बसपा का सियासी किला दरका या 'हाथी' की लगाम पर मायावती का आखिरी दांव? आकाश आनंद के पर कतरने के पीछे की इनसाइड स्टोरी

बसपा का सियासी किला दरका या 'हाथी' की लगाम पर मायावती का आखिरी दांव? आकाश आनंद के पर कतरने के पीछे की इनसाइड स्टोरी

उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को कभी एक अभेद्य किले और कैडर आधारित अनुशासित दल की मजबूत 'दीवार' माना जाता था। लेकिन 3 सितंबर को लखनऊ में आयोजित बसपा की राष्ट्रीय बैठक के भीतर जो कुछ घटा, उसने एक बार फिर साबित कर दिया कि पार्टी में अगर कोई पत्ता भी हिलता है, तो उसकी डोर सिर्फ और सिर्फ पार्टी सुप्रीमो मायावती की उंगलियों से बंधी होती है। कभी अपना एकमात्र राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित कर चुके भतीजे आकाश आनंद को मायावती ने एक झटके में फिर से सभी अहम सांगठनिक जिम्मेदारियों से बेदखल कर दिया।

मायावती ने भरी सभा में दो टूक शब्दों में कहा कि आकाश आनंद को अभी राजनीतिक रूप से और अधिक परिपक्व होने की सख्त जरूरत है, इसलिए आगामी चुनावों को देखते हुए उन्हें किसी भी बड़े पद पर रखना पार्टी के हित में नहीं होगा। इस फैसले के चंद घंटों के भीतर ही आकाश आनंद ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर अपने बायो से 'नेशनल कोऑर्डिनेटर' का तमगा हटाकर खुद को महज एक साधारण 'बसपा कार्यकर्ता' लिख दिया। यह पिछले ढाई सालों में तीसरा मौका है जब आकाश आनंद के राजनीतिक पर कतरे गए हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव के बीच विवादित भाषण के बाद हटाया जाना, फिर माफीनामे के बाद बहाली और अब 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच यह अचानक डिमोशन बहुजन आंदोलन के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

टिकट बंटवारा और पार्टी फंड पर एकाधिकार: आखिर किस बात से खफा हुईं मायावती?

सियासी गलियारों में चर्चा इस बात की है कि क्या वाकई मामला सिर्फ 'राजनीतिक अपरिपक्वता' का है या फिर पार्टी के आंतरिक नियंत्रण को लेकर भीतरखाने कोई गहरी जंग छिड़ चुकी थी? पार्टी के विश्वस्त सूत्रों की मानें तो इस पूरे विवाद की जड़ में तीन सबसे बड़े बिंदु हैं— 2027 के विधानसभा प्रत्याशियों का चयन, पार्टी के वित्तीय संसाधनों पर नियंत्रण और आकाश के ससुर अशोक सिद्धार्थ का बढ़ता प्रभाव। बसपा के चार दशक के इतिहास में टिकट वितरण का अंतिम वीटो हमेशा मायावती के पास ही रहा है।

बताया जा रहा है कि हाल के महीनों में आकाश आनंद और उनके ससुर व पूर्व राज्यसभा सांसद अशोक सिद्धार्थ ने यूपी के कई जिलों में संभावित प्रत्याशियों की स्क्रीनिंग और पार्टी फंड जुटाने की प्रक्रिया में सीधे तौर पर दखल देना शुरू कर दिया था। मायावती पार्टी की आर्थिक धमनियों और फंड मैनेजमेंट में किसी भी तीसरे व्यक्ति का हस्तक्षेप कभी बर्दाश्त नहीं करती हैं। जब उन्हें यह भनक लगी कि पार्टी के कुछ वरिष्ठ कोऑर्डिनेटर आकाश आनंद और अशोक सिद्धार्थ के इर्द-गिर्द समानांतर शक्ति केंद्र बनाने की कोशिश कर रहे हैं, तो उन्होंने एक ही झटके में उस सिंडिकेट पर बुलडोजर चला दिया। मायावती ने यह स्पष्ट संदेश दे दिया कि बसपा में नंबर दो की कुर्सी पर बैठने वाले की मियाद तब तक ही है, जब तक वह नंबर एक की छाया में रहे।

आक्रामक राजनीति बनाम रक्षात्मक रणनीति: आकाश के तेवरों से क्यों असहज थीं बहनजी?

