सर्वपितृ अमावस्या पर क्या करें और क्या न करें? जानें श्राद्ध, पंचबलि और तर्पण से जुड़े वे जरूरी नियम

सर्वपितृ अमावस्या पर क्या करें और क्या न करें? जानें श्राद्ध, पंचबलि और तर्पण से जुड़े वे जरूरी नियम

सनातन धर्म में आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को सर्वपितृ अमावस्या अथवा महालय अमावस्या कहा जाता है। 16 दिनों तक चलने वाले पितृ पक्ष का यह अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण दिन होता है। गरुड़ पुराण और मत्स्य पुराण के अनुसार, इस दिन उन सभी पूर्वजों, पितरों और कुल के दिवंगत सदस्यों का श्राद्ध व तर्पण किया जाता है जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, या जो लोग पूरे पितृ पक्ष में किसी कारणवश श्राद्ध करने से चूक गए हों।

शास्त्रों में मान्यता है कि सर्वपितृ अमावस्या के दिन पितर अपने लोक लौटने से पहले अपने वंशजों के घर के द्वार पर आते हैं। यदि इस दिन सही विधि और नियमों का पालन करते हुए श्राद्ध किया जाए, तो पितर तृप्त होकर सुख, शांति, समृद्धि और वंश वृद्धि का आशीर्वाद देकर विदा होते हैं। वहीं, अज्ञानतावश की गई छोटी-सी भूल भी पितृ दोष का कारण बन सकती है।

सर्वपितृ अमावस्या पर क्या करें? (श्राद्ध के जरूरी नियम)

सर्वपितृ अमावस्या के दिन पूर्वजों की आत्मशांति और कृपा पाने के लिए इन शास्त्रीय कार्यों को अनिवार्य रूप से करना चाहिए:

  1. कुतुप और रोहिणी मुहूर्त में ही करें श्राद्ध:

    श्राद्ध कर्म कभी भी सुबह जल्दी या शाम ढलने के बाद नहीं करना चाहिए। दोपहर के समय लगभग 11:30 बजे से 1:30 बजे के बीच (कुतुप और रोहिणी मुहूर्त) का समय श्राद्ध और पिंडदान के लिए सर्वोत्तम माना गया है।

  2. कुश और काले तिल से तर्पण:

    अनामिका उंगली में कुश की पवित्री (अंगूठी) पहनकर, तांबे या पीतल के पात्र में जल, दूध, जौ और काले तिल मिलाकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों को जल अर्पित (तर्पण) करें।

  3. पंचबलि भोग अवश्य निकालें:

    ब्राह्मण भोज से पहले भोजन की 5 पत्तलों पर पंचबलि ग्रास निकालना अनिवार्य है:

    • गोबलि: गाय के लिए

    • श्वानबलि: कुत्ते के लिए

    • काकबलि: कौवे के लिए (कौवे को पितरों का दूत माना जाता है)

    • देवादिबलि: देवताओं और चींटियों के लिए

    • पिपीलिकादिबलि: कीड़े-मकोड़ों के लिए

  4. योग्य ब्राह्मण को सात्विक भोज और दक्षिणा:

    सदाचारी, वेदपाठी या सात्विक ब्राह्मण को घर बुलाकर श्रद्धापूर्वक भोजन कराएं। भोजन में खीर और पूड़ी का होना अत्यंत शुभ माना जाता है। भोजनोपरांत वस्त्र, अनाज और दक्षिणा देकर चरण स्पर्श करें।

  5. संध्या के समय दीपदान (पितृ विसर्जन):

    शाम के समय घर के मुख्य द्वार पर, पीपल के पेड़ के नीचे और जलाशय के पास दक्षिण दिशा की ओर मुख करके सरसों या तिल के तेल का दीपक अवश्य प्रज्वलित करें, ताकि पितरों को अपने लोक लौटने का मार्ग आलोकित मिले।

सर्वपितृ अमावस्या पर क्या न करें? (बड़ी वर्जनाएं)

इस पावन तिथि पर नकारात्मकता और पितृ कोप से बचने के लिए इन कार्यों को करने से पूरी तरह बचना चाहिए:

  • तामसिक भोजन और व्यसन से दूरी:

    घर में भूलकर भी लहसुन, प्याज, मांस, मछली, अंडा या मदिरा का प्रवेश न होने दें। इस दिन परिवार के सभी सदस्यों को पूर्ण ब्रह्मचर्य और सात्विकता का पालन करना चाहिए।

  • लोहे और प्लास्टिक के बर्तनों का निषेध:

    पितरों के तर्पण, पूजा और भोजन परोसने के लिए लोहे या प्लास्टिक के बर्तनों का प्रयोग वर्जित है। इसके स्थान पर तांबा, पीतल, चांदी या पत्तलों (पलाश/केले के पत्ते) का उपयोग करें।

  • द्वार पर आए याचक या पशु-पक्षी का अनादर:

    मान्यता है कि अमावस्या के दिन पितर किसी भी रूप (भिक्षुक, कुत्ता, कौवा या गाय) में आपके द्वार आ सकते हैं। अतः किसी भी जरूरतमंद को खाली हाथ न लौटाएं और पशु-पक्षियों को न भगाएं।

  • बाल, दाढ़ी और नाखून काटना वर्जित:

    सर्वपितृ अमावस्या के दिन बाल कटवाना, शेविंग कराना और नाखून काटना शास्त्रों में निषेध माना गया है।

  • मांगलिक कार्य और नई खरीदारी से परहेज:

    यह दिन पूर्वजों के प्रति शोक और कृतज्ञता का होता है, इसलिए गृह प्रवेश, मुंडन, विवाह की बातचीत या नए आभूषण-वाहन की खरीदारी इस दिन नहीं करनी चाहिए। नए कार्यों की शुरुआत नवरात्रि की प्रतिपदा से करें।

  • क्रोध, विवाद और असत्य भाषण:

    घर में किसी भी तरह का क्लेश, चीख-पुकार या अपशब्दों का प्रयोग न करें। जिस घर में शांति और आदर का भाव होता है, वहीं पितर प्रसन्न होकर निवास करते हैं।