कब है श्रीकृष्ण जन्माष्टमी? पूजा के लिए मिलेगा मात्र 40 मिनट का दुर्लभ मुहूर्त, जानें रोहिणी नक्षत्र में ही क्यों हुआ था कान्हा का प्राकट्य और इसका गहरा रहस्य
भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की आधी रात जब समूची सृष्टि निद्रा के आगोश में होती है, तब मथुरा के कारागार में अंधकार को चीरती हुई एक दिव्य ज्योति प्रकट होती है। यही वह पावन क्षण है जब धर्म की पुनः स्थापना और अधर्म के संहार के लिए भगवान श्रीहरि विष्णु अपने आठवें पूर्णावतार श्रीकृष्ण के रूप में अवतरित हुए थे। देश भर में इस वर्ष जन्माष्टमी का पावन पर्व अत्यंत उल्लास और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। ब्रज मंडल के कण-कण से लेकर देश के हर कोने में नंदलाला के स्वागत की भव्य तैयारियां चल रही हैं। इस पावन अवसर पर श्रद्धालुओं के मन में तिथि, रोहिणी नक्षत्र के संयोग और मध्यरात्रि में पूजन के सटीक समय को लेकर विशेष उत्सुकता रहती है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस वर्ष मध्यरात्रि में बाल गोपाल के प्राकट्य और महाभिषेक के लिए भक्तों को केवल 40 मिनट का एक अत्यंत दुर्लभ व शक्तिशाली 'निशिता काल' मुहूर्त प्राप्त हो रहा है। आइए जानते हैं जन्माष्टमी की प्रामाणिक तिथि, इस 40 मिनट के दिव्य मुहूर्त का महत्व और वह गहरा रहस्य कि आखिर भगवान श्रीकृष्ण ने अपने जन्म के लिए रोहिणी नक्षत्र को ही क्यों चुना।
जन्माष्टमी की सही तिथि और मध्यरात्रि में केवल 40 मिनट का दुर्लभ पूजा मुहूर्त
हिंदू पंचांग के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में हुआ था। यही कारण है कि जन्माष्टमी की मुख्य पूजा हमेशा रात्रि के समय ही की जाती है, जिसे धर्मशास्त्रों में 'निशिता काल' कहा जाता है।
पंचांग गणना के अनुसार अष्टमी तिथि के मध्यरात्रि में व्याप्त होने के कारण गृहस्थ साधक मध्यरात्रि पूजन के आधार पर व्रत रखते हैं। इस वर्ष मध्यरात्रि पूजन के लिए केवल 40 मिनट की अत्यंत शुभ समयावधि प्राप्त हो रही है, जो रात्रि 12:00 बजे से लेकर 12:40 बजे तक प्रभावी रहेगी। ज्योतिष शास्त्र में इस 40 मिनट की अवधि को अत्यंत सिद्ध माना गया है। शास्त्रों का मत है कि यह वह क्षण होता है जब रात्रि का आठवां मुहूर्त चरम पर होता है और पृथ्वी पर ब्रह्मांडीय सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह कई गुना बढ़ जाता है। इस सीमित 40 मिनट के समय में किया गया अभिषेक, मंत्र जप और अर्चन साधक की समस्त मनोकामनाओं को सिद्ध करने की क्षमता रखता है।
रोहिणी नक्षत्र में ही क्यों हुआ था भगवान श्रीकृष्ण का जन्म? जानें इसका गहरा आध्यात्मिक रहस्य
सनातन परंपरा में यह प्रश्न सदियों से भक्तों और जिज्ञासुओं के मन में कौंधता रहा है कि 27 नक्षत्रों में से भगवान विष्णु ने अपने पूर्णावतार के लिए केवल रोहिणी नक्षत्र को ही क्यों चुना। इसके पीछे अत्यंत रोचक पौराणिक, वंशानुगत और ज्योतिषीय कारण विद्यमान हैं।
सर्वप्रथम, भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य 'चंद्रवंश' में हुआ था। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार रोहिणी नक्षत्र के स्वामी स्वयं चंद्रमा हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार चंद्रमा की 27 पत्नियां (27 नक्षत्र) हैं, जिनमें से चंद्रमा को रोहिणी सर्वाधिक प्रिय हैं। जब भगवान विष्णु ने अपने प्रिय चंद्र के वंश में अवतार लेने का संकल्प लिया, तो उन्होंने अपने पूर्वज चंद्रमा को आनंदित करने के लिए उनकी सबसे प्रिय रानी रोहिणी के नक्षत्र को अपने प्राकट्य का साक्षी बनाया।
दूसरा प्रमुख कारण यह है कि रोहिणी नक्षत्र का स्वभाव अत्यंत सौम्य, सुंदर, उपजाऊ और आकर्षण से परिपूर्ण माना जाता है। रोहिणी का शाब्दिक अर्थ होता है 'आरोहण' या 'विकास'। भगवान श्रीकृष्ण का संपूर्ण जीवन आकर्षण, प्रेम, माधुर्य और आध्यात्मिक उत्थान का प्रतीक है। इसलिए उन्होंने इस पृथ्वी पर प्रेम और आनंद की वृद्धि के लिए रोहिणी नक्षत्र में जन्म लिया।
तीसरा ज्योतिषीय पहलू यह है कि जब अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और वृषभ लग्न का मिलन मध्यरात्रि में होता है, तो यह 'जयंती योग' का निर्माण करता है। भविष्य पुराण और स्कंद पुराण में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि जयंती योग में जन्माष्टमी का व्रत और पूजन करने से व्यक्ति को कई जन्मों के पापों से मुक्ति मिल जाती है और उसे साक्षात वैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है।
