आजम खान की जौहर यूनिवर्सिटी पर फिलहाल नहीं चलेगा बुलडोजर, 38 इमारतों के ध्वस्तीकरण पर कमिश्नर कोर्ट की रोक 25 अगस्त तक जारी; दोनों पक्षों से मांगे गए पुख्ता साक्ष्य
उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले में स्थित समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री मोहम्मद आजम खान के ड्रीम प्रोजेक्ट 'मौलाना मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी' को लेकर चल रहे कानूनी विवाद में विश्वविद्यालय प्रबंधन को बड़ी राहत मिली है। रामपुर विकास प्राधिकरण (RDA) द्वारा यूनिवर्सिटी परिसर के 38 भवनों को अवैध घोषित कर गिराने के दिए गए आदेश पर मुरादाबाद मंडलायुक्त न्यायालय ने अंतरिम रोक को आगामी 25 अगस्त तक के लिए बरकरार रखा है। मंडलायुक्त न्यायालय में दोनों पक्षों की ओर से जोरदार बहस और कानूनी दलीलें पेश की गईं, जिसके बाद अदालत ने यूनिवर्सिटी ट्रस्ट और सरकारी पक्ष दोनों को अपने दावों के समर्थन में आवश्यक साक्ष्य एवं तकनीकी दस्तावेज दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। जब तक इस मामले की अगली सुनवाई पूरी नहीं हो जाती, तब तक विश्वविद्यालय परिसर में किसी भी प्रकार की तोड़फोड़ या ध्वस्तीकरण कार्रवाई पर पूर्ण पाबंदी रहेगी।
15 जुलाई का वो आदेश और 38 इमारतों पर बुलडोजर का संकट
इस पूरे विवाद की शुरुआत 15 जुलाई को हुई थी जब रामपुर विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष एवं तत्कालीन जिलाधिकारी ने उत्तर प्रदेश नगर योजना एवं विकास अधिनियम 1973 की धारा 27 के तहत एक सख्त आदेश पारित किया था। प्राधिकरण की जांच रिपोर्ट में यह दावा किया गया था कि जौहर यूनिवर्सिटी के कुल 40 प्रमुख भवनों में से केवल मेडिकल कॉलेज और एक अन्य अकादमिक ब्लॉक के पास ही वैध नक्शा और निर्माण स्वीकृति मौजूद है।
प्राधिकरण ने अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया था कि शेष 38 भवनों का निर्माण बिना ले-आउट प्लान पास कराए और बिना सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के लगभग 82,309 वर्ग मीटर के विशाल क्षेत्र में अवैध रूप से किया गया है। इसके आधार पर आरडीए ने यूनिवर्सिटी प्रबंधन को 15 से 20 दिनों के भीतर इन सभी 38 भवनों को स्वयं ध्वस्त करने का कड़ा नोटिस थमा दिया था और चेतावनी दी थी कि ऐसा न करने पर प्रशासनिक स्तर पर बुलडोजर चलाकर इन संरचनाओं को गिरा दिया जाएगा। इस आदेश के आते ही विश्वविद्यालय में पढ़ रहे हजारों छात्र-छात्राओं, शिक्षकों और आजम खान के समर्थकों में भारी हड़कंप मच गया था।
कमिश्नर कोर्ट की शरण और अंतरिम स्थगन आदेश का कानूनी सफर
रामपुर विकास प्राधिकरण के इस ध्वस्तीकरण आदेश के खिलाफ मौलाना मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट ने तुरंत कानूनी मोर्चा खोला। ट्रस्ट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जुनैद एजाज जाफरी ने मुरादाबाद के मंडलायुक्त आंजनेय कुमार सिंह की अदालत में अपील दायर कर आरडीए के आदेश को दुर्भावनापूर्ण और एकतरफा बताते हुए चुनौती दी।
ट्रस्ट की ओर से दलील दी गई कि विश्वविद्यालय एक प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान है, जहां देश-विदेश और खासकर आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि के हजारों बच्चे उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। यदि अचानक भवनों पर बुलडोजर चला दिया गया, तो छात्रों का शैक्षणिक भविष्य पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा। 27 जुलाई को मामले की गंभीरता को देखते हुए मंडलायुक्त ने ध्वस्तीकरण की कार्रवाई पर पहली अंतरिम रोक लगाई थी। इसके बाद से ही विभिन्न कानूनी आपत्तियों, अधिवक्ताओं के शोक प्रस्ताव और दस्तावेजों के आदान-प्रदान के कारण सुनवाई आगे बढ़ती रही और अब अदालत ने इस रोक को 25 अगस्त तक विस्तार दे दिया है।
पीडब्ल्यूडी के पुराने दस्तावेज और 14 इमारतों के रिकॉर्ड पर रार
मुरादाबाद आयुक्त न्यायालय में हाल ही में हुई सुनवाई के दौरान नक्शों और निर्माण रिकॉर्ड्स को लेकर दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस देखने को मिली। जौहर यूनिवर्सिटी ट्रस्ट की ओर से अदालत को बताया गया कि विश्वविद्यालय के निर्माण से जुड़े कई अत्यंत महत्वपूर्ण साक्ष्य और स्वीकृतियां लोक निर्माण विभाग (PWD) रामपुर और तत्कालीन जिला प्रशासन के रिकॉर्ड में दर्ज हैं।
