गैलप सर्वे ने उड़ाए वॉशिंगटन के होश! 89% अमेरिकियों ने अपनी ही सरकार को बताया भ्रष्ट, 20 साल के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा जन-अविश्वास
दुनिया भर में लोकतंत्र, पारदर्शिता और संस्थागत शुचिता का स्वयंभू संरक्षक बनने का दावा करने वाले संयुक्त राज्य अमेरिका की आंतरिक नींव में अविश्वास की गहरी दरारें पड़ चुकी हैं। वैश्विक स्तर पर जनमत और सामाजिक रुझानों का सबसे प्रामाणिक विश्लेषण करने वाली संस्था 'गैलप' (Gallup) के ताजा सर्वेक्षण ने व्हाइट हाउस, कैपिटल हिल और अमेरिकी खुफिया हलकों में खलबली मचा दी है। 1 मई से 10 जून 2026 के बीच 1,000 अमेरिकी वयस्कों पर टेलीफोनिक माध्यम से किए गए इस व्यापक राष्ट्रीय सर्वेक्षण के नतीजे दर्शाते हैं कि 89 प्रतिशत अमेरिकी नागरिक अपनी ही संघीय सरकार को व्यापक रूप से भ्रष्ट मानते हैं। यह आंकड़ा पिछले 20 वर्षों में दर्ज किया गया अब तक का सबसे उच्चतम स्तर है, जिसने 2010 से 2025 के बीच 72 से 79 प्रतिशत के दायरे में रहे ऐतिहासिक पठार को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। मात्र एक वर्ष के भीतर 79 प्रतिशत से 89 प्रतिशत तक की यह 10 अंकों की अप्रत्याशित छलांग इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के दौरान जनता का भरोसा अपनी सार्वजनिक संस्थाओं से लगभग पूरी तरह उखड़ चुका है।
दलगत राजनीति से परे अविश्वास का सैलाब: डेमोक्रेट्स 91%, इंडिपेंडेंट 90% और रिपब्लिकन 83% पर एकमत
अमेरिकी राजनीति अपनी तीव्र ध्रुवीकरण और कटु दलीय खींचतान के लिए जानी जाती है, जहां किसी भी नीतिगत मसले पर साझा सहमति बनना असंभव माना जाता है। किंतु गैलप के इस सर्वेक्षण ने अमेरिका के राजनीतिक भूगोल की इस खाई को मिटा दिया है। सर्वे के दलीय आंकड़ों का सूक्ष्म विश्लेषण बताता है कि सरकार के प्रति अविश्वास अब किसी एक विचारधारा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक सर्वदलीय जनाक्रोश में बदल चुका है।
डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थकों के बीच सरकार के भ्रष्ट होने की धारणा में सबसे तीव्र और विस्फोटक उछाल देखा गया है। वर्ष 2024 में पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन के कार्यकाल के अंतिम महीनों में केवल 57 प्रतिशत डेमोक्रेट्स सरकार को भ्रष्ट मानते थे। 2025 में ट्रंप के सत्ता में लौटने के पहले साल यह आंकड़ा 76 प्रतिशत पर पहुंचा और अब 2026 में 15 अंकों की नई छलांग लगाते हुए सीधे 91 प्रतिशत के शिखर पर पहुंच गया है। इसी प्रकार, चुनावी संतुलन साधने वाले स्वतंत्र (Independent) मतदाताओं में भी अविश्वास की दर 2024 के मुकाबले 12 अंक बढ़कर 90 प्रतिशत पर पहुंच चुकी है।
सबसे हैरान करने वाला आंकड़ा सत्ताधारी रिपब्लिकन पार्टी के अपने मतदाताओं का है। व्हाइट हाउस, सीनेट और प्रतिनिधि सभा पर रिपब्लिकन का पूर्ण नियंत्रण होने के बावजूद 83 प्रतिशत रिपब्लिकन समर्थकों का यह मानना है कि सरकार में भ्रष्टाचार फैला हुआ है। विश्लेषकों का मानना है कि जहां डेमोक्रेट्स का गुस्सा ट्रंप प्रशासन की आक्रामक नीतियों और व्यक्तिगत फैसलों से उपजा है, वहीं रिपब्लिकन मतदाताओं का अविश्वास वाशिंगटन की पारंपरिक नौकरशाही, 'डीप स्टेट' और संघीय एजेंसियों के प्रति उनकी पुरानी नाराजगी को दर्शाता है। राजनीतिक वैज्ञानिकों का कहना है कि यह दुर्लभ द्विदलीय सहमति किसी सकारात्मक समझ का नहीं, बल्कि साझा राष्ट्रीय भय और बेचैनी का प्रतीक है।
ओईसीडी देशों में सबसे भ्रष्ट छवि: विकसित लोकतंत्रों को पछाड़ लेबनान और पेरू की कतार में खड़ा हुआ अमेरिका
