यूपी में आराधना मिश्रा और इमरान मसूद को क्यों सौंपी कमान? पुराने 'MYD+B' फॉर्मूले पर लौटी कांग्रेस

यूपी में आराधना मिश्रा और इमरान मसूद को क्यों सौंपी कमान? पुराने 'MYD+B' फॉर्मूले पर लौटी कांग्रेस

उत्तर प्रदेश के सियासी अखाड़े में अपनी खोई हुई जमीन को दोबारा हासिल करने के लिए कांग्रेस आलाकमान ने 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अपने संगठन की सबसे बड़ी सर्जरी कर दी है। पिछले तीन सालों से संगठन की कमान संभाल रहे अजय राय को हटाकर पार्टी ने रामपुर खास से लगातार तीन बार की विधायक और कांग्रेस विधानमंडल दल की पूर्व नेता आराधना मिश्रा 'मोना' को उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी (UPCC) का नया अध्यक्ष नियुक्त किया है। वहीं, पश्चिमी यूपी के कद्दावर मुस्लिम चेहरे और सहारनपुर से सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष का अहम दायित्व सौंपा गया है।

कांग्रेस के इस कदम ने प्रदेश की राजनीति में हलचल मचा दी है। राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहा है कि अजय राय के नेतृत्व में लोकसभा चुनाव में 6 सीटें जीतने और खुद वाराणसी में पीएम नरेंद्र मोदी को कड़ी टक्कर देने के बावजूद कांग्रेस ने यह बदलाव क्यों किया? इसके पीछे कांग्रेस का वह पुराना और ऐतिहासिक सामाजिक गठबंधन है, जिसने 90 के दशक से पहले यूपी में दशकों तक पार्टी की एकतरफा सरकारें बनाई थीं।

1. 90 के दशक का ऐतिहासिक 'ब्राह्मण + दलित + मुस्लिम' गठबंधन

उत्तर प्रदेश में मंडल और कमंडल की राजनीति हावी होने से पहले कांग्रेस की सत्ता की धुरी मुख्य रूप से तीन सामाजिक वर्गों पर टिकी थी—ब्राह्मण (सवर्ण), दलित और मुस्लिम।

  • 90 के दशक के बाद ब्राह्मण वोटर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की तरफ शिफ्ट हो गया।

  • दलित वोटबैंक कांशीराम और मायावती के नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के पाले में चला गया।

  • मुस्लिम मतदाता समाजवादी पार्टी (सपा) के साथ मजबूती से लामबंद हो गया।

अब 2026-2027 के सियासी परिदृश्य में कांग्रेस को लगता है कि बसपा के लगातार सिमटते जनाधार और बीजेपी से कुछ तबकों की नाराजगी के बीच इस पुराने त्रिकोणीय समीकरण को दोबारा खड़ा करने का यह सबसे सटीक मौका है।

2. आराधना मिश्रा 'मोना': ब्राह्मण पहचान, महिला नेतृत्व और अखिलेश से सहज तालमेल

आराधना मिश्रा को प्रदेश अध्यक्ष बनाने के पीछे पार्टी के तीन स्पष्ट रणनीतिक पहलू हैं:

  • 12% ब्राह्मण वोटबैंक पर नजर: प्रदेश में ब्राह्मण आबादी करीब 10 से 12 प्रतिशत है, जो 100 से अधिक विधानसभा सीटों पर नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। अजय राय (भूमिहार) की तुलना में ब्राह्मण समाज की आबादी और राजनीतिक प्रभाव पूरे यूपी में कहीं अधिक व्यापक है। आराधना वरिष्ठ कांग्रेस नेता और राज्यसभा सांसद प्रमोद तिवारी की बेटी हैं, जिनका सवर्ण समाज में दशकों पुराना रसूख है।

  • प्रियंका गांधी का महिला कार्ड: आराधना मिश्रा प्रियंका गांधी वाड्रा के बेहद करीबी मानी जाती हैं और उन्होंने 'लड़की हूं, लड़ सकती हूं' अभियान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। एक महिला को शीर्ष पद सौंपकर कांग्रेस आधी आबादी को भी भावनात्मक संदेश दे रही है।

  • सपा और अखिलेश यादव से बेहतर संबंध: प्रमोद तिवारी और आराधना मिश्रा के समाजवादी पार्टी नेतृत्व के साथ हमेशा से मधुर और सहज संबंध रहे हैं। अजय राय कई मौकों पर सपा के साथ सीटों को लेकर आक्रामक बयानबाजी कर देते थे, जिससे गठबंधन में खटास आने की नौबत आ जाती थी। आराधना की मौजूदगी आगामी विधानसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन के तहत सीट बंटवारे की बातचीत को बेहद सुगम और टकराव-मुक्त बनाएगी।

