मछली पकड़ने के जाल के भरोसे पाकिस्तानी सेना: TTP के ड्रोन हमलों से बचने के लिए असीम मुनीर का अजीब 'जुगाड़'

मछली पकड़ने के जाल के भरोसे पाकिस्तानी सेना: TTP के ड्रोन हमलों से बचने के लिए असीम मुनीर का अजीब 'जुगाड़'

आधुनिक हथियारों और मिसाइलों की डींगें हांकने वाली पाकिस्तानी सेना की जमीनी हकीकत एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हंसी और चर्चा का विषय बन गई है। खैबर पख्तूनख्वा (KP) प्रांत और अफगानिस्तान सीमा से सटे इलाकों में प्रतिबंधित आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के लगातार बढ़ते ड्रोन हमलों से खौफजदा पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने बचाव के लिए एक अजीबोगरीब 'देसी जुगाड़' आजमाना शुरू किया है। गंभीर आर्थिक कंगाली और महंगे एयर डिफेंस सिस्टम की कमी से जूझ रही जनरल असीम मुनीर की सेना अब अपनी चौकियों, थानों और बंकरों के ऊपर मछली पकड़ने वाले प्लास्टिक और नायलॉन के जाल (Fishing Nets) तानकर अपनी जान बचाने की कोशिश कर रही है।

अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अफगानिस्तान सीमा के करीब स्थित पांच संवेदनशील जिलों—कोहाट, करक, बन्नू, लक्की मरवत और डेरा इस्माइल खान—में दर्जनों सैन्य और पुलिस चौकियों को छत से लेकर चहारदीवारी तक इन जालों से पूरी तरह ढका जा चुका है।

₹1.30 लाख का जाल बनाम करोड़ों का एंटी-ड्रोन सिस्टम: मजबूरी का गणित

पाकिस्तान इन दिनों गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है। एक अत्याधुनिक एंटी-ड्रोन रडार या इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग सिस्टम की कीमत 5,000 डॉलर से लेकर 50 लाख डॉलर (करोड़ों रुपये) तक होती है, जिसे सीमा की हर चौकी पर लगाना पाकिस्तान के बस की बात नहीं है।

यही वजह है कि पाकिस्तानी सेना ने बेहद कम खर्च वाला यह तरीका अपनाया है:

  • लागत: एक पूरी सैन्य या पुलिस चौकी को ऊपर से मछली के जाल से ढकने में महज 1,400 डॉलर (करीब 1.30 लाख रुपये) का खर्च आता है।

  • पाकिस्तानी अफसरों का तर्क: खैबर पख्तूनख्वा पुलिस के अधिकारियों का दावा है कि यदि ऊपर से कोई कामिकेज या विस्फोटक ले जाने वाला छोटा ड्रोन गिरता है, तो उसके रोटर्स (पंखुड़ियां) जाल में उलझ जाएंगे।

  • नुकसान कम करने की दलील: अफसरों का यह भी मानना है कि यदि ड्रोन जाल के ऊपर ही फट जाता है, तो बम के छर्रे (स्प्लिंटर्स) हवा में बिखर जाएंगे और नीचे बंकरों में मौजूद जवानों तक सीधा असर कम पहुंचेगा।

होंडा बाइक की बैटरी और सस्ते ड्रोन: TTP का नया 'ड्रोन वॉरफेयर'

पाकिस्तानी सेना के इस अजीब जुगाड़ के पीछे टीटीपी का बदलता और खतरनाक युद्ध कौशल है। पाकिस्तानी अखबार द डॉन की रिपोर्ट के अनुसार, अकेले साल 2026 के पहले छह महीनों में खैबर पख्तूनख्वा में टीटीपी ने 340 से अधिक ड्रोन हमले करने की कोशिश की, जिनमें से 100 से ज्यादा सफल हमलों में 30 से अधिक पाकिस्तानी सुरक्षाकर्मी मारे गए और 90 से ज्यादा घायल हो चुके हैं।