इस सर्वेक्षण के अंतरराष्ट्रीय परिणाम अमेरिका के वैश्विक राजनयिक कद के लिए किसी बड़े कूटनीतिक आघात से कम नहीं हैं। आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD), जिसमें ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, जापान, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे 38 शीर्ष औद्योगिक और लोकतांत्रिक देश शामिल हैं, उस समूह में अमेरिका अब सरकारी भ्रष्टाचार की धारणा के मामले में सबसे शीर्ष पायदान पर पहुंच गया है। वर्ष 2025 में जहां ओईसीडी देशों का औसत भ्रष्टाचार धारणा स्तर 59 प्रतिशत था, वहीं अमेरिका का 89 प्रतिशत पर पहुंचना उसे विकसित दुनिया का सबसे बड़ा विचलन (Global Outlier) बना देता है। इस सूची में अमेरिका के बाद कोलंबिया 79 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर है, जो अमेरिका से पूरे 10 अंक पीछे है।
वैश्विक स्तर पर भी तस्वीर बेहद चिंताजनक है। गैलप द्वारा 2023 से 132 देशों में ट्रैक किए गए भ्रष्टाचार सूचकांक में दुनिया के केवल चार ही ऐसे देश हैं जहां की जनता अपनी सरकार को अमेरिका से अधिक या उसके बराबर भ्रष्ट मानती है। इनमें आर्थिक तबाही झेल रहा लेबनान (92%), राजनीतिक संकट से जूझता पेरू (92%), घाना (90%) और नाइजीरिया (90%) शामिल हैं। जी-7 समूह के किसी प्रमुख देश का अपनी जनता की नजरों में अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अस्थिर देशों की श्रेणी में खड़ा होना यह साबित करता है कि अमेरिका अपने घरेलू मोर्चे पर नैतिक और संस्थागत वैधता खोता जा रहा है।
सरकार बनाम कॉरपोरेट जगत: 18 अंकों की ऐतिहासिक खाई और असंतोष की असल वजहें
गैलप ने अपने सर्वेक्षण में दो अलग-अलग क्षेत्रों—सार्वजनिक क्षेत्र (सरकार) और निजी क्षेत्र (बिजनेस कॉर्पोरेट)—में भ्रष्टाचार की स्थिति का आकलन किया। आंकड़ों के अनुसार, 71 प्रतिशत अमेरिकियों ने माना कि बड़े कॉर्पोरेट और व्यापारिक घरानों में भी भ्रष्टाचार फैला हुआ है। हालांकि यह भी अपने आप में पिछले साल से 8 अंक अधिक है, किंतु सरकारी भ्रष्टाचार (89%) और व्यापारिक भ्रष्टाचार (71%) के बीच का 18 प्रतिशत अंकों का यह अंतर गैलप के इतिहास का अब तक का सबसे विशाल अंतर है। ऐतिहासिक रूप से यह अंतर औसतन केवल 11 अंकों का रहता था।
इस 18 अंकों के फासले से यह स्पष्ट होता है कि अमेरिकी जनता सामान्य आर्थिक तंत्र से उतनी नाराज नहीं है जितनी कि वह चुने हुए नेताओं, सत्ताधारी अभिजात वर्ग और सरकारी तंत्र से खफा है। जनता के इस भारी गुस्से के पीछे पिछले एक वर्ष के कई ठोस और विवादित घटनाक्रम सक्रिय रहे हैं:
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मध्य पूर्व युद्ध की गोपनीयता: फारस की खाड़ी और ईरान के साथ छिड़े सैन्य टकराव में भारी सैन्य खर्च, संसद (कांग्रेस) की अनदेखी और घरेलू राजनीतिक लाभ के लिए युद्ध की सूचनाओं को छिपाने के आरोपों ने रक्षा नीतियों पर गहरे सवाल खड़े किए हैं।
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पेंटागन में नेतृत्व का टकराव: रक्षा मंत्रालय के भीतर असैन्य नियंत्रण (Civilian Command) को दरकिनार करने और सैन्य अफसरों के साथ विवादों ने रक्षा सौदों की निष्पक्षता को संदिग्ध बनाया है।
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व्हाइट हाउस में हितों का टकराव: ट्रंप परिवार के निजी व्यवसायों, विदेशी अनुबंधों और व्हाइट हाउस में कॉर्पोरेट दानदाताओं की सीधी दखलअंदाजी ने आम करदाताओं के मन में यह धारणा मजबूत की है कि सत्ता का उपयोग निजी लाभ के लिए किया जा रहा है।
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संवैधानिक संस्थाओं से टकराव: न्यायपालिका के फैसलों पर सार्वजनिक हमलों और प्रशासनिक नियुक्तियों में राजनीतिक वफादारी को तरजीह देने से अमेरिकी नौकरशाही की निष्पक्षता पूरी तरह समाप्त मानी जा रही है।
नवंबर 2026 के मध्यावधि चुनावों पर सीधा प्रहार: क्या ट्रंप सरकार के खिलाफ जनमत संग्रह बनेगा भ्रष्टाचार?