3. इमरान मसूद: 20% मुस्लिम वोटबैंक की गारंटी और पश्चिमी यूपी में आक्रामकता

सहारनपुर से लोकसभा चुनाव में भारी अंतर से जीतकर संसद पहुंचे इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाना कांग्रेस का मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है:

  • अल्पसंख्यक समाज को हिस्सेदारी का अहसास: यूपी में लगभग 20 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं। लंबे समय से यह चर्चा थी कि मुस्लिम समाज सपा और कांग्रेस को एकतरफा वोट तो देता है, लेकिन संगठन के शीर्ष स्तर पर उन्हें वो नुमाइंदगी नहीं मिलती। इमरान मसूद को नंबर-2 की कुर्सी देकर कांग्रेस ने इस शिकायत को दूर किया है।

  • पश्चिमी यूपी में कैडर बेस: इमरान मसूद उन चंद नेताओं में से हैं जिनका अपना निजी कैडर वोटबैंक है। वे पश्चिमी यूपी की कम से कम 25 से 30 विधानसभा सीटों पर असर डालने का माद्दा रखते हैं।

  • दलित-मुस्लिम समन्वय का चेहरा: 2024 के आम चुनाव में इमरान मसूद ने दलित बस्तियों में अपनी पैठ दिखाकर साबित किया था कि वे मुस्लिम और दलित वोटों को एक छतरी के नीचे ला सकते हैं।

4. दलित और अति-पिछड़ों को भी मिला मजबूत प्रतिनिधित्व

कांग्रेस ने केवल आराधना और इमरान तक ही अपनी सोशल इंजीनियरिंग को सीमित नहीं रखा है, बल्कि संतुलन साधने के लिए दो नए वरिष्ठ उपाध्यक्ष भी नियुक्त किए हैं:

  • आलोक प्रसाद (वरिष्ठ उपाध्यक्ष - दलित): दलित समुदाय से आने वाले आलोक प्रसाद को संगठन में जिम्मेदारी देकर और यूपी प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम (जो खुद प्रमुख दलित नेता हैं) के साथ मिलकर पार्टी बसपा के खिसकते दलित वोटरों को जोड़ने की मुहिम चलाएगी।

  • देवेंद्र निषाद महरा (वरिष्ठ उपाध्यक्ष - ओबीसी/निषाद): पूर्वांचल और तटीय इलाकों में असर रखने वाले निषाद, केवट और मल्लाह समाज को साधने के लिए देवेंद्र निषाद को आगे लाया गया है, ताकि एनडीए के निषाद वोटबैंक में सेंध लगाई जा सके।

यूपी प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम का रोडमैप और अजय राय की विदाई की इनसाइड स्टोरी

अजय राय ने प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अपनी पूरी ऊर्जा झोंकी थी, लेकिन पार्टी सूत्रों के मुताबिक उनके और यूपी प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम के बीच रणनीतिक मतभेद उभर रहे थे। गौतम का मानना था कि यूपी जैसे विशाल राज्य में 2027 का चुनाव जीतने के लिए एक व्यापक जातिगत आधार (दलित + ब्राह्मण + ओबीसी + मुस्लिम) की आवश्यकता है, जबकि भूमिहार बिरादरी की संख्यात्मक उपस्थिति प्रदेश के कुछ ही जिलों तक सीमित है। इसके अलावा सपा के साथ गठबंधन के रुख और मायावती से संवाद के मुद्दे पर भी दोनों में मतभेद थे। आलाकमान ने आखिरकार प्रभारी के सामाजिक फॉर्मूले पर मुहर लगाते हुए नई टीम की घोषणा कर दी।

2027 की सियासी जंग में क्या असर डालेगा यह नया समीकरण?

कांग्रेस का यह नया फॉर्मूला सपा के 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) को सवर्ण (ब्राह्मण) संतुलन प्रदान करता है। जहां अखिलेश यादव का मुख्य फोकस ओबीसी और यादव-मुस्लिम समीकरण पर है, वहीं कांग्रेस आराधना मिश्रा के जरिए सवर्णों और राजेंद्र पाल गौतम व आलोक प्रसाद के जरिए दलितों को जोड़कर इस गठबंधन को एक 'सर्वसमावेशी विकल्प' बनाना चाहती है।

अब देखना यह होगा कि क्या आराधना मिश्रा की सधी हुई कार्यशैली और इमरान मसूद की आक्रामक सियासत मिलकर कांग्रेस के इस दशकों पुराने समीकरण को जमीन पर वोटों में तब्दील कर पाएगी?