कौन हैं इमरान मसूद? जिन्हें यूपी चुनाव से पहले कांग्रेस ने बनाया कार्यकारी अध्यक्ष
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की बिसात बिछने से पहले कांग्रेस आलाकमान ने अपने संगठनात्मक ढांचे में बड़ा फेरबदल करते हुए पश्चिमी यूपी के दिग्गज और मुखर नेता इमरान मसूद को प्रदेश कांग्रेस कमेटी (UPCC) का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया है। सहारनपुर से मौजूदा लोकसभा सांसद इमरान मसूद की पहचान एक ऐसे जमीनी नेता के तौर पर है, जिनकी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुस्लिम और दलित वोटरों के बीच गहरी पैठ मानी जाती है। आराधना मिश्रा 'मोना' को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के साथ ही इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष का दायित्व सौंपना यह साफ दर्शाता है कि कांग्रेस आगामी चुनाव में अपने पारंपरिक सामाजिक समीकरणों को पूरी मजबूती से साधने के मूड में है।
राजनीतिक विरासत और शुरुआती सफर: काजी परिवार से संबंध
इमरान मसूद का जन्म पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बेहद प्रभावशाली और प्रतिष्ठित सियासी परिवार में हुआ। वे पूर्व केंद्रीय मंत्री और कद्दावर नेता रहे स्वर्गीय काजी रशीद मसूद के भतीजे हैं। अपने चाचा की उंगली पकड़कर राजनीति की बारीकियां सीखने वाले इमरान ने जमीनी स्तर से अपने सियासी सफर की शुरुआत की।
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नगर पालिका चेयरमैन से शुरुआत: साल 2006 में वे पहली बार सहारनपुर नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष चुने गए, जहां उन्होंने स्थानीय जनता के बीच अपनी सीधी पहुंच बनाई।
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2007 में विधानसभा में एंट्री: 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उन्होंने मुजफ्फराबाद (अब बेहट) सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा और दिग्गज पार्टियों को मात देकर विधायक बने।
चर्चाओं और विवादों से पुराना नाता: जब राष्ट्रीय सुर्खियों में आए
इमरान मसूद का नाम 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान देश भर की मीडिया में गूंज उठा था। नरेंद्र मोदी के खिलाफ दिए गए उनके एक आक्रामक और विवादित भाषण के कारण उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हुई और उन्हें जेल तक जाना पड़ा था। उस घटना के बाद से वे राष्ट्रीय स्तर पर एक बेहद मुखर, बेबाक और ध्रुवीकरण की राजनीति के केंद्र में रहने वाले चेहरे के रूप में जाने जाने लगे। हालांकि, बाद के वर्षों में उन्होंने अपने बयानों में काफी संतुलन साधा और खुद को एक समावेशी व विकासोन्मुख नेता के तौर पर पेश करना शुरू किया।
सपा और बसपा का सफर, फिर कांग्रेस में ऐतिहासिक वापसी
इमरान मसूद की राजनीतिक यात्रा कई उतार-चढ़ावों से भरी रही है। एक दौर ऐसा भी आया जब चुनावी रणनीति और क्षेत्रीय समीकरणों के चलते उन्होंने कांग्रेस छोड़ी:
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सपा और बसपा में आवाजाही: 2022 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले वे समाजवादी पार्टी में शामिल हुए, लेकिन वहां टिकट और भूमिका को लेकर सहमति न बनने पर उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का दामन थाम लिया।
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बसपा से निष्कासन और 'घर वापसी': बसपा में रहते हुए उन्होंने पार्टी नेतृत्व पर खुलकर अपनी राय रखी, जिसके बाद उन्हें अनुशासनहीनता के आरोप में पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। इसके तुरंत बाद अक्टूबर 2023 में राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के नेतृत्व में उन्होंने दोबारा कांग्रेस का हाथ थाम लिया।
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2024 में शानदार जीत: 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस-सपा (इंडिया गठबंधन) के साझा उम्मीदवार के तौर पर इमरान मसूद ने सहारनपुर सीट से भारी मतों के अंतर से जीत दर्ज की और एक दशक बाद संसद पहुंचे।
इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाने के पीछे कांग्रेस की रणनीति
उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी लगभग 20 प्रतिशत है, जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश की दर्जनों सीटों पर हार-जीत का फैसला करती है। इमरान मसूद को शीर्ष नेतृत्व में लाकर कांग्रेस ने कई रणनीतिक लक्ष्य साधे हैं:
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मुस्लिम नेतृत्व की सीधी नुमाइंदगी: पिछले कुछ समय से यह चर्चा आम थी कि गठबंधन की राजनीति में मुस्लिम समाज को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है। इमरान को प्रदेश का नंबर-दो पद देकर कांग्रेस ने अल्पसंख्यक समाज को एक मजबूत भरोसा दिया है।
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दलित-मुस्लिम गठजोड़ का सफल मॉडल: सहारनपुर लोकसभा चुनाव में इमरान मसूद ने दिखाया था कि वे भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर आजाद के प्रभाव क्षेत्र और आम दलित मतदाताओं के बीच भी खासी स्वीकार्यता रखते हैं। पश्चिमी यूपी में इस समीकरण को मजबूत करना कांग्रेस के लिए सबसे मुफीद है।
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सपा के साथ संतुलन: समाजवादी पार्टी पश्चिमी यूपी में अपनी स्थिति मजबूत करने में जुटी है। कांग्रेस अपने इस मजबूत चेहरे के दम पर गठबंधन में अपनी दावेदारी और सीटों की संख्या को वजनदार बनाए रखेगी।
जमीनी पकड़ और कार्यकर्ताओं में नया जोश
इमरान मसूद की सबसे बड़ी ताकत कार्यकर्ताओं से उनका सीधा जुड़ाव और चौबीसों घंटे सुलभ रहना है। वे उन चंद नेताओं में गिने जाते हैं जिनकी अपनी एक स्वतंत्र कैडर वोट बैंक है, जो पार्टी के सिंबल से इतर केवल उनके नाम पर मतदान करने का माद्दा रखती है। अब जब उन्हें पूरे उत्तर प्रदेश में संगठन को धार देने की जिम्मेदारी मिली है, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि वे पश्चिमी यूपी के इस असर को पूर्वांचल और मध्य यूपी के जिलों तक किस तरह विस्तार देते हैं।