भौम प्रदोष व्रत की पौराणिक कथा: जब वृद्ध साधु बनकर हनुमान जी ने ली थी अपने परम भक्त की कठिन परीक्षा
सनातन धर्म में त्रयोदशी तिथि भगवान शिव की आराधना के लिए समर्पित होती है, जिसे प्रदोष व्रत कहा जाता है। जब यह त्रयोदशी तिथि मंगलवार के दिन पड़ती है, तो इसे 'भौम प्रदोष व्रत' के नाम से जाना जाता है। ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं में मंगल ग्रह को 'भौम' कहा जाता है और वे भगवान शिव के ही अंशावतार हैं। साथ ही, मंगलवार का दिन श्री रामदूत भगवान हनुमान जी को समर्पित है, जो स्वयं भगवान शिव के ग्यारहवें रुद्रावतार हैं।
इस कारण भौम प्रदोष के दिन देवों के देव महादेव और संकटमोचन हनुमान जी दोनों की एक साथ कृपा प्राप्त होती है। इस व्रत को रखने से कर्ज से मुक्ति, भूमि-भवन के विवादों का निपटारा, मंगल दोष का निवारण और असाध्य रोगों से रक्षा होती है। इस पावन दिन प्रदोष काल में पूजन के साथ इस विशेष पौराणिक कथा का श्रवण करना अनिवार्य माना गया है।
भौम प्रदोष व्रत कथा: एक निष्ठावान ब्राह्मणी और उसका संकल्प
प्राचीन काल की बात है, एक नगर में एक अत्यंत धर्मपरायण और निष्ठावान ब्राह्मणी रहती थी। वह भगवान शिव और पवनपुत्र हनुमान जी की अनन्य भक्त थी। उसका एक ही पुत्र था, जिसका नाम उसने 'मंगलिया' रखा था। ब्राह्मणी नियमपूर्वक प्रत्येक मंगलवार को व्रत रखती थी और भगवान हनुमान जी की पूजा-अर्चना करती थी।
ब्राह्मणी का एक विशेष नियम था कि वह मंगलवार के दिन न तो अपने घर के आंगन को गोबर से लीपती थी और न ही किसी प्रकार की मिट्टी खोदती थी। वह पूरा दिन सात्विक भाव से प्रभु के चरणों में अर्पित रखती थी। उसके भक्ति भाव और दृढ़ संकल्प की चर्चा दूर-दूर तक फैली हुई थी। समय बीतने के साथ भगवान हनुमान जी ने अपने इस भक्त की परीक्षा लेने का विचार किया, ताकि संसार को उसकी अटूट श्रद्धा और त्याग का दर्शन कराया जा सके।
जब वृद्ध साधु बनकर पधारे हनुमान जी
एक मंगलवार को प्रदोष काल के समय भगवान हनुमान जी ने एक वृद्ध, जर्जर और भूख-प्यास से व्याकुल साधु का वेश धारण किया। वे भिक्षा मांगते हुए सीधे उस ब्राह्मणी के द्वार पर पहुंचे और बाहर खड़े होकर जोर-जोर से आवाज लगाने लगे— "हे कोई इस घर में, जो इस भूखे और प्यासे साधु की पुकार सुने?"
ब्राह्मणी तुरंत बाहर आई और साधु महाराज को नमन करके बोली, "महाराज! आज्ञा दीजिए, मैं आपकी क्या सेवा कर सकती हूं? आपको भोजन चाहिए या दक्षिणा?"
वृद्ध साधु ने कहा, "हे माई! मैं बहुत दूर से आ रहा हूं और अत्यंत भूखा हूं। लेकिन मेरा एक कठोर नियम है। मैं केवल उसी स्थान पर भोजन ग्रहण करता हूं, जहां की भूमि ताजे गोबर से लीपी गई हो। तुम पहले अपने आंगन को गोबर से लीपकर पवित्र करो, फिर मैं अपनी रसोई स्वयं बनाऊंगा।"
यह सुनकर ब्राह्मणी हाथ जोड़कर दुविधा में पड़ गई। उसने अत्यंत विनम्रता से कहा, "महाराज! आज मंगलवार है। मेरा यह आजीवन नियम है कि मैं मंगलवार को भूमि नहीं लीपती और न ही मिट्टी खोदती हूं। इसके अतिरिक्त आप मुझसे जो भी सेवा कहेंगे, मैं सहर्ष करूंगी। मैं आपको स्वादिष्ट फल, मिष्ठान और धन अर्पित कर सकती हूं, परंतु भूमि लीपने का कार्य मुझसे न करवाएं।"
साधु का हठ और पुत्र की बलि की कठोर शर्त
ब्राह्मणी की बात सुनकर वृद्ध रूपी हनुमान जी क्रोधित होने का नाटक करने लगे और अपनी लाठी पटकते हुए बोले, "यदि तुम मेरी इतनी छोटी सी इच्छा पूरी नहीं कर सकतीं, तो मुझे तुम्हारे अन्न-जल की कोई आवश्यकता नहीं है। मैं किसी दूसरे द्वार पर चला जाऊंगा, परंतु तुम्हारा यह घर आज एक भूखे साधु को खाली हाथ लौटाने के पाप का भागी बनेगा।"
ब्राह्मणी किसी भी स्थिति में अपने द्वार से साधु को भूखा नहीं जाने देना चाहती थी। उसने रोते हुए साधु के चरण पकड़ लिए और कहा, "प्रभु! आप मुझ पर इतना क्रोध न करें। भूमि लीपने के अतिरिक्त आप जो भी कठिन से कठिन कार्य कहेंगे, मैं वह करने को तैयार हूं।"
तब उस साधु ने एक अत्यंत विचित्र और हृदयविदारक शर्त रखी। साधु ने कहा, "यदि तुम वास्तव में मेरी सेवा करना चाहती हो, तो अपने पुत्र 'मंगलिया' को बुलाओ। मैं उसे पेट के बल जमीन पर लिटाऊंगा और उसकी पीठ पर आग जलाकर अपना भोजन तैयार करूंगा। यदि तुम्हें यह स्वीकार है, तो कहो!"
