जुलाई 2026 में कब से कब तक लगेगा पंचक? जानें तारीख, समय और भूलकर भी न किए जाने वाले 5 जरूरी काम
सनातन धर्म, वैदिक ज्योतिष और भारतीय पंचांग में 'पंचक' (Panchak) को एक बेहद विशेष, संवेदनशील और सतर्क रहने वाली समय अवधि माना गया है। ज्योतिष शास्त्र के नियमों के अनुसार, जब चंद्रमा का गोचर कुंभ और मीन राशि में होता है, तो उस कालखंड को पंचक कहा जाता है। सामान्य तौर पर इस पांच दिनों की अवधि को किसी भी प्रकार के नए और मांगलिक कार्यों की शुरुआत के लिए शुभ नहीं माना जाता है। मान्यता है कि पंचक के दौरान किए गए कुछ विशेष कार्यों के परिणाम अशुभ या अनचाहे हो सकते हैं। आइए जानते हैं कि जुलाई 2026 में पंचक कब-कब लगने जा रहा है और इस दौरान आपको किन बातों का विशेष ख्याल रखना चाहिए।
क्या होता है पंचक और क्यों इसे माना जाता है संवेदनशील?
ज्योतिषीय गणना के अनुसार, नक्षत्र मंडल के कुल 27 नक्षत्रों में से आखिरी के पांच नक्षत्रों (धनिष्ठा का उत्तरार्ध, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती) के संयोग को पंचक कहा जाता है। जब चंद्रमा इन नक्षत्रों और कुंभ व मीन राशि से होकर गुजरता है, तो यह स्थिति लगभग 5 दिनों तक बनी रहती है। धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं के अनुसार, इन पांच दिनों में पर्यावरण और ब्रह्मांडीय ऊर्जा में कुछ ऐसे बदलाव होते हैं जो नए कार्यों की शुरुआत के लिए अनुकूल नहीं माने जाते। यही वजह है कि लोग इस दौरान कोई भी बड़ा जोखिम लेने से बचते हैं।
जुलाई 2026 में दो बार लगेगा पंचक, नोट कर लें सही तारीख और समय
जुलाई 2026 के महीने में ग्रहों की स्थिति के कारण पंचक का संयोग एक नहीं बल्कि दो बार बनने जा रहा है। पंचांग के अनुसार इसका सही समय इस प्रकार है:
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पहला पंचक (शुरुआत): 03 जुलाई 2026 की रात 12 बजकर 48 मिनट से प्रारंभ होगा और इसका समापन 08 जुलाई 2026 की शाम 04 बजकर 00 मिनट पर होगा।
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दूसरा पंचक (शुरुआत): 31 जुलाई 2026 की सुबह 06 बजकर 38 मिनट से शुरू होगा और यह अगले महीने यानी 04 अगस्त 2026 तक प्रभावी रहेगा।
पंचक के दौरान भूलकर भी न करें ये 5 काम, माना जाता है वर्जित
पौराणिक मान्यताओं और ज्योतिष शास्त्र के नियमों के मुताबिक, पंचक के इन 5 दिनों में कुछ कामों को करने की सख्त मनाही होती है:
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ईंधन एकत्र करना: पंचक के दौरान लकड़ी, घास, कंडा, कोयला या किसी भी प्रकार का ईंधन और जलावन इकट्ठा नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे अग्नि का भय रहता है।
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मकान की छत डालना: इस अवधि में घर का लिंटर डालना या छत बनवाना बेहद अशुभ माना जाता है। ऐसा करने से धन हानि या गृह क्लेश की आशंका रहती है।
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चारपाई या बेड खरीदना: पंचक काल में नया पलंग, बेड, गद्दे या चारपाई खरीदना और उसे घर में लाना वर्जित माना गया है।
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दक्षिण दिशा की यात्रा: ज्योतिष में दक्षिण दिशा को यमराज और पितरों की दिशा माना गया है, इसलिए पंचक के दौरान इस दिशा में यात्रा करने से बचना चाहिए।
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नए व्यापार की शुरुआत: बिना किसी योग्य ज्योतिषी की सलाह के इस अवधि में किसी भी नए बड़े व्यवसाय, दुकान या व्यापारिक सौदे की शुरुआत नहीं करनी चाहिए।
अशुभ समय में भी किए जा सकते हैं ये शुभ कार्य, नहीं लगता कोई दोष
भले ही पंचक को सामान्य तौर पर वर्जित माना जाता है, लेकिन कुछ ऐसे कार्य भी हैं जिन्हें इस दौरान पूरे मनोयोग से किया जा सकता है:
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इस अवधि में नियमित पूजा-पाठ, मंत्र जाप, कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठान करने पर किसी भी प्रकार का कोई प्रतिबंध नहीं होता है, बल्कि यह शुभ फल देता है।
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यदि पंचक के दौरान कोई शुभ नक्षत्र विद्यमान हो, तो विद्वान ब्राह्मणों की सलाह और विशेष मुहूर्त निकालकर सगाई, विवाह या मुंडन जैसे संस्कार किए जा सकते हैं।
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सरकारी नौकरी से जुड़े कार्य, अदालती मामले, कानूनी दस्तावेज तैयार करना या कॉम्पिटिटिव एग्जाम्स से जुड़े कार्यों को पंचक में बेझिझक किया जा सकता है।
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रक्षाबंधन, भाई दूज या दिवाली जैसे बड़े और पारंपरिक त्योहार यदि पंचक के दौरान आते हैं, तो उन्हें पूरे उत्साह के साथ मनाया जा सकता है, इसमें कोई दोष नहीं लगता।
पंचक में मृत्यु होने पर पुतले जलाने की परंपरा, जानिए क्या है इसके पीछे का विधान
गरुड़ पुराण और धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, यदि पंचक के दौरान किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तो परिवार और कुल के लिए इसे एक विशेष दोष (पंचक दोष) माना जाता है। मान्यता है कि पंचक में देहावसान होने से परिवार के अन्य सदस्यों पर भी संकट आ सकता है। इस दोष के निवारण के लिए दाह संस्कार के समय शव के साथ आटे या कुशा (घास) के पांच पुतले बनाकर वैदिक मंत्रोच्चार के साथ जलाए जाते हैं। इस पूरी धार्मिक प्रक्रिया को 'पंचक शांति विधान' कहा जाता है, जिससे दोष का प्रभाव पूरी तरह समाप्त हो जाता है और मृत आत्मा को शांति मिलती है।