क्यों सोने की झाड़ू से साफ किया जाता है भगवान जगन्नाथ का रास्ता? जानें 'छेरा पहरा' रस्म का बेहद अनोखा रहस्य
नई दिल्ली। उड़ीसा के पुरी में आयोजित होने वाली विश्व प्रसिद्ध भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा सनातन धर्म के सबसे बड़े और भव्य त्योहारों में से एक है। इस साल यह दिव्य रथयात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया तिथि यानी 16 जुलाई 2026 से प्रारंभ होकर 24 जुलाई 2026 तक चलेगी। जब भगवान जगन्नाथ, अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विशाल रथों पर सवार होकर नगर भ्रमण पर निकलते हैं, तो पुरी की धरती जयकारों से गूंज उठती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस रथयात्रा के शुरू होने से ठीक पहले एक बेहद अद्भुत और अनोखी रस्म निभाई जाती है, जिसे 'छेरा पहरा' (Chhera Pahanra) कहा जाता है? इस रस्म में एक राजा स्वयं झाड़ू लगाकर भगवान के मार्ग को साफ करता है।
क्या है 'छेरा पहरा' रस्म और कैसे निभाई जाती है?
धार्मिक नियमों के अनुसार, जब तीनों भव्य रथ मुख्य मंदिर के सामने सज-धजकर तैयार हो जाते हैं, तब पुरी के गजपति महाराज (वहां के राजा) एक पालकी में सवार होकर आते हैं। वे भगवान की पूजा-अर्चना करने के बाद एक विशेष सोने के हैंडल (हत्थे) वाली झाड़ू लेकर तीनों रथों के मंडप और उसके आसपास के पूरे रास्ते की सफाई करते हैं। झाड़ू लगाने के बाद राजा स्वयं उस पूरे मार्ग पर सुगंधित चंदन के जल का छिड़काव भी करते हैं। इस पूरी प्रक्रिया को ही उड़ीसा की पारंपरिक भाषा में 'छेरा पहरा' कहा जाता है। इस रस्म के संपन्न होने के बाद ही शंखनाद के साथ रथों को खींचना शुरू किया जाता है।
सोने की झाड़ू से मार्ग साफ करने के पीछे का आध्यात्मिक महत्व
भगवान जगन्नाथ के रास्ते को सोने की झाड़ू से साफ करने के पीछे गहरे आध्यात्मिक और सामाजिक संदेश छिपे हुए हैं, जो इस प्रकार हैं:
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राजा और रंक सब समान: यह रस्म समाज को सबसे बड़ा संदेश देती है कि भगवान की नजर में कोई छोटा या बड़ा नहीं है। भले ही कोई कितना भी बड़ा राजा क्यों न हो, ईश्वर के सामने वह एक साधारण सेवक (झाड़ू लगाने वाला) ही है। यह राजा के अहंकार को मिटाकर पूर्ण विनम्रता को दर्शाता है।
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ऐश्वर्य का समर्पण: हिंदू धर्म में सोने (Gold) को सबसे पवित्र, शुद्ध और कीमती धातु माना जाता है। सोने की झाड़ू का उपयोग कर राजा अपना सारा राजसी ठाट-बाट, धन-दौलत और ऐश्वर्य भगवान जगन्नाथ के चरणों में समर्पित करते हैं।
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सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि: पौराणिक मान्यता है कि सोने की झाड़ू से सफाई करने और चंदन जल छिड़कने से उस पूरे क्षेत्र में सकारात्मक ऊर्जा (Positive Energy) का प्रवाह बढ़ता है। सोना सौभाग्य और समृद्धि का प्रतीक है, जिससे पूरे देश में खुशहाली आती है।
9 दिनों तक मौसी के घर (गुंडिचा मंदिर) विश्राम करते हैं भगवान
'छेरा पहरा' रस्म के पूरा होते ही महाउत्सव की शुरुआत होती है। लाखों श्रद्धालु महाप्रभु के रथों को खींचकर मुख्य मंदिर से लगभग 3 किलोमीटर दूर स्थित गुंडीचा मंदिर लेकर जाते हैं, जिसे भगवान की मौसी का घर माना जाता है। भगवान जगन्नाथ की यह रथयात्रा मुख्य रूप से 9 दिनों तक चलती है, जहां भगवान विश्राम करते हैं। इसके बाद भगवान की मुख्य मंदिर में वापसी होती है, जिसे 'बहुदा यात्रा' (Bahuda Yatra) कहा जाता है। इस वर्ष यह पूरा उत्सव 16 जुलाई से 24 जुलाई 2026 तक धूमधाम से मनाया जाएगा।
रथयात्रा के दर्शन मात्र से मिलता है मोक्ष का वरदान
सनातन शास्त्रों और पुराणों में जगन्नाथ रथयात्रा के दर्शन को महापुण्यदायी बताया गया है। इसके फल नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट हैं:
| धार्मिक कृत्य | प्राप्त होने वाला फल व मान्यता |
| रथों का केवल दर्शन करना | जीवन के जाने-अनजाने में किए गए सभी पापों से तत्काल मुक्ति मिल जाती है। |
| रथ की रस्सी को छूना या खींचना | संसार के समस्त बड़े तीर्थों (जैसे चार धाम) की यात्रा करने के समान पुण्य मिलता है। |
| रथयात्रा में पूरी श्रद्धा से शामिल होना | जातक को जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिलती है और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। |