खैबर पख्तूनख्वा में चुनी हुई सरकार को बर्खास्त कर शहबाज-मुनीर ने खेला खतरनाक दांव, गृहयुद्ध की दहलीज पर पाकिस्तान?

खैबर पख्तूनख्वा में चुनी हुई सरकार को बर्खास्त कर शहबाज-मुनीर ने खेला खतरनाक दांव, गृहयुद्ध की दहलीज पर पाकिस्तान?

पाकिस्तान की लड़खड़ाती राजनीति एक बार फिर अप्रत्याशित और बेहद खतरनाक मोड़ पर आ खड़ी हुई है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के सबसे मजबूत राजनीतिक गढ़ माने जाने वाले उत्तर-पश्चिमी प्रांत खैबर पख्तूनख्वा (KPK) में शहबाज शरीफ सरकार और सैन्य प्रतिष्ठान ने अप्रत्याशित कदम उठाते हुए राज्य में इमरजेंसी (आपातकाल) घोषित कर दिया है। राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी द्वारा संविधान के अनुच्छेदों के तहत जारी फरमान के बाद पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) की चुनी हुई प्रांतीय सरकार को औपचारिक रूप से निलंबित कर वहां छह महीने के लिए गवर्नर राज थोप दिया गया है। इस्लामाबाद की संघीय सरकार ने इसके पीछे सीमावर्ती इलाकों में लगातार बिगड़ती कानून-व्यवस्था और बढ़ते आतंकी हमलों का हवाला दिया है। हालांकि, राजनीतिक जानकारों और पीटीआई नेतृत्व का कहना है कि यह बिगड़ी कानून-व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि जेल में बंद इमरान खान के बढ़ते जनसमर्थन और हाल ही में शुरू हुए इस्लामाबाद लॉन्ग मार्च को सैन्य बल से कुचलने की खुली तानाशाही है।

चुनी हुई सरकार की बर्खास्तगी और पश्तून बेल्ट में आक्रोश की आग

खैबर पख्तूनख्वा लंबे समय से इमरान खान की पार्टी पीटीआई की रीढ़ रहा है। पिछले आम चुनावों में भारी धांधली और सैन्य दबाव के आरोपों के बावजूद इसी प्रांत ने इमरान खान के समर्थित उम्मीदवारों को भारी बहुमत से जिताकर प्रांतीय विधानसभा में भेजा था। प्रांतीय सरकार लगातार अदियाला जेल में बंद इमरान खान की रिहाई और बुनियादी अधिकारों के लिए इस्लामाबाद की केंद्र सरकार को सीधी चुनौती दे रही थी। प्रांतीय नेतृत्व के आह्वान पर हजारों कार्यकर्ताओं का कारवां जब संघीय राजधानी की ओर बढ़ने लगा, तो घबराई संघीय हुकूमत ने पूरे राज्य की कमान सेना और राज्यपाल के हवाले कर दी। मुख्य सचिव स्तर के शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों को रातों-रात बदलकर संघीय नियंत्रण स्थापित कर दिया गया है और कई प्रमुख शहरों में इंटरनेट सेवाओं को निलंबित कर दिया गया है। प्रांतीय स्वायत्तता पर इस तरह के सीधे हमले ने पश्तून बहुल आबादी के भीतर पहले से सुलग रही नाराजगी में घी डालने का काम किया है।

खनिजों की लूट या आतंकवाद? पीटीआई का सैन्य प्रतिष्ठान पर सीधा आरोप

इस इमरजेंसी के पीछे केवल राजनीतिक टकराव ही नहीं, बल्कि आर्थिक संसाधनों की लूट का खेल होने का भी गंभीर आरोप लगाया जा रहा है। पीटीआई ने आधिकारिक बयान जारी कर आरोप लगाया है कि खैबर पख्तूनख्वा तेल, गैस, यूरेनियम और बहुमूल्य खनिजों से समृद्ध इलाका है। प्रांत की चुनी हुई सरकार इन प्राकृतिक संसाधनों को विदेशी कंपनियों या पश्चिमी ताकतों को औने-पौने दाम पर बेचने के सैन्य फैसलों का विरोध कर रही थी। पाकिस्तान के वरिष्ठ राजनेता जावेद हाशमी ने भी सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर और शहबाज सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए दावा किया कि विदेशी ताकतों को साधने और संसाधनों पर कब्जा करने के लिए ही चुनी हुई सरकार को असंवैधानिक रूप से बेदखल किया गया है। इमरान खान के परिवार ने भी इस कदम को कायराना बताते हुए वैश्विक समुदाय से हस्तक्षेप की अपील की है और कहा है कि पाकिस्तान में अब संविधान नाम की कोई चीज बाकी नहीं बची है।

