एक ही परिवार को SC-ST एक्ट में 23 लाख का मुआवजा, हाईकोर्ट को आशंका; पूरे यूपी में जांच के आदेश

एक ही परिवार को SC-ST एक्ट में 23 लाख का मुआवजा, हाईकोर्ट को आशंका; पूरे यूपी में जांच के आदेश

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) और नियमावली 1995 के तहत मिलने वाली सरकारी आर्थिक सहायता को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत के संज्ञान में आया है कि झांसी जिले में एक ही परिवार को विभिन्न आपराधिक मुकदमों के जरिए सरकारी खजाने से 23 लाख रुपये से अधिक का मुआवजा जारी किया जा चुका है। इस खुलासे के बाद हाईकोर्ट ने इसे 'जांच योग्य' संदिग्ध पैटर्न माना और उत्तर प्रदेश सरकार को पूरे राज्य में ऐसे मामलों की गहन जांच करने का निर्देश दिया है।

न्यायमूर्ति संतोष राय की एकल पीठ ने झांसी से जुड़ी आपराधिक अपीलों पर सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यद्यपि बार-बार मुकदमे दर्ज कराना अपने आप में किसी कानून के दुरुपयोग का सीधा प्रमाण नहीं है, लेकिन मुकदमों की इतनी बड़ी संख्या, बार-बार राहत राशि का दावा और करोड़ों के दावों की पुनरावृत्ति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

क्या है पूरा मामला: झांसी के वकील परिवार को मिली 23.36 लाख की रकम

यह मामला तब सामने आया जब झांसी निवासी अरविंद कुमार व अन्य और संतोष कुमार धोहरे (जो पेशे से अधिवक्ता हैं) ने विशेष न्यायाधीश (SC/ST Act) झांसी के 23 जुलाई 2024 के उस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दाखिल की, जिसमें बकाया राहत राशि का आवेदन खारिज कर दिया गया था।

अपीलकर्ताओं का कहना था कि विवेचक द्वारा प्रत्येक पीड़ित को 2 लाख रुपये की राहत राशि का प्रस्ताव भेजा गया था, जिसके तहत चार्जशीट दाखिल होने तक कुल राशि का 75 फीसदी (1.50 लाख रुपये) मिलना चाहिए था। लेकिन जिला समाज कल्याण अधिकारी, झांसी ने केवल 37.5 फीसदी यानी 75,000 रुपये जारी किए और बाकी रकम रोक ली। जब पीड़ितों ने विशेष अदालत का रुख किया, तो अदालत ने यह कहते हुए अर्जी खारिज कर दी कि उसे राशि बढ़ाने का अधिकार नहीं है।

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश हुए वकीलों ने एक चौंकाने वाला आंकड़ा अदालत के सामने रखा। राज्य सरकार ने बताया कि अपीलकर्ता संतोष कुमार धोहरे और उनके परिवार के सदस्यों को अब तक दर्ज कराए गए विभिन्न आपराधिक मामलों में कुल 23,36,250 रुपये की वित्तीय राहत राशि दी जा चुकी है। इसके अलावा, इसी परिवार से जुड़े 10 से 12 अन्य मामलों में भी राहत राशि के दावे जिला स्तरीय समिति के समक्ष अभी भी विचाराधीन हैं। अपीलकर्ता पक्ष इन तथ्यों का खंडन नहीं कर सका।

निचली अदालत की व्याख्या गलत, विशेष अदालत सिर्फ औपचारिकता निभाने वाला निकाय नहीं

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में झांसी की विशेष अदालत के फैसले को खारिज करते हुए कहा कि निचली अदालत ने SC/ST नियमावली 1995 के नियम 12(7) की व्याख्या करने में भूल की। कोर्ट ने रेखांकित किया कि विशेष अदालत केवल एक औपचारिक निकाय नहीं है, बल्कि उसके पास सक्रिय न्यायिक समीक्षा (Active Judicial Scrutiny) का अधिकार है।

यदि प्रशासनिक अधिकारी मनमाने ढंग से वैधानिक राहत राशि में कटौती करते हैं या भुगतान में अनुचित देरी करते हैं, तो विशेष अदालत के पास यह अधिकार है कि वह अपराध के तत्वों की जांच कर उचित बकाया भुगतान का आदेश दे। हाईकोर्ट ने विशेष अदालत को निर्देश दिया कि वह 6 सप्ताह के भीतर दोनों मामलों में अपराध की प्रकृति को तय करते हुए नए सिरे से गुण-दोष के आधार पर फैसला करे।

झांसी के डीएम और एसएसपी को 3 महीने में निष्पक्ष जांच का आदेश

हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए झांसी के जिलाधिकारी (DM) और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) को निर्देश दिया कि वे आपस में समन्वय स्थापित कर संतोष कुमार धोहरे और उनके परिवार द्वारा दर्ज कराए गए सभी मुकदमों, उनके आपराधिक इतिहास और प्राप्त की गई राहत राशि की विस्तृत व निष्पक्ष जांच पूरी करें।

अदालत ने सख्त हिदायत दी कि यह जांच तीन महीने के भीतर पूरी होनी चाहिए। यदि जांच में यह साबित होता है कि किसी ने योजना का अनुचित लाभ उठाने के लिए कानून का दुरुपयोग किया है, तो संलिप्त व्यक्तियों के साथ-साथ इसमें मिलीभगत करने वाले जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ भी कठोर दंडात्मक और कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

पूरे उत्तर प्रदेश में बनेगा सख्त मॉनिटरिंग सिस्टम: वास्तविक पीड़ितों का न हो नुकसान

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले के जरिए पूरे उत्तर प्रदेश में SC/ST एक्ट के तहत बांटे जाने वाले राहत फंड की कार्यप्रणाली पर कड़े दिशा-निर्देश जारी किए। कोर्ट ने मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव (गृह), डीजीपी और सभी जिलों के जिला जजों व जिलाधिकारियों को आदेश की प्रति भेजने का निर्देश दिया है।

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि प्रदेश भर में बार-बार मुआवजा क्लेम करने वाले मामलों की जांच की जाए और एक ऐसा मजबूत नियामक तंत्र (Regulatory Framework) व निगरानी व्यवस्था विकसित की जाए जिससे सरकारी खजाने का दुरुपयोग रुके। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस आदेश का उद्देश्य किसी वास्तविक पीड़ित के दावे को पूर्वाग्रह या संदेह की दृष्टि से देखना नहीं है। एससी-एसटी एक्ट अत्याचार के वास्तविक पीड़ितों के पुनर्वास के लिए एक पवित्र कल्याणकारी प्रावधान है और इसकी विश्वसनीयता बनाए रखना अत्यंत जरूरी है।

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