रिसर्च संस्था 'ग्लोबल नेटवर्क ऑन एक्सट्रीमिज्म एंड टेक्नोलॉजी' (GNET) के खुलासे के मुताबिक:

  1. अलग ड्रोन विंग: दिसंबर 2025 में टीटीपी ने कमांडर मौलवी सलीम हक्कानी की अगुवाई में एक समर्पित ड्रोन यूनिट तैयार की।

  2. बाजार से मिलने वाले सस्ते क्वाडकॉप्टर: आतंकी किसी महंगे सैन्य ड्रोन के बजाय बाजार में बिकने वाले कमर्शियल वीडियोग्राफी ड्रोन और खिलौना क्वाडकॉप्टर्स का इस्तेमाल कर रहे हैं।

  3. बाइक की बैटरी का जुगाड़: ड्रोन की उड़ान का समय (Flight Endurance) बढ़ाने के लिए टीटीपी लड़ाके उसमें होंडा मोटरसाइकिल की 12 वोल्ट की बैटरियां जोड़ रहे हैं, जिससे ड्रोन 30 से 40 किलोमीटर दूर तक विस्फोटक ले जाने में सक्षम हो जाते हैं।

हंगू जिले के हमले के बाद फैली दहशत, बैरक से निकलने में डर

इस जाल वाले जुगाड़ की शुरुआत अप्रैल महीने में अफगानिस्तान सीमा से करीब 30 किमी दूर स्थित हंगू जिले में हुए एक भीषण हमले के बाद हुई। 16 अप्रैल को टीटीपी के ड्रोनों ने सरकी पियाला पुलिस चौकी पर अचानक मोर्टार और विस्फोटक गिराए, जिसके बाद आतंकियों ने अंधाधुंध गोलीबारी की। इस हमले में कई जवान हताहत हुए थे। अकेले हंगू जिले में ही इस साल 16 से अधिक ड्रोन हमले दर्ज किए जा चुके हैं।

इलाके में खौफ का आलम यह है कि पाकिस्तानी सेना और फ्रंटियर कोर (FC) के जवान बिना कड़े सुरक्षा घेरे के अपनी बैरकों से बाहर निकलने तक से कतरा रहे हैं।

रक्षा विशेषज्ञों ने उड़ाया मजाक: 'अपरिपक्व और झूठी सुरक्षा का भ्रम'

पाकिस्तानी सेना के इस 'फिशिंग नेट डिफेंस' पर अंतरराष्ट्रीय रक्षा विश्लेषक चुटकी ले रहे हैं। इस्लामाबाद स्थित 'सेंटर फॉर रिसर्च एंड सिक्योरिटी स्टडीज' के निदेशक इम्तियाज गुल का कहना है कि यह एक अपरिपक्व और बचकाना तरीका है जो सैनिकों को केवल 'सुरक्षा का झूठा भ्रम' दे सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि ड्रोन का असली मुकाबला हवा में इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग, लेजर या रडार से होता है। अगर आतंकी साइड एंगल से या खिड़कियों के जरिए ड्रोन अंदर घुसा दें या थोड़ा भारी मोर्टार गिरा दें, तो प्लास्टिक का मछली पकड़ने वाला जाल उसे रोकने में पूरी तरह बेअसर साबित होगा।

पाकिस्तान द्वारा चीन और तुर्किए से खरीदे गए इलेक्ट्रॉनिक जैमर्स भी इन सस्ते मॉडिफाइड ड्रोनों की फ्रीक्वेंसी को ट्रैक करने में नाकाम रहे हैं। ऐसे में परमाणु शक्ति संपन्न होने का दंभ भरने वाली पाकिस्तानी सेना का आतंकियों के सामने मछली के जाल के सहारे खड़े होना उसकी लाचारी और रक्षा तंत्र के खोखलेपन को बयां कर रहा है।