'ईरान की मदद की तो भुगतना होगा अंजाम': ट्रंप ने शी जिनपिंग को दी खुली चेतावनी; कहा- अमेरिका को यह कतई स्वीकार नहीं
मध्य-पूर्व (मिडिल ईस्ट) में बढ़ते सैन्य तनाव, लाल सागर में संकट और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर छिड़ी वैश्विक खींचतान के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को दो टूक शब्दों में बेहद सख्त चेतावनी दी है। अमेरिका और चीन के राष्ट्रप्रमुखों के बीच हुई उच्चस्तरीय द्विपक्षीय वार्ता के दौरान ट्रंप ने ईरान के मुद्दे पर कड़ा और आक्रामक रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि तेहरान की शासन व्यवस्था को बीजिंग से मिलने वाला आर्थिक, व्यापारिक और कूटनीतिक सहारा अमेरिका को किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है। ट्रंप ने साफ शब्दों में चेतावनी दी कि यदि चीन ने ईरान से सस्ते कच्चे तेल की खरीद बंद नहीं की और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को दरकिनार कर तेहरान को वित्तीय या तकनीकी मदद पहुंचाई, तो वाशिंगटन चीनी कंपनियों और वित्तीय संस्थानों पर अभूतपूर्व कड़े द्वितीयक प्रतिबंध (Secondary Sanctions) लगाने से पीछे नहीं हटेगा।
चीनी तेल खरीद से ईरान को मिल रहा जीवनदान: ट्रंप का आरोप
व्हाइट हाउस और अमेरिकी विदेश विभाग के अधिकारियों के अनुसार, बंद कमरे में हुई बैठक में राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के तेल निर्यात का ब्योरा सामने रखते हुए चीनी नेतृत्व को घेरा। अमेरिकी खुफिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए ट्रंप ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद ईरान का 80 से 90 प्रतिशत कच्चा तेल अवैध 'डार्क फ्लीट' (Dark Fleet) टैंकरों के जरिए चीन के छोटे रिफाइनर्स यानी 'टीपॉट्स' तक पहुंच रहा है।
ट्रंप ने कहा कि बीजिंग द्वारा तेहरान से हर महीने लाखों बैरल तेल खरीदना सीधे तौर पर ईरानी सरकार के खजाने को अरबों डॉलर का राजस्व मुहैया करा रहा है। इसी पैसे के दम पर ईरान मध्य-पूर्व में हूती, हिजबुल्लाह और अन्य मिलिशिया समूहों को हथियारबंद कर रहा है और अमेरिकी व सहयोगी देशों के हितों को निशाना बना रहा है। ट्रंप ने कहा, "हम ईरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने के लिए कड़े कदम उठा रहे हैं, लेकिन अगर चीन पिछले दरवाजे से उसे जीवनदान देता रहेगा, तो यह सीधी तौर पर अमेरिकी सुरक्षा रणनीति का उल्लंघन है।"
प्रतिबंधों को दरकिनार करने वाली चीनी कंपनियों पर गिरेगी गाज
ट्रंप प्रशासन ने जिनपिंग को दो टूक लहजे में आगाह किया कि ईरान के साथ व्यापार करने वाली किसी भी चीनी कंपनी, शिपिंग फर्म या बैंक को अमेरिकी डॉलर प्रणाली और वैश्विक बैंकिंग तंत्र से पूरी तरह काट दिया जाएगा। अमेरिका इससे पहले भी कई छोटी चीनी रिफाइनरियों और लॉजिस्टिक्स कंपनियों पर कार्रवाई कर चुका है, लेकिन ट्रंप ने संकेत दिया कि इस बार निशाने पर चीन के बड़े वित्तीय संस्थान भी हो सकते हैं।
ट्रंप ने चेतावनी देते हुए कहा कि अमेरिका और चीन के बीच व्यापार समझौते और टैरिफ की बातचीत चल रही है, लेकिन ईरान का मुद्दा वॉशिंगटन के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा का सर्वोपरि मसला है। यदि बीजिंग ने इस मोर्चे पर सहयोग नहीं किया, तो इसका सीधा नकारात्मक असर दोनों देशों के समग्र व्यापारिक रिश्तों और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर समझौतों पर पड़ेगा।
बीजिंग का रुख: संप्रभु व्यापारिक अधिकारों की दुहाई
दूसरी ओर, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी धमकियों को सिरे से खारिज करते हुए इसे 'एकतरफा दादागिरी' करार दिया। चीनी पक्ष का तर्क है कि बीजिंग और तेहरान के बीच ऊर्जा और आर्थिक संबंध पूरी तरह वैध, सामान्य और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के दायरे में हैं।
चीन का कहना है कि वह संयुक्त राष्ट्र (UN) की मंजूरी के बिना अमेरिका द्वारा अपने दम पर लगाए गए प्रतिबंधों को मान्यता नहीं देता। बीजिंग ने हमेशा यह रुख बनाए रखा है कि मध्य-पूर्व में स्थिरता बातचीत और कूटनीति से ही संभव है, न कि अधिकतम दबाव (Maximum Pressure) और सैन्य धमकियों से। इसके अलावा, ईरान के साथ चीन का 25 साल का रणनीतिक सहयोग समझौता भी बीजिंग के लिए ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है।
मध्य-पूर्व और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ेगा असर
ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच ईरान को लेकर आई यह तल्खी केवल द्विपक्षीय विवाद तक सीमित नहीं रहने वाली। भू-राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि ट्रंप प्रशासन ईरानी तेल ले जाने वाले टैंकरों को समुद्र में जब्त करने या चीनी बंदरगाहों पर रोक लगाने जैसे कठोर कदम उठाता है, तो वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है।
खाड़ी देशों और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में तनाव बढ़ने की आशंका और गहरा गई है। ट्रंप की इस खुली चेतावनी ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले दिनों में अमेरिका-चीन महाशक्तियों की जंग केवल ताइवान और व्यापार तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि ईरान का मोर्चा इसका सबसे बड़ा टकराव केंद्र साबित होगा।