नवंबर 2026 में होने जा रहे अमेरिकी मध्यावधि चुनाव (Midterm Elections) इस राजनीतिक असंतोष की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा साबित होने वाले हैं। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों और सीनेट की एक-तिहाई सीटों पर होने वाले इस मतदान में रिपब्लिकन पार्टी के पास अपनी पतली बढ़त को बचाए रखने की कठिन चुनौती है।
विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी ने गैलप के इस 89 प्रतिशत के आंकड़े को अपना सबसे बड़ा चुनावी घोषणापत्र और आक्रामक नारा बना लिया है। डेमोक्रेट रणनीतिकार अब इसे डोनाल्ड ट्रंप के शासन मॉडल पर एक सीधा जनमत संग्रह (Referendum) बनाकर पेश कर रहे हैं। उनका मुख्य चुनावी तर्क यह है कि ट्रंप प्रशासन ने सत्ता में आते ही 'ड्रेन द स्वैम्प' (भ्रष्टाचार खत्म करने) का जो वादा किया था, उसने वास्तव में वाशिंगटन को दुनिया का सबसे भ्रष्ट राजनीतिक दलदल बना दिया है। यदि निर्दलीय मतदाता (जो 90% भ्रष्टाचार मान रहे हैं) इसी मिजाज के साथ मतदान केंद्रों पर पहुंचे, तो स्विंग स्टेट्स (पेंसिल्वेनिया, मिशिगन, विस्कॉन्सिन, एरिजोना और जॉर्जिया) में रिपब्लिकन पार्टी को भारी चुनावी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है, जिससे संसद के दोनों सदनों में सत्ता संतुलन पलट सकता है।
भारत, वैश्विक अर्थव्यवस्था और यूपी के औद्योगिक निर्यात तंत्र पर क्या होगा असर?
वाशिंगटन की सत्ता में गहराता यह संस्थागत संकट केवल अमेरिकी सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका सीधा असर भारत और विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के आर्थिक व प्रवासी हितों पर पड़ेगा। जब किसी महाशक्ति का आंतरिक नेतृत्व घरेलू मोर्चे पर भारी अविश्वास और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरता है, तो वह जनता का ध्यान भटकाने के लिए अक्सर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अप्रत्याशित, आक्रामक और आर्थिक रूप से संरक्षणवादी (Protectionist) नीतियां अपनाता है।
भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार 200 अरब डॉलर के पार है। उत्तर प्रदेश की औद्योगिक राजधानी कानपुर और उससे सटे उन्नाव परिक्षेत्र के औद्योगिक गलियारों—दही चौकी, बंथरा और दादानगर—से चमड़ा उत्पाद, फुटवियर, टेक्सटाइल और केमिकल का एक बड़ा हिस्सा अमेरिकी बाजारों में निर्यात होता है। अमेरिका में राजनीतिक अस्थिरता, टैरिफ युद्ध और डॉलर की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव सीधे तौर पर उन्नाव और कानपुर के निर्यातकों के आर्डर बुक को प्रभावित करते हैं। इसके साथ ही, लखनऊ, कानपुर और उन्नाव से हजारों छात्र और तकनीकी पेशेवर एच-1बी (H-1B) वीजा पर अमेरिका में कार्यरत हैं। मध्यावधि चुनावों के दबाव में यदि अमेरिकी प्रशासन वीजा नियमों को कड़ा करता है या विदेशी प्रवासियों पर प्रशासनिक शिकंजा कसता है, तो इसका सीधा असर भारतीय परिवारों के भविष्य और रेमिटेंस पर पड़ेगा।
गैलप का यह ऐतिहासिक सर्वेक्षण स्पष्ट करता है कि हथियारों, डॉलर और सैन्य शक्ति के बल पर दुनिया पर दबदबा बनाने वाला अमेरिका अपने ही नागरिकों का विश्वास खो चुका है। जब देश के 89 प्रतिशत नागरिक अपनी व्यवस्था को बेईमान मानने लगें, तो वह किसी भी लोकतांत्रिक महाशक्ति के पतन का सबसे बड़ा अलार्म बन जाता है।