नेपाल त्रासदी पर पसीजा दुनिया का कलेजा: प्रधानमंत्री आपदा राहत कोष में मात्र 3 दिनों में आए 2 अरब रुपये
काठमांडू: हिमालयी राष्ट्र नेपाल में हाल ही में आई प्रलयंकारी बाढ़, भूस्खलन और ग्लेशियर टूटने से मची ऐतिहासिक तबाही ने पूरी दुनिया के संवेदनशील दिलों को झकझोर कर रख दिया है। मलबे के नीचे दबी बस्तियों, अनाथ हुए बच्चों और तबाह हुए गांवों की दर्दनाक तस्वीरों को देखकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने अप्रत्याशित दरियादिली दिखाई है। नेपाल सरकार द्वारा स्थापित ‘प्रधानमंत्री आपदा राहत कोष’ (Prime Minister's Disaster Relief Fund - PMDRF) में मात्र तीन दिनों के भीतर 2 अरब रुपये (200 करोड़ रुपये) से अधिक की भारी-भरकम वित्तीय सहायता राशि जमा हो चुकी है। काठमांडू स्थित वित्त मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार, संकट की इस घड़ी में मित्र देशों की सरकारों, बहुपक्षीय वित्तीय संस्थाओं, अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठनों, कॉरपोरेट घरानों और दुनिया भर में फैले गैर-आवासीय नेपालियों (NRN) ने खुले दिल से राहत राशि दान की है।
3 दिनों में 2 अरब रुपये की ऐतिहासिक मदद: जानिए किन देशों और संस्थाओं ने खोला खजाना
आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, राहत कोष में सहायता राशि का यह प्रवाह नेपाल के हालिया इतिहास में सबसे तेज और व्यापक देखा गया है। विभिन्न देशों की सरकारों और वैश्विक परोपकारी संस्थाओं ने सीधे बैंक ट्रांसफर और डिजिटल गेटवे के माध्यम से यह राशि भेजी है।
एशियाई विकास बैंक (ADB) और विश्व बैंक ने आपातकालीन मानवीय राहत और त्वरित पुनर्वास के लिए बड़ी वित्तीय सहायता की घोषणा की है। इसके अतिरिक्त, खाड़ी देशों (यूएई, कतर, सऊदी अरब), यूरोपीय संघ (EU), जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय सहायता निकायों (USAID) ने भी करोड़ों डॉलर के आपातकालीन सहायता पैकेजों को सीधे राहत कोष में ट्रांसफर किया है। नेपाल के निजी क्षेत्र के बड़े औद्योगिक घरानों, वाणिज्यिक बैंकों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भी अपने कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) फंड से भारी योगदान दिया है। विभिन्न देशों में कार्यरत नेपाली प्रवासी समुदाय ने ऑनलाइन क्राउडफंडिंग अभियानों के जरिए करोड़ों रुपये एकत्र कर सीधे राष्ट्रीय कोष में जमा करवाए हैं।
भारत और चीन का सबसे बड़ा मानवीय सहयोग: वित्तीय मदद के साथ भेजीं विशेष टीमें
नेपाल के दो सबसे बड़े पड़ोसी देशों, भारत और चीन ने संकट के पहले दिन से ही मानवीय सहायता का नेतृत्व किया है। भारत सरकार ने 'पड़ोसी प्रथम' नीति के तहत नकदी सहायता के साथ-साथ सैकड़ों टन आपातकालीन राहत सामग्री की खेप नेपाल पहुंचाई है। भारतीय वायुसेना के विमानों और थल सेना के लॉजिस्टिक नेटवर्क के माध्यम से जीवनरक्षक दवाइयां, पोर्टेबल टेंट, वाटर प्यूरिफिकेशन प्लांट्स, कंबल और खाद्य पैकेट तुरंत ग्राउंड जीरो तक भेजे गए हैं।
इसके साथ ही भारत ने राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) के विशेषज्ञ टनल रेस्क्यू दस्तों और डॉक्टरों की एक उच्चस्तरीय टीम को तैनात किया है, जो त्रिशूली और भोटेकोशी बेसिन में दबे मजदूरों और घायलों के इलाज में दिन-रात जुटी हुई है। दूसरी ओर, चीन सरकार ने तिब्बत सीमा से भारी क्रेन, बुलडोजर और मलबे को साफ करने वाली उन्नत मशीनरी भेजी है। चीन ने तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के जरिए नेपाल-चीन सीमा के व्यापारिक कॉरिडोर को फिर से खोलने और प्राकृतिक बैरियर झीलों से पानी की सुरक्षित निकासी के लिए तकनीकी और वित्तीय मदद मुहैया कराई है। दोनों पड़ोसी देशों का यह एकजुट प्रयास नेपाल के राहत तंत्र के लिए जीवनदायिनी साबित हो रहा है।
नेपाल में जल प्रलय की भयावहता: 2 अरब की राशि से क्या-क्या होगा पुनर्निर्माण?
