वट पूर्णिमा पर बरगद के पेड़ पर क्यों बांधा जाता है लाल सूत? जानें सुहाग की रक्षा से जुड़ा यह गहरा रहस्य
हिंदू धर्म में अखंड सौभाग्य, वैवाहिक सुख और पति की दीर्घायु की कामना के लिए किए जाने वाले व्रतों में 'वट पूर्णिमा' (वट सावित्री) का एक विशेष और अत्यंत पूजनीय स्थान है। ज्येष्ठ मास में मनाया जाने वाला यह पावन पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह प्रेम, समर्पण और दृढ़ संकल्प की उस पौराणिक गाथा को जीवंत करता है जिसने मृत्यु के देवता यमराज को भी झुकने पर मजबूर कर दिया था। इस दिन सुहागिन महिलाएं सोलह श्रृंगार कर बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं और उस पर लाल सूत (कलावा) लपेटती हैं। आइए जानते हैं इस अद्भुत परंपरा के पीछे छिपी धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताएं।
वट पूर्णिमा 2026: जानें शुभ तिथि और समय
इस साल ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 29 जून की रात्रि 03:06 बजे से हो रही है, जिसका समापन अगले दिन 30 जून की सुबह 05:26 बजे होगा। उदयातिथि के अनुसार वट पूर्णिमा का मुख्य व्रत और पूजन 30 जून को ही विशेष रूप से फलदायी माना जाएगा।
माता सावित्री और सत्यवान की अमर कथा
इस व्रत का सीधा संबंध पतिव्रता माता सावित्री और उनके पति सत्यवान से है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब यमराज सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे, तब सावित्री ने अपने तपोबल और बुद्धिमत्ता से यमराज को विवश कर दिया। आखिरकार यमराज ने इसी बरगद (वट) वृक्ष के नीचे सत्यवान के प्राण वापस लौटाए थे और उन्हें दीर्घायु का वरदान दिया था। तभी से बरगद के पेड़ को शक्ति, सतीत्व और सुहाग की रक्षा का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाने लगा।
बरगद के पेड़ पर लाल सूत बांधने का क्या है महत्व?
सनातन परंपरा में लाल रंग को सौभाग्य, ऊर्जा और सुहाग का प्रतीक माना जाता है। वट पूर्णिमा के दिन बरगद के पेड़ पर लाल सूत बांधने के पीछे कई गहरे धार्मिक कारण हैं:
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रक्षा सूत्र का प्रतीक: बरगद के तने पर बांधा जाने वाला लाल सूत एक 'रक्षा कवच' की तरह काम करता है। ऐसी मान्यता है कि यह सूत्र पति के जीवन पर आने वाले सभी संकटों और नकारात्मक शक्तियों को दूर रखता है।
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त्रिशक्ति का वास: बरगद के पेड़ में साक्षात ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास माना जाता है। सूत बांधकर महिलाएं इन तीनों देवों से अपने परिवार की सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मांगती हैं।
सात फेरे और सात जन्मों के अटूट रिश्ते का धागा
पूजा के दौरान महिलाएं बरगद के पेड़ के चारों ओर परिक्रमा करते हुए सूत को सात बार (या सुविधानुसार अधिक बार) लपेटती हैं। यह सात फेरे इस बात का प्रतीक हैं कि पति-पत्नी का यह पवित्र रिश्ता केवल इसी जन्म का नहीं, बल्कि सात जन्मों तक अटूट बना रहे। यह वैवाहिक जीवन की स्थिरता और आपसी विश्वास को मजबूती प्रदान करता है।
'अक्षय वट' की तरह अमर रहे सुहाग
बरगद के वृक्ष को शास्त्रों में 'अक्षय वट' कहा गया है, जिसका अर्थ है जिसका कभी क्षय (नाश) न हो। यह पेड़ सदियों तक जीवित रहता है और विपरीत परिस्थितियों में भी अडिग खड़ा रहता है। महिलाएं इस वृक्ष की पूजा कर यही कामना करती हैं कि उनका सुहाग, वैवाहिक जीवन और आपसी प्रेम भी इसी अक्षय वट की तरह हमेशा हरा-भरा, स्थायी और अमर रहे।