यूपी के मऊ में 2023 के बाद तैनात रहे सभी SP पर गिरेगी गाज: ट्रायल में भारी लापरवाही पर भड़का सुप्रीम कोर्ट

यूपी के मऊ में 2023 के बाद तैनात रहे सभी SP पर गिरेगी गाज: ट्रायल में भारी लापरवाही पर भड़का सुप्रीम कोर्ट

उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली और आपराधिक मुकदमों के ट्रायल में बरती जा रही गंभीर लापरवाही पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने राज्य के मऊ जिले में वर्ष 2023 से लेकर अब तक तैनात रहे सभी पुलिस अधीक्षकों (Superintendent of Police) के खिलाफ तत्काल अनुशासनात्मक और विभागीय कार्रवाई (Departmental Proceedings) शुरू करने का स्पष्ट निर्देश दिया है। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की दो सदस्यीय खंडपीठ ने एक आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान पुलिस अभियोजन पक्ष के बेहद गैर-जिम्मेदाराना और सुस्त रवैये पर भारी नाराजगी जताई। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया है कि वह दो सप्ताह के भीतर संबंधित सभी तत्कालीन और वर्तमान पुलिस कप्तानों के खिलाफ आरोप पत्र जारी कर जांच शुरू करे।

54 गवाहों में से केवल 2 की गवाही, शीर्ष अदालत हैरान

सुप्रीम कोर्ट में यह मामला तब खुला जब एक आपराधिक मुकदमे की धीमी प्रगति को लेकर वर्तमान मऊ एसपी व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश हुए और उन्होंने 29 अगस्त का हलफनामा पेश किया। जब पीठ ने पूछा कि 27 मार्च 2023 को सभी छह आरोपियों के खिलाफ आरोप तय (Charges Frame) होने के बाद से अब तक कितने गवाहों के बयान दर्ज कराए गए हैं, तो अभियोजन पक्ष की ओर से बताया गया कि कुल 54 गवाहों में से अब तक केवल 2 गवाहों का ही परीक्षण हो सका है। इस पर पीठ ने स्तब्ध रह जाने की बात कही और टिप्पणी की कि आरोप तय होने के तीन साल से अधिक बीत जाने के बावजूद पुलिस एजेंसी ने ट्रायल को आगे बढ़ाने में थोड़ी सी भी गंभीरता नहीं दिखाई। पीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के सामने गवाहों को सुरक्षित पेश कराने का मूल दायित्व जांच एजेंसी और जिला पुलिस प्रमुख का होता है, जिसमें मऊ पुलिस पूरी तरह विफल साबित हुई है।

2017 का अपहरण कांड और 9 साल से लापता 14 साल का मासूम

यह पूरा विवाद वर्ष 2017 के एक बेहद संवेदनशील और दर्दनाक मामले से जुड़ा हुआ है। याचिकाकर्ता के 14 वर्षीय नाबालिग बेटे का 27 सितंबर 2017 को मऊ जिले से अपहरण कर लिया गया था। घटना की प्राथमिकी दर्ज होने के नौ साल बीत जाने के बाद भी आज तक न तो उस मासूम बच्चे का कोई सुराग लग सका और न ही उसके अवशेष बरामद हुए। पीड़ित पिता ने पूरे मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) या किसी निष्पक्ष एजेंसी से कराने की गुहार लगाई थी। इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस आधार पर याचिका का निस्तारण कर दिया था कि पुलिस ने जांच पूरी कर चार्जशीट दाखिल कर दी है। इसके बाद पीड़ित पिता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां पुलिस की कार्यप्रणाली की पोल खुल गई।

मुख्य सचिव से मांगा हलफनामा, सिर्फ 'फॉर्मेलिटी' हुई तो नपेंगे उच्चाधिकारी

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश शासन को सख्त चेतावनी देते हुए कहा है कि पुलिस अधीक्षकों पर होने वाली यह कार्रवाई सिर्फ कागजी औपचारिकता (Formalities) नहीं होनी चाहिए। यदि अदालत को यह लगा कि संबंधित एसपी रैंक के अफसरों को खानापूर्ति के तौर पर कमजोर चार्जशीट थमाई गई है, तो अदालत सीधे उस सक्षम प्राधिकारी (Competent Authority) के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करेगी जिसने यह मेमो जारी किया होगा। इस मामले की अगली सुनवाई 16 नवंबर 2026 को तय की गई है। पीठ ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को निर्देश दिया है कि वे अगली सुनवाई से पहले व्यक्तिगत रूप से सत्यापित एक विस्तृत हलफनामा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल करें, जिसमें 2023 से तैनात रहे सभी मऊ एसपी के खिलाफ शुरू की गई कार्रवाई का पूरा ब्योरा दर्ज हो।