आकाश आनंद लंदन से पढ़कर लौटे आधुनिक मिजाज के युवा नेता हैं, जिनकी शैली मायावती की पारंपरिक और रक्षात्मक राजनीति से पूरी तरह जुदा नजर आती है। पिछले कुछ महीनों में आकाश ने जिस तरह से खुलकर आक्रामक रुख अपनाया, उससे पार्टी कैडर में नई ऊर्जा तो जरूर देखी गई, लेकिन इसने मायावती के राजनीतिक संतुलन को हिला दिया। लखनऊ में दलित कैब ड्राइवर अंकित कुमार के साथ हुए भेदभाव के मामले को आकाश ने सोशल मीडिया पर बेहद तल्खी से उठाया और सीधे तौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण संबंधी बयानों को कटघरे में खड़ा कर दिया। हालांकि मायावती भी आरक्षण पर बोलती रही हैं, लेकिन आकाश का अंदाज इतना आक्रामक था कि उसे पार्टी की आधिकारिक लाइन से अलग माना गया और बाद में वह पोस्ट डिलीट करानी पड़ी।

इसके बाद हाथरस की रैली में आकाश आनंद ने समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव और कांग्रेस नेता राहुल गांधी को सीधे 'अंकल' कहकर संबोधित किया, जिसने मीडिया में खूब सुर्खियां बटोरीं। जानकारों का मानना है कि मायावती मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में केंद्रीय जांच एजेंसियों और केंद्र सरकार के सीधे निशाने पर आने से बचती रही हैं। 2024 के चुनाव में जब आकाश ने भाजपा सरकार को 'आतंकी और तालिबानी' तक कह डाला था, तब भी मायावती ने तुरंत उन पर एफआईआर होते ही उन्हें किनारे कर दिया था। आकाश जहां सड़कों पर उतरकर आक्रामक दलित राजनीति करना चाहते हैं, वहीं मायावती प्रेस नोट और नपे-तुले बयानों के जरिए अपनी राजनीतिक जमीन बचाए रखने की पक्षधर हैं। यही वैचारिक और रणनीतिक टकराव इस अलगाव का सबसे बड़ा कारण बना।

कांशीराम के सिद्धांतों की दुहाई और ईशान आनंद की एंट्री: क्या बसपा को मिलेगा नया वारिस?

3 सितंबर की बैठक में एक और बेहद दिलचस्प और सांकेतिक दृश्य देखने को मिला। बैठक के मंच पर जहां आकाश आनंद पूरी तरह नदारद थे, वहीं उनके छोटे भाई ईशान आनंद को प्रमुखता से देखा गया। ईशान आनंद पिछले कुछ समय से पार्टी के आयोजनों में सक्रिय दिख रहे हैं। बैठक को संबोधित करते हुए मायावती ने बहुजन आंदोलन के संस्थापक कांशीराम की परंपरा का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि मान्यवर कांशीराम ने अपने जीवनकाल में अपने परिवार के लोगों को सिर्फ पार्टी में काम करने की छूट दी थी, लेकिन उन्हें कभी कोई बड़ा सांगठनिक पद नहीं दिया और न ही चुनाव लड़ाया।

मायावती का यह तर्क कई लोगों के गले नहीं उतर रहा है। सवाल यह उठ रहा है कि अगर कांशीराम के उसूलों पर ही चलना था, तो फिर दिसंबर 2023 में आकाश आनंद को भव्य तरीके से अपना उत्तराधिकारी क्यों घोषित किया गया था? क्यों उनके पिता आनंद कुमार को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांशीराम का नाम केवल आकाश आनंद के पर कतरने के लिए ढाल के रूप में इस्तेमाल किया गया है। ईशान आनंद की बैठक में मौजूदगी से अब यह कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या मायावती अपने परिवार के भीतर ही 'डिवाइड एंड रूल' के जरिए शक्ति संतुलन बनाए रखना चाहती हैं?