स्मार्त और वैष्णव संप्रदाय की तिथियों का भेद और गृहस्थों के लिए नियम
हर साल जन्माष्टमी के अवसर पर तिथियों को लेकर दो अलग-अलग मत देखने को मिलते हैं—एक स्मार्त संप्रदाय और दूसरा वैष्णव संप्रदाय। इस भेद को समझना प्रत्येक श्रद्धालु के लिए आवश्यक है ताकि वे बिना किसी संशय के अपना व्रत और पूजन संपन्न कर सकें।
स्मार्त परंपरा उन लोगों की होती है जो गृहस्थ जीवन जीते हैं और शास्त्रों की पंचदेव उपासना में विश्वास रखते हैं। स्मार्त मत के अनुसार जिस रात अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का संयोग मध्यरात्रि में विद्यमान हो, उसी रात जन्माष्टमी का व्रत और पूजन किया जाता है, भले ही अष्टमी तिथि उसी दिन दोपहर या शाम को क्यों न शुरू हुई हो।
इसके विपरीत वैष्णव संप्रदाय के अंतर्गत साधु, संत, संन्यासी और इस्कॉन व वल्लभ कुल के अनुयायी आते हैं। वैष्णव मत 'उदया तिथि' और 'अष्टमी-नवमी' की युति को प्राथमिकता देता है। वैष्णव परंपरा में कभी भी सप्तमी युक्त अष्टमी को स्वीकार नहीं किया जाता, इसलिए वे अगले दिन नवमी विद्धा अष्टमी में भगवान का जन्मोत्सव मनाते हैं। गृहस्थ साधकों के लिए धर्मसिंधु ग्रंथ का निर्देश है कि वे निशिता काल यानी मध्यरात्रि में अष्टमी तिथि की उपस्थिति को ही मुख्य मानकर व्रत का पालन करें।
40 मिनट के महामुहूर्त में कैसे करें कान्हा का संपूर्ण पूजन? मिनट-दर-मिनट विधान
मध्यरात्रि के इस 40 मिनट के अत्यंत पवित्र और सीमित समय का पूर्ण लाभ उठाने के लिए साधकों को पहले से पूरी तैयारी रखनी चाहिए। इस 40 मिनट को चार चरणों में बांटकर पूजा संपन्न की जा सकती है।
प्रथम 10 मिनट में शंखनाद और घंटियों की ध्वनि के साथ लड्डू गोपाल का खीरे से नाल छेदन कराएं और उन्हें प्राकट्य चौकी पर विराजमान करें। इसके तुरंत बाद दक्षिणावर्ती शंख में गंगाजल और पंचामृत (कच्चा दूध, दही, घी, शहद और शर्करा) भरकर प्रभु का महाअभिषेक करें। अभिषेक के दौरान 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का निरंतर उच्चारण करते रहें।
अगले 15 मिनट में प्रभु के श्रीअंग को कोमल वस्त्र से पोंछकर उन्हें सुंदर पीतांबर वस्त्र धारण कराएं। उनके मस्तक पर अष्टगंध, गोपी चंदन और रोली का त्रिपुंड लगाएं। सिर पर मोरपंख लगा मुकुट, हाथों में सोने या चांदी के कंगन, गले में मोतियों की माला और नन्हे हाथों में प्रिय बांसुरी सुसज्जित करें।
इसके बाद के 10 मिनट में कान्हा को उनकी सबसे प्रिय वस्तु—ताजा सफेद माखन, मिश्री और धनिया की विशेष पंजीरी का भोग लगाएं। ध्यान रहे कि भोग में तुलसी दल अनिवार्य रूप से होना चाहिए, क्योंकि बिना तुलसी के भगवान विष्णु भोग स्वीकार नहीं करते।
अंतिम 5 मिनट में कपूर और गाय के शुद्ध घी का दीप प्रज्वलित करके पूरे परिवार के साथ 'आरती कुंजबिहारी की' गाएं। आरती के उपरांत प्रभु को प्रेमपूर्वक सुसज्जित झूले में बैठाकर झूला झुलाएं और अपनी भूल-चूक के लिए क्षमा प्रार्थना करते हुए पूजा को पूर्ण करें।
मथुरा-वृंदावन से लेकर उत्तर प्रदेश के जनपदों तक उत्सव की लहर
जन्माष्टमी का उल्लास केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक विशाल सांस्कृतिक और सामाजिक उत्सव का रूप ले चुका है। उत्तर प्रदेश के मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर मुख्य गर्भगृह को कारागार का स्वरूप देकर सहस्रधारा से कान्हा का दिव्य अभिषेक किया जा रहा है। वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर और राधा रमण मंदिर में मंगला आरती और अभिषेक के दर्शन के लिए लाखों श्रद्धालु उमड़ रहे हैं।
इसके साथ ही राजधानी लखनऊ, उन्नाव, कानपुर, वाराणसी, अयोध्या और प्रयागराज के प्रमुख मंदिरों में भव्य झांकियां सजाई गई हैं। स्थानीय बाजारों में लड्डू गोपाल के सुंदर वस्त्रों, झूलों, मोरपंखों और माखन-मिश्री की दुकानों पर भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिल रही है। दिल्ली-एनसीआर से लेकर मुंबई, जयपुर और गुजरात के द्वारका तक पूरा वातावरण "हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की" के जयघोष से गुंजायमान हो रहा है। यह पावन पर्व न केवल भक्ति का संचार करता है, बल्कि जीवन में सत्य, प्रेम और कर्मयोग के मार्ग पर चलने की अमर प्रेरणा भी देता है।