ट्रस्ट के अधिवक्ताओं ने दावा किया कि वर्ष 2008 तक निर्मित 14 प्रमुख इमारतों और 13 निर्माणाधीन ब्लॉकों से संबंधित विस्तृत फाइलें और अनापत्ति प्रमाण पत्र सरकारी विभागों के पास मौजूद हैं, जिन्हें अदालत के माध्यम से तलब किया जाना न्यायहित में अनिवार्य है। वहीं, दूसरी तरफ आरडीए के विशेष अधिवक्ता ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि जब ट्रस्ट ने निर्माण कराया था, तो स्वीकृत नक्शों की मूल प्रतियां उनके पास होनी चाहिए थीं, न कि वे विभिन्न विभागों से रिकॉर्ड मंगाकर मामले को अनावश्यक रूप से लंबा खींचें। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद संबंधित विभागों को लंबित साक्ष्य जल्द पेश करने के निर्देश दिए हैं।
नदी की जमीन, शत्रु संपत्ति और सुरक्षा मानकों पर उठे सवाल
सरकारी पक्ष की ओर से सुनवाई के दौरान केवल नक्शे का मुद्दा ही नहीं उठाया गया, बल्कि यूनिवर्सिटी परिसर की भूमि की स्थिति और सुरक्षा पहलुओं को लेकर भी कई गंभीर बिंदु रखे गए। राज्य सरकार के वकीलों ने तर्क दिया कि कुछ भवनों का निर्माण कोसी नदी के बहाव क्षेत्र और रेतीली जमीन के करीब हुआ है, जिससे भविष्य में प्राकृतिक आपदा के समय छात्रों की सुरक्षा को गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।
इसके अतिरिक्त तहसील प्रशासन से गाटा संख्या, निर्माण क्षेत्र, शत्रु संपत्ति और सरकारी चकबंदी भूमि से संबंधित एक विस्तृत स्थलीय सत्यापन रिपोर्ट भी मांगी गई थी। हालांकि, राजस्व विभाग द्वारा पेश की गई प्रारंभिक रिपोर्ट अधूरी पाई गई, जिसे अदालत के निर्देश पर दोबारा व्यापक जांच के लिए भेजा गया है। वहीं, जौहर पक्ष ने एक बड़ा कानूनी सवाल यह भी उठाया कि जिस कानून और धाराओं के तहत प्राधिकरण ने इतनी बड़ी कार्रवाई प्रस्तावित की है, वह उन निर्माणों पर भूतलक्षी प्रभाव (रेट्रोस्पेक्टिव इफेक्ट) से लागू ही नहीं हो सकती।
राजनीतिक सरगर्मियां तेज: सपा ने बनाया बड़ा सियासी मुद्दा
जौहर यूनिवर्सिटी के ध्वस्तीकरण का मामला केवल अदालत की चौखट तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसने उत्तर प्रदेश की सियासत में भी भारी उबाल ला दिया है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से लेकर वरिष्ठ नेता शिवपाल सिंह यादव तक पूरी पार्टी आजम खान और उनकी इस यूनिवर्सिटी के पक्ष में खुलकर खड़ी हो गई है। सपा ने आरोप लगाया है कि मौजूदा सरकार राजनीतिक प्रतिशोध के तहत एक महान शैक्षणिक संस्थान को बर्बाद करने पर तुली हुई है।
हाल ही में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव शिवपाल यादव ने रामपुर पहुंचकर जिला जेल में बंद आजम खान और उनके पुत्र अब्दुल्ला आजम से मुलाकात की थी और इसके तुरंत बाद वे जौहर यूनिवर्सिटी परिसर भी पहुंचे थे। शिवपाल यादव ने खुले मंच से चेतावनी दी थी कि समाजवादी पार्टी जौहर यूनिवर्सिटी की एक भी ईंट नहीं खिसकने देगी और सत्ता में आने पर इस तरह के बदले की कार्रवाई करने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएंगे। वहीं विश्वविद्यालय के छात्र भी सड़कों पर उतरकर कई दिनों तक शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर चुके हैं।
25 अगस्त की सुनवाई पर टिकीं सबकी निगाहें
मुरादाबाद के मंडलायुक्त न्यायालय ने तीन अलग-अलग अर्जियों पर सुनवाई पूरी करते हुए अपना फैसला सुरक्षित रखा है और अगली तारीख 25 अगस्त तय की है। 25 अगस्त को होने वाली यह सुनवाई न केवल जौहर यूनिवर्सिटी के 38 भवनों के भविष्य का फैसला करेगी, बल्कि यह भी तय करेगी कि क्या प्रशासन को इन इमारतों के नियमितीकरण (कंपाउंडिंग) का मौका देना चाहिए या फिर ध्वस्तीकरण की तलवार ऐसे ही लटकी रहेगी।
फिलहाल 25 अगस्त तक यथास्थिति बरकरार रहने से विश्वविद्यालय प्रबंधन, शिक्षकों और वहां पढ़ रहे हजारों विद्यार्थियों ने राहत की सांस ली है। इस बहुचर्चित कानूनी जंग पर अब पूरे प्रदेश के राजनीतिक पंडितों और कानून के जानकारों की निगाहें टिकी हुई हैं।