एक मां के लिए यह सुनना किसी वज्रपात से कम नहीं था। परंतु ब्राह्मणी ने अपने व्रत, अतिथि धर्म और प्रभु पर पूर्ण विश्वास रखते हुए मन ही मन सब कुछ ईश्वर को समर्पित कर दिया। उसने सोचा कि यदि साधु मेरे द्वार से शाप देकर लौट गया तो मेरा धर्म नष्ट हो जाएगा। उसने भारी मन से अपने प्रिय पुत्र मंगलिया को साधु के सुपुर्द कर दिया और स्वयं रोती हुई घर के भीतरी कमरे में जाकर प्रभु का ध्यान करने लगी।
साधु ने मंगलिया को आंगन में लिटाया और उसकी पीठ पर अंगारे सुलगाकर अपना भोजन पकाया। भोजन तैयार होने के बाद साधु ने भोजन कर लिया और फिर जाने की तैयारी करने लगे।
ऐसे हुआ चमत्कार: हनुमान जी ने लौटाया पुत्र
भोजन समाप्त करने के पश्चात वृद्ध साधु ने कमरे के बाहर खड़े होकर ब्राह्मणी को पुकारा, "माई! मेरा भोजन पूरा हो गया है। अब तुम बाहर आओ और अपने पुत्र मंगलिया को बुलाकर इस बचे हुए भोजन का प्रसाद ग्रहण करने को कहो।"
यह सुनकर ब्राह्मणी रोती हुई बोली, "महाराज! आप ऐसा कहकर मेरे जले पर नमक क्यों छिड़क रहे हैं? आपने तो मेरे पुत्र की पीठ पर भोजन पकाया था, वह अब जीवित कहां बचा होगा? आप कृपा करके अपना मार्ग ग्रहण करें।"
परंतु साधु ने दोबारा जोर देकर कहा, "माई! तुम मेरी बात पर अविश्वास मत करो। बाहर आकर अपने पुत्र को एक बार आवाज तो लगाओ!"
साधु के बार-बार आग्रह करने पर ब्राह्मणी ने भारी मन से कांपती आवाज में पुकारा— "मंगलिया! बेटा मंगलिया!"
तभी एक अद्भुत चमत्कार घटित हुआ। गली के मोड़ से मंगलिया हंसता-खेलता हुआ अपनी मां की ओर दौड़ा चला आया। उसके शरीर पर किसी भी प्रकार के जलने या चोट का कोई निशान तक नहीं था।
अपने पुत्र को जीवित और पूरी तरह सकुशल देखकर ब्राह्मणी आश्चर्यचकित रह गई। जब उसने मुड़कर देखा, तो वहां वृद्ध साधु के स्थान पर साक्षात केसरीनंदन, पवनपुत्र हनुमान जी अपने दिव्य, तेजमय और चतुर्भुज रूप में खड़े मुस्कुरा रहे थे।
परीक्षा में सफल हुई ब्राह्मणी, मिला अखंड सुख का वरदान
भगवान हनुमान जी ने मुस्कुराते हुए ब्राह्मणी से कहा, "हे कल्याणी! मैं तो केवल तुम्हारे धर्म, निष्ठा और भक्ति की परीक्षा ले रहा था। तुम अपनी परीक्षा में पूर्ण रूप से उत्तीर्ण हुई हो। जो भी मनुष्य भौम प्रदोष के दिन मन में निष्काम भक्ति और अडिग श्रद्धा रखकर व्रत करेगा और इस कथा का श्रवण करेगा, उसके जीवन से समस्त भय, रोग, दरिद्रता और संकट हमेशा के लिए दूर हो जाएंगे।"
भगवान हनुमान जी उस ब्राह्मणी को अखंड सौभाग्य, धन-धान्य और दीर्घायु का वरदान देकर अंतर्ध्यान हो गए। तभी से भौम प्रदोष के दिन इस पावन कथा को पढ़ने और सुनने की अटूट परंपरा चली आ रही है।