अब जिले का नाम 'संत रविदासनगर भदोही' होगा: योगी कैबिनेट की मुहर के पीछे छिपा बड़ा सियासी संदेश

अब जिले का नाम 'संत रविदासनगर भदोही' होगा: योगी कैबिनेट की मुहर के पीछे छिपा बड़ा सियासी संदेश

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में लोकभवन में संपन्न हुई मंत्रिपरिषद की बैठक में कालीन नगरी के नामकरण को लेकर एक ऐतिहासिक निर्णय पर मुहर लगा दी गई है। प्रदेश सरकार ने जिले का आधिकारिक नाम बदलकर अब 'संत रविदासनगर भदोही' करने के प्रस्ताव को औपचारिक स्वीकृति दे दी है। वित्त मंत्री सुरेश खन्ना ने कैबिनेट ब्रीफिंग में जानकारी दी कि संत परंपरा, सामाजिक समरसता और स्थानीय पहचान के समन्वय को आधार बनाते हुए यह निर्णय उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 6(2) के तहत लिया गया है।

यह केवल एक प्रशासनिक नामकरण नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में दशकों से चल रहे 'पहचान और प्रतीकों के संग्राम' का एक नया और बेहद रणनीतिक अध्याय है। मुख्यमंत्री द्वारा जिले के नाम में 'संत रविदास' के साथ-साथ 'भदोही' शब्द को भी बरकरार रखने के फैसले के पीछे गहरे सामाजिक और चुनावी मायने छिपे हैं।

नामकरण का राजनीतिक इतिहास: मायावती से अखिलेश और अब योगी सरकार

भदोही का नाम बदलने का सिलसिला पिछले तीन दशकों में राजनीतिक दलों के सत्ता में आने और जाने के साथ बदलता रहा है:

  • 1994 में गठन: 30 जून 1994 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने वाराणसी जिले का विभाजन कर स्वतंत्र भदोही जिले का गठन किया था।

  • 1997 में मायावती का फैसला: 4 दिसंबर 1997 को बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपनी सरकार के दौरान दलित चेतना और संत परंपरा के सम्मान में इसका नाम बदलकर 'संत रविदास नगर' कर दिया था।

  • 2014 में अखिलेश सरकार द्वारा वापसी: 6 दिसंबर 2014 को अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा सरकार ने मायावती के फैसले को पलटते हुए संत रविदास का नाम हटाकर इसका नाम पुनः केवल 'भदोही' कर दिया था।

  • 2026 में योगी कैबिनेट की मुहर: अब योगी सरकार ने दोनों नामों को जोड़कर एक नया संतुलन साधते हुए आधिकारिक तौर पर जिले का नाम 'संत रविदासनगर भदोही' कर दिया है।

योगी कैबिनेट के फैसले के सियासी संदेश

1. दलित समाज को सीधा संदेश और बसपा के कोर वोटबैंक में सेंध

संत रविदास दलित समाज (विशेष रूप से जाटव/रविदासिया समुदाय) की अगाध आस्था और सामाजिक क्रांति के सबसे बड़े प्रतीक हैं। सपा सरकार द्वारा जिले से संत रविदास का नाम हटाए जाने को लेकर दलित समाज में लंबे समय से एक टीस थी। योगी सरकार ने संत रविदास का नाम पुनः जोड़कर यह संदेश दिया है कि भारतीय जनता पार्टी महापुरुषों और संतों की विरासत का सम्मान करने में सबसे आगे है। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के घटते जनाधार के बीच भाजपा इस कदम के जरिए पूर्वांचल और पूरे प्रदेश के दलित मतदाताओं को अपने पाले में मजबूती से बांधने की रणनीति पर काम कर रही है।

2. राजभर समाज और स्थानीय ऐतिहासिक अस्मिता का सम्मान

जिले के नाम से 'भदोही' शब्द को हटाया नहीं गया, बल्कि उसे नए नाम का अभिन्न हिस्सा बनाया गया है। भदोही का ऐतिहासिक संबंध प्राचीन 'भार राज' (भर/राजभर राजवंश) से जोड़ा जाता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में राजभर समुदाय एक प्रभावशाली राजनीतिक ताकत है। यदि केवल 'संत रविदास नगर' किया जाता तो स्थानीय स्तर पर पहचान मिटने की नाराजगी हो सकती थी। दोनों नामों को जोड़कर सरकार ने राजभर समाज और स्थानीय निवासियों की ऐतिहासिक भावना को भी संतुष्ट रखा है।

3. समाजवादी पार्टी को बैकफुट पर धकेलने की रणनीति

अखिलेश यादव लगातार 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नारा देकर गैर-सवर्ण जातियों को लामबंद करने में जुटे हैं। इस फैसले के जरिए भाजपा सपा को इस मोर्चे पर घेरने का मौका पा चुकी है कि सपा ने अपनी सरकार में संत रविदास का नाम हटाया था, जबकि भाजपा ने इसे पुनर्स्थापित किया। यह कदम सपा के दलित-हितैषी दावों पर वैचारिक प्रहार करने का काम करेगा।

4. 'कारपेट सिटी' के अंतरराष्ट्रीय ब्रांड की सुरक्षा

भदोही का हस्तनिर्मित कालीन उद्योग वैश्विक स्तर पर 'भदोही कार्पेट्स' (Bhadohi Carpets) के नाम से जीआई टैग और अंतरराष्ट्रीय पहचान रखता है। जिले से सालाना हजारों करोड़ रुपये का कालीन निर्यात अमेरिका, यूरोप और खाड़ी देशों को होता है। नाम में 'भदोही' बनाए रखने से वैश्विक खरीदारों, निर्यातकों और निर्यात संवर्धन संवर्ग को किसी भी प्रकार की प्रशासनिक या ब्रांडिंग से जुड़ी दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ेगा।

वैधानिक प्रक्रिया और आगे की राह

कैबिनेट से प्रस्ताव पास होने के बाद अब राज्य सरकार राजस्व संहिता के तहत गजट अधिसूचना जारी करेगी। इसके बाद केंद्र सरकार के 1953 के संबंधित दिशा-निर्देशों के अनुरूप केंद्रीय गृह मंत्रालय और सर्वे ऑफ इंडिया को औपचारिक जानकारी भेजी जाएगी, जिससे रेलवे स्टेशनों, डाक विभाग और आधिकारिक मानचित्रों में नए नाम का अंकन शुरू हो सके।