संकट नहीं आता और सुख-समृद्धि बढ़ती है।
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शिव-गौरी आराधना: नीमड़ी पूजन के साथ-साथ मिट्टी से बने भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा की पंचोपचार पूजा करें। भगवान भोलेनाथ को गंगाजल, कच्चा दूध, बेलपत्र, धतूरा और भांग चढ़ाएं तथा माता पार्वती को सुहाग पिटारी अर्पित करें। इसके बाद कजरी तीज की गरीब ब्राह्मण और सत्तू से जुड़ी पौराणिक कथा का श्रवण करें।
चंद्रमा को अर्घ्य देने का सटीक समय और सत्तू पारण की शास्त्रसम्मत विधि
कजरी तीज का 24 घंटे का निर्जला व्रत रात्रि में आकाश में चंद्र देव के दर्शन और अर्घ्य के बाद ही खोला जाता है। बिना चंद्र अर्घ्य के यह व्रत अधूरा माना जाता है।
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अर्घ्य विधि: रात में जब चंद्रमा का उदय हो, तब एक तांबे या चांदी के लोटे में शुद्ध जल, कच्चा दूध, कुमकुम, अक्षत और दूर्वा लें। लोटे की धार से गिरते जल के माध्यम से चंद्रमा को देखते हुए तीन बार अर्घ्य अर्पित करें और मन ही मन अपने पति की लंबी उम्र की प्रार्थना करें।
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सत्तू का पिंडा (सातू): कजरी तीज पर गेहूं, जौ, चना और चावल के सत्तू में शुद्ध देसी घी, पिसी चीनी (बूरा/खांड) और बारीक मेवे मिलाकर सुंदर पिंडे बनाए जाते हैं। इन पिंडों पर चांदी का वर्क लगाकर तीज माता को भोग लगाया जाता है।
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पारण का नियम: चंद्र अर्घ्य देने के पश्चात सुहागिन महिलाएं अपने पति के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लेती हैं और पति के हाथों जल ग्रहण करके सत्तू के प्रसाद से अपने निर्जला व्रत का पारण करती हैं। पारण से पूर्व गाय को रोटी और गुड़ खिलाना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।
उत्तर भारत से राजस्थान तक कजरी तीज की अनूठी लोक संस्कृति
कजरी तीज उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल (मिर्जापुर, वाराणसी, प्रयागराज, जौनपुर, गोरखपुर) और बिहार में अत्यंत भावुक और संगीतमय अंदाज में मनाई जाती है। वर्षा ऋतु के समापन और विरह-मिलन के भावों को समेटे पारंपरिक कजरी गीतों की महफिलें सजती हैं और महिलाएं झूला झूलकर प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करती हैं।
वहीं राजस्थान के बूंदी जिले में कजरी तीज का इतिहास सदियों पुराना है। यहां तीज माता की शाही सवारी और दो दिवसीय भव्य सांस्कृतिक मेला पूरे देश में विख्यात है, जहां राजस्थानी लोक नृत्य, घूमर और लोक संगीत के साथ तीज का उत्सव राजसी ठाठ-बाट से मनाया जाता है।