लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे पर नया संकट: सड़क धंसने से राहत मिलते ही उखड़ने लगी तारकोल की परत, हाई-स्पीड रफ्तार पर ब्रेक

लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे पर नया संकट: सड़क धंसने से राहत मिलते ही उखड़ने लगी तारकोल की परत, हाई-स्पीड रफ्तार पर ब्रेक

राजधानी लखनऊ को औद्योगिक नगरी कानपुर से जोड़ने वाले बहुप्रतीक्षित लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे और उससे जुड़े राष्ट्रीय राजमार्ग कॉरिडोर पर आवागमन करने वाले हजारों मुसाफिरों की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। पिछले दिनों भारी बारिश और निर्माणगत खामियों के चलते जगह-जगह सड़क धंसने की घटनाओं से जूझ रहे इस व्यस्त मार्ग पर अब एक नई तकनीकी व ढांचागत समस्या सामने आ गई है। हाईवे के कई महत्वपूर्ण हिस्सों पर डामर (तारकोल) की ऊपरी परत बुरी तरह उखड़कर बिखरने लगी है।

सड़क धंसने के बड़े गड्ढों की मरम्मत के बाद वाहन चालकों ने राहत की सांस ली ही थी कि अब सतह से तारकोल हटने के कारण सड़क पर नुकीली गिट्टियां फैल गई हैं, जिससे 100 से 120 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ने वाले वाहनों का संतुलन बिगड़ने और टायरों के फटने का गंभीर जोखिम पैदा हो गया है।

धंसने की आफत से राहत, लेकिन उखड़ते डामर ने बढ़ाई रफ्तार पर ब्रेक

लखनऊ-कानपुर मार्ग पर पिछले कुछ महीनों के दौरान मिट्टी के कटाव और पुलिया के पास एप्रोच रोड धंसने की कई घटनाएं सामने आई थीं। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) और संबंधित निर्माण एजेंसियों ने इन संवेदनशील स्थानों पर कंक्रीट ग्राउटिंग, पत्थरों की पिचिंग और दोबारा भराव कर धंसने की समस्या पर काफी हद तक काबू पा लिया है।

हालांकि, राहत का यह दौर ज्यादा दिन नहीं टिक सका। अब एक्सप्रेसवे के मुख्य कैरिजवे और सर्विस लेन्स के कई किलोमीटर लंबे हिस्से में बिटुमिनस कंक्रीट (तारकोल की ऊपरी लेयर) अपनी पकड़ छोड़ रही है। सड़क की ऊपरी फिनिशिंग छिल जाने से सड़क खुरदुरी हो गई है, जिससे न केवल वाहनों की गति धीमी हो रही है बल्कि अचानक ब्रेक लगाने पर गाड़ियां फिसलने की शिकायतें भी तेजी से बढ़ रही हैं।

बंथरा, सोहरामऊ और नवाबगंज के पास सबसे बुरा हाल

स्थानीय स्तर पर पड़ताल करने पर सामने आया है कि सड़क की सतह उखड़ने की यह समस्या लखनऊ के बंथरा और सरोजिनी नगर से शुरू होकर उन्नाव जिले के सोहरामऊ, अजगैन, नवाबगंज पक्षी विहार कट और जाजमऊ गंगा पुल के समीपवर्ती हिस्सों में सबसे ज्यादा देखी जा रही है।

  • बंथरा और पिपरसंड कट: लखनऊ सीमा के पास भारी वाहनों के दबाव और लगातार टर्निंग वाले स्थानों पर तारकोल की गिट्टियां अलग-अलग होकर सड़क के किनारों पर जमा हो गई हैं। दोपहिया वाहन चालकों के लिए यह हिस्सा बेहद खतरनाक साबित हो रहा है, क्योंकि अचानक मुड़ते समय बाइक फिसलने की घटनाएं बढ़ गई हैं।

  • सोहरामऊ से नवाबगंज स्ट्रेच: इस लंबे हिस्से पर कई जगहों पर सड़क की ऊपरी 40 से 50 मिलीमीटर की तारकोल परत उखड़ चुकी है, जिसके नीचे का सूखा बेस कोर्स साफ दिखाई देने लगा है।

  • उन्नाव बाईपास और अचलगंज मोड़: कानपुर की ओर बढ़ते समय उन्नाव बाईपास के पास सड़क की सतह उबड़-खाबड़ हो चुकी है, जिससे रात के समय तेज रोशनी में गड्ढों और उखड़ी गिट्टियों का अंदाजा लगाना चालकों के लिए मुश्किल हो जाता है।

