मुख्य द्वार समेत घर की इन 5 जगहों पर जरूर जलाएं दीपक, पितरों के आशीर्वाद से घर में बरसेगी सुख-समृद्धि
सनातन धर्म में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। यह पावन तिथि न केवल भगवान श्रीहरि विष्णु और धन की देवी मां लक्ष्मी की आराधना के लिए श्रेष्ठ मानी जाती है, बल्कि इसका सीधा संबंध पितरों के तर्पण के महापर्व 'पितृ पक्ष' (श्राद्ध पक्ष) की शुरुआत से भी है। इसी दिन पूर्णिमा का श्राद्ध संपन्न किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार, भाद्रपद पूर्णिमा की संध्या वेला (गोधूलि मुहूर्त) में किया गया दीपदान व्यक्ति के जीवन से दरिद्रता, अंधकार और पितृ दोष को दूर करने की अद्भुत शक्ति रखता है। मान्यता है कि पूर्णिमा की रात जब पितृलोक से पूर्वज धरती की ओर अग्रसर होते हैं, तो दीपकों की यह ज्योति उनके मार्ग को आलोकित करती है और उनका आशीर्वाद परिवार को प्राप्त होता है। यदि आज शाम मुख्य द्वार सहित 5 विशिष्ट स्थानों पर दीपक प्रज्वलित किए जाएं, तो पितरों की तृप्ति के साथ-साथ घर में अखंड लक्ष्मी का वास होता है।
1. घर का मुख्य द्वार: नकारात्मकता का नाश और लक्ष्मी का आगमन
घर का मुख्य प्रवेश द्वार वह स्थान है जहां से ऊर्जा का संचार होता है। भाद्रपद पूर्णिमा की शाम घर के मुख्य दरवाजे के दोनों ओर शुद्ध घी या तिल के तेल का दीपक अवश्य जलाना चाहिए।
शास्त्रों के अनुसार, मुख्य द्वार पर जलाया गया दीपक घर के भीतर किसी भी प्रकार की नकारात्मक शक्ति, नजर दोष और अमंगल को प्रवेश करने से रोकता है। इसके साथ ही, यह दीपक मां लक्ष्मी के स्वागत का प्रतीक माना जाता है, जिससे गृहस्थी में बरकत बनी रहती है।
2. दक्षिण दिशा: पितरों के मार्ग को आलोकित करने वाला दीपक
पितरों की दिशा दक्षिण मानी गई है। भाद्रपद पूर्णिमा के दिन घर के दक्षिण कोने में या खुले आंगन/बालकनी में दक्षिण की ओर मुख करके एक दीपक जरूर रखें।
इस दीपक में तिल का तेल या सरसों का तेल इस्तेमाल करें और उसमें थोड़े से काले तिल डाल दें। ऐसा करने से पितृ प्रसन्न होते हैं। मान्यता है कि यह दीपक पितरों को शांति प्रदान करता है और यदि परिवार में किसी प्रकार का पितृ दोष चल रहा हो, तो उसके अशुभ प्रभावों में भारी कमी आती है।
3. तुलसी का पौधा: विष्णु-लक्ष्मी की संयुक्त कृपा
हिंदू घरों में तुलसी के पौधे को मां लक्ष्मी और वृंदा का साक्षात स्वरूप माना गया है। भाद्रपद पूर्णिमा की गोधूलि बेला में तुलसी के क्यारे के पास गाय के शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करना अत्यंत पुण्यदायी होता है।
दीपक जलाते समय 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जप करें और तुलसी की परिक्रमा करें। ऐसा करने से दांपत्य जीवन के कलह समाप्त होते हैं, घर की आर्थिक तंगी दूर होती है और श्रीहरि विष्णु की असीम कृपा प्राप्त होती है।
4. रसोई घर में जल का स्थान (पीने के पानी के पास): पितरों की तृप्ति का केंद्र
शास्त्रों और लोक मान्यताओं के अनुसार, घर के रसोई घर में जहां पीने का पानी रखा जाता है (जैसे मटका या नल का स्थान), वह स्थान पितरों का वास स्थल माना जाता है।
भाद्रपद पूर्णिमा की शाम रसोई में पीने के पानी के स्रोत के पास एक छोटा सा दीपक जरूर जलाना चाहिए। यह दीपक पितरों के नाम से समर्पित होता है। इससे पितृ तृप्त होते हैं और परिवार के सदस्यों को आरोग्य, लंबी आयु तथा वंश वृद्धि का वरदान देते हैं।
5. पीपल का वृक्ष या घर का पूजा स्थान: ब्रह्म और देव कृपा
यदि संभव हो तो शाम के समय घर के नजदीकी किसी पीपल वृक्ष के नीचे जाकर सरसों के तेल या घी का दीपक प्रज्वलित करें। पीपल में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवों के साथ-साथ पितरों का भी वास माना गया है।
यदि आसपास पीपल का पेड़ न हो, तो अपने घर के पूजा मंदिर में कुलदेवी, कुलदेवता और भगवान सत्यनारायण के सम्मुख अखंड ज्योति की तरह एक बड़ा दीपक जलाएं। यह दीपक घर के आध्यात्मिक वातावरण को शुद्ध करता है और मन में सकारात्मक विचारों का संचार करता है।
दीपदान करते समय रखें इन बातों का ध्यान
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दीपक मिट्टी का हो और कहीं से भी खंडित न हो। नया दीपक इस्तेमाल करना सबसे उत्तम माना गया है।
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घी के दीपक में हमेशा सफेद रुई की बत्ती और तेल के दीपक में लाल मौली (कलावा) की बत्ती का प्रयोग शुभ फलदायी होता है।
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दीपक को सीधे जमीन पर न रखें, उसके नीचे थोड़े अक्षत (चावल) या पुष्प की पंखुड़ियां अवश्य रखें।