केंद्र का यह दांव कैसे पड़ सकता है उलटा: 4 बड़े कारण

शहबाज शरीफ और सेना का यह फैसला पाकिस्तान की एकता और स्थिरता के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। इसे कई स्तरों पर एक बड़ी रणनीतिक भूल माना जा रहा है:

  • पश्तून राष्ट्रवाद और अलगाववाद को हवा: खैबर पख्तूनख्वा की जनता पहले से ही इस्लामाबाद और रावलपिंडी (सैन्य मुख्यालय) की नीतियों से खुद को ठगा हुआ महसूस करती है। पश्तून तहफुज मूवमेंट (PTM) जैसे संगठन पहले से ही सेना के अत्याचारों के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहे हैं। ऐसे में लोकप्रिय सरकार को बर्खास्त करने से पश्तून समुदाय में यह संदेश जाएगा कि पंजाब का प्रभुत्व वाला सैन्य प्रतिष्ठान उनके जनमत का कोई सम्मान नहीं करता, जिससे अलगाववाद की चिंगारी भड़क सकती है।

  • आतंकवाद के खिलाफ जंग होगी कमजोर: खैबर पख्तूनख्वा प्रांत अफगानिस्तान से सटा हुआ है, जहां तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) लगातार सुरक्षा बलों पर जानलेवा हमले कर रहा है। किसी भी सीमावर्ती प्रांत में उग्रवाद से निपटने के लिए स्थानीय पुलिस, प्रांतीय प्रशासन और आम जनता का सहयोग सबसे बुनियादी शर्त होती है। जनता की चुनी हुई सरकार को हटाकर जबरन शासन थोपने से सुरक्षा बलों को स्थानीय स्तर पर भारी असहयोग का सामना करना पड़ेगा, जिसका सीधा फायदा टीटीपी और अन्य उग्रवादी गुट उठाएंगे।

  • सड़कों पर अनियंत्रित जनविद्रोह का खतरा: इमरान खान की पार्टी के पास कैडर और युवाओं की भारी तादाद है। प्रांतीय सरकार में रहते हुए वे संवैधानिक दायरे में रहकर आंदोलन कर रहे थे। अब जब सरकार ही छीन ली गई है, तो यह आंदोलन अनियंत्रित होकर सड़कों पर हिंसक टकराव का रूप ले सकता है। जब लोग खुद को लोकतांत्रिक रूप से पूरी तरह लाचार पाएंगे, तो वे सीधे सुरक्षा बलों और सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बना सकते हैं, जैसा 9 मई 2023 की घटनाओं में देखने को मिला था।

  • पंजाब और बलूचिस्तान के बाद तीसरा मोर्चा: पाकिस्तान पहले से ही बलूचिस्तान में बलोच लिबरेशन आर्मी (BLA) के भीषण हमलों और गृहयुद्ध जैसी परिस्थितियों से जूझ रहा है। उधर पंजाब में इमरान खान के समर्थकों के चलते राजनीतिक उथल-पुथल जारी है। अब खैबर पख्तूनख्वा में भी स्थायी बगावत की स्थिति पैदा कर सेना ने एक साथ तीसरा बड़ा आंतरिक मोर्चा खोल लिया है, जिसे संभाल पाना आर्थिक रूप से कंगाल हो चुके पाकिस्तान के लिए नामुमकिन होगा।

1971 की गलतियों का दोहराव: क्या एक और विखंडन की राह पर है पाकिस्तान?

इतिहास गवाह है कि जब भी पाकिस्तानी सेना ने जनता के चुनावी जनादेश को कुचलने के लिए आपातकाल, राज्यपाल शासन या फौजी बूटों का सहारा लिया है, उसका नतीजा देश के लिए विनाशकारी रहा है। 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में अवामी लीग के भारी चुनावी बहुमत को कुचलने के लिए सेना ने यही रास्ता चुना था, जिसका अंत पाकिस्तान के ऐतिहासिक विभाजन के रूप में हुआ था। आज खैबर पख्तूनख्वा में भी वही कहानी दोहराई जा रही है। जनता के वोटों से चुनकर आए प्रतिनिधियों को जेलों में ठूंसकर या सत्ता से बेदखल करके मुट्ठी भर जनरलों और कठपुतली नेताओं की सरकार अपनी सत्ता तो कुछ दिन और खींच सकती है, लेकिन इस प्रक्रिया में वह मुल्क के ताने-बाने को ऐसी आग में झोंक रही है जिससे बाहर निकलना अब मुमकिन नजर नहीं आता।