घटिया बिटुमिन मिक्स, पानी का रिसाव और ओवरलोडिंग का तिहरा वार

हाईवे इंजीनियरिंग विशेषज्ञों और स्थानीय तकनीशियनों के अनुसार, तारकोल की परत उखड़ने (Bitumen Stripping) के पीछे मुख्य रूप से तीन तकनीकी कारण जिम्मेदार माने जा रहे हैं:

  • बिटुमिन इमल्शन और तापमान में गड़बड़ी: सड़क निर्माण के दौरान डामर और गिट्टी के मिश्रण (Asphalt Concrete Mix) को बिछाते समय तय तापमान (Laying Temperature) का ध्यान न रखा जाना। यदि तारकोल का तापमान कम हो जाता है, तो वह गिट्टी के साथ रासायनिक बंधन (Bonding) नहीं बना पाता।

  • जलभराव और ड्रेनेज की खामी: मानसून के दौरान सड़क की सतह पर पानी का ठहराव होना। पानी जब डामर की सूक्ष्म दरारों के भीतर घुसता है, तो भारी वाहनों के पहियों के दबाव से हाइड्रोलिक प्रेशर बनता है, जो तारकोल को पत्थर से अलग कर देता है।

  • कानपुर-लखनऊ रूट पर भारी मालवाहक ट्रैफिक: यह रूट उत्तर भारत के सबसे व्यस्त मालवाहक कॉरिडोरों में से एक है। निर्धारित क्षमता से अधिक भार (Overloaded Trucks) लेकर गुजरने वाले भारी ट्रकों के लगातार घर्षण से कमजोर डामर तुरंत उखड़ जाता है।

45 मिनट में सफर का सपना और वर्तमान जमीनी हकीकत

लखनऊ और कानपुर के बीच बन रहे 6-लेन के नए एक्सप्रेसवे प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य दोनों शहरों के बीच की 85 किलोमीटर की दूरी और सफर के समय को घटाकर मात्र 40 से 45 मिनट करना है। राजधानी के अमौसी एयरपोर्ट से लेकर कानपुर के आजाद नगर/गंगा बैराज तक सिग्नल-फ्री कनेक्टिविटी देने का यह एक ड्रीम प्रोजेक्ट है।

वर्तमान में जहां एक तरफ एलिवेटेड सेक्शन और नए ग्रीनफील्ड एलाइनमेंट पर काम चल रहा है, वहीं मौजूदा हाईवे स्ट्रेच पर सतह के इस तरह उखड़ने से रोजाना सफर करने वाले दैनिक यात्रियों (Daily Commuters), व्यापारियों और एंबुलेंस जैसी आपातकालीन सेवाओं को भारी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है। 45 मिनट के सुगम सफर के सपने के बीच उबड़-खाबड़ सड़क सफर के समय को 2 से 2.5 घंटे तक खींच रही है।

एनएचएआई (NHAI) और कार्यदायी संस्थाओं की भूमिका पर सवाल

स्थानीय नागरिकों और नियमित वाहन चालकों का आरोप है कि निर्माण एजेंसियों द्वारा नियमित गुणवत्ता जांच (Quality Audit) में लापरवाही बरती जा रही है। सड़क पर जहां-जहां से तारकोल उखड़ता है, वहां ठेकेदार केवल कच्चा डामर या कोल्ड-मिक्स डालकर खानापूरी कर देते हैं। कुछ ही दिनों बाद तेज धूप और वाहनों के दबाव से यह पैचवर्क भी बिखर जाता है।

यातायात विशेषज्ञों का कहना है कि डिफेक्ट लायबिलिटी पीरियड (DLP) के तहत संबंधित निर्माण कंपनी की यह कानूनी जिम्मेदारी बनती है कि वह सड़क की सतह को पूरी तरह समतल और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाए रखे। अस्थायी पैचवर्क की जगह प्रभावित हिस्सों पर आधुनिक 'मिलिंग मशीन' चलाकर पुरानी खराब परत को हटाना चाहिए और नए सिरे से हॉट-मिक्स बिटुमिनस कंक्रीट (HMA) बिछाना चाहिए।

सड़क सुरक्षा को लेकर उठ रही सख्त कदम उठाने की मांग

इस व्यस्त राजमार्ग पर रोजाना 50,000 से अधिक छोटे-बड़े वाहन गुजरते हैं। उखड़े तारकोल और फैली बजरी के कारण हाल के दिनों में कई गाड़ियां अनियंत्रित होकर डिवाइडर से टकरा चुकी हैं। वाहन चालकों ने सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय और उत्तर प्रदेश सरकार से मांग की है कि लखनऊ-कानपुर रूट की सड़क गुणवत्ता की थर्ड-पार्टी तकनीकी जांच कराई जाए और टोल प्लाजा पर टैक्स वसूलने के साथ-साथ सुरक्षित व गड्ढामुक्त सड़क उपलब्ध कराई जाए।