चंद्रशेखर आज़ाद की दहाड़ और अखिलेश का 'पीडीए': बसपा के सामने वजूद का सबसे बड़ा संकट

आकाश आनंद पर लिए गए इस फैसले का सबसे भयानक असर बहुजन समाज पार्टी के जमीनी कैडर और दलित वोट बैंक पर पड़ सकता है। कभी 2007 में अपने दम पर 206 सीटें जीतकर उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली बसपा आज अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी महज 1 सीट और 13 प्रतिशत वोट शेयर पर सिमट गई थी, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का खाता तक नहीं खुला और उसका वोट बैंक घटकर 9.3 प्रतिशत के ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गया।

इस शून्य के बीच पश्चिमी उत्तर प्रदेश से उभरे युवा दलित नेता चंद्रशेखर आज़ाद (आज़ाद समाज पार्टी) नगीना से सांसद बनकर सीधे संसद पहुंच चुके हैं। चंद्रशेखर की आक्रामक, आंदोलनकारी और सड़क पर उतरने वाली राजनीति दलित युवाओं को तेजी से अपनी ओर खींच रही है। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव अपने 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के जरिए बसपा के पारंपरिक गैर-जाटव और पासी-वाल्मीकि वोट बैंक में जबर्दस्त सेंधमारी कर चुके हैं। राहुल गांधी का 'संविधान बचाओ' और 'जाति जनगणना' का नैरेटिव भी दलित समाज के एक बड़े तबके को कांग्रेस की तरफ मोड़ रहा है। ऐसे में आकाश आनंद ही बसपा का एकमात्र ऐसा चेहरा थे जो सोशल मीडिया और युवाओं के बीच चंद्रशेखर और अखिलेश की काट बनते दिख रहे थे। उन्हें बार-बार 'इन-आउट' करके मायावती खुद अपने युवा कैडर में भयंकर असमंजस पैदा कर रही हैं।

क्या ढह जाएगी काशीराम की विरासत? कार्यकर्ताओं में मायूसी और भविष्य का अंधियारा

आकाश आनंद पर मायावती का यह ताजा वार भले ही पार्टी पर उनके व्यक्तिगत वर्चस्व को बरकरार रखने में कामयाब रहा हो, लेकिन इसने बहुजन आंदोलन के भविष्य पर खतरे की घंटी बजा दी है। जब किसी पार्टी का सर्वोच्च नेतृत्व अपने ही तय किए गए उत्तराधिकारी को बार-बार 'अपरिपक्व' कहकर सार्वजनिक रूप से अपमानित करे, तो उस दल के समर्थकों में निराशा का फैलना स्वाभाविक है। जमीनी स्तर के कार्यकर्ता यह समझ नहीं पा रहे हैं कि वे आकाश आनंद की रैलियों में जाएं, उन्हें अपना भविष्य का नेता मानें या फिर मायावती के मूड के हिसाब से अपनी निष्ठाएं बदलते रहें।

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव अब ज्यादा दूर नहीं हैं। ऐसे नाजुक वक्त में जब बसपा को एक नए तेवर, मजबूत संगठन और आक्रामक चेहरे के साथ मैदान में उतरना चाहिए था, तब पार्टी अपने ही घर के झगड़ों और वर्चस्व की लड़ाई में उलझी हुई है। अगर मायावती इसी तरह युवा नेतृत्व के पर कतरती रहीं और पार्टी के दरवाजों को बंद कमरे की राजनीति तक सीमित रखा, तो वह दिन दूर नहीं जब बहुजन राजनीति की यह ऐतिहासिक 'दीवार' पूरी तरह भरभरा कर गिर जाएगी और कांशीराम का बनाया विशाल साम्राज्य केवल इतिहास की किताबों का हिस्सा बनकर रह जाएगा।