पहाड़ों से आए मलबे और सैलाब ने नेपाल के बुनियादी ढांचे को ऐसी चोट पहुंचाई है, जिससे उबरने में वर्षों का समय लग सकता है। आपदा में 600 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है, हजारों नागरिक लापता हैं और लाखों लोग बेघर होकर अस्थाई तंबुओं में रहने को मजबूर हैं। 13 प्रमुख जलविद्युत परियोजनाएं क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं, 80 से अधिक प्रमुख पुल बह गए हैं और दर्जनों राष्ट्रीय राजमार्ग मलबे से पटे पड़े हैं।
नेपाल सरकार ने स्पष्ट किया है कि आपदा राहत कोष में जमा हुए इन 2 अरब रुपयों का उपयोग प्राथमिकता के आधार पर चार प्रमुख चरणों में किया जाएगा:
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तात्कालिक जीवन रक्षा और खाद्य सुरक्षा: विस्थापित परिवारों तक स्वच्छ पेयजल, सूखा राशन, शिशु आहार और तिरपाल की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करना।
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अस्थाई शरणस्थल और विंटर शेल्टर: सर्दियों के मौसम के आगमन से पहले बेघर हुए परिवारों के लिए प्री-फैब्रिकेटेड शेल्टर और सुरक्षित सामुदायिक आश्रयों का निर्माण करना।
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संक्रामक बीमारियों से बचाव: स्वास्थ्य शिविरों की स्थापना, मोबाइल मेडिकल यूनिट्स की तैनाती और डायरिया, हैजा व डेंगू जैसी महामारियों को रोकने के लिए आवश्यक टीकों व दवाओं का वितरण।
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त्वरित संपर्क बहाली: कटे हुए पहाड़ी गांवों तक आवश्यक रसद पहुंचाने के लिए बेली ब्रिज (Bailey Bridges) और वैकल्पिक संपर्क मार्गों का युद्धस्तर पर निर्माण।
प्रधानमंत्री आपदा राहत कोष (PMDRF) में पारदर्शिता: पाई-पाई का रखा जाएगा हिसाब
विदेशी सहायता और जनसहयोग के दुरुपयोग को रोकने के लिए नेपाल के प्रधानमंत्री कार्यालय ने वित्तीय पारदर्शिता की एक बेहद सख्त व्यवस्था लागू की है। राहत कोष में आने वाली हर एक पाई का हिसाब रखने के लिए महालेखा परीक्षक कार्यालय (OAG) के अधीन एक विशेष स्वतंत्र ऑडिट पैनल का गठन किया गया है।
सरकार ने एक सार्वजनिक ऑनलाइन डैशबोर्ड शुरू किया है, जहां हर दानदाता का विवरण और राहत कोष से विभिन्न जिलों व राहत मदों में जारी की गई राशि का रियल-टाइम डेटा अपडेट किया जा रहा है। सरकार ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि पीड़ितों को नकद सहायता राशि का वितरण केवल प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) और बायोमेट्रिक सत्यापन के माध्यम से सीधे उनके बैंक खातों में किया जाएगा, ताकि किसी भी बिचौलिये या भ्रष्टाचार की गुंजाइश को पूरी तरह समाप्त किया जा सके।
संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस की वैश्विक अपील
काठमांडू में संयुक्त राष्ट्र के आवासीय समन्वयक कार्यालय और अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस फेडरेशन (IFRC) ने भी वैश्विक स्तर पर एक विशाल 'फ्लैश अपील' जारी की है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि नेपाल जैसी संवेदनशील हिमालयी अर्थव्यवस्था के लिए यह केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि अस्तित्व का संकट है, जिसमें जलवायु परिवर्तन की भारी कीमत चुकानी पड़ रही है।
वैश्विक हस्तियों, अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों, हॉलीवुड और बॉलीवुड अभिनेताओं तथा पर्वतारोहण समुदाय ने भी सोशल मीडिया अभियानों के जरिए नेपाल के पक्ष में माहौल बनाया है। दुनिया भर के विभिन्न शहरों में 'स्टैंड विद नेपाल' और 'नेपाल रिलीफ फंड' के नाम से चैरिटी कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, जिससे आने वाले दिनों में विदेशी मदद का यह आंकड़ा और तेजी से बढ़ने की उम्मीद है।
भारत-नेपाल सीमा पर आपूर्ति कॉरिडोर की स्थापना
भारत के उत्तर प्रदेश और बिहार राज्यों से लगने वाली नेपाल सीमा पर रसद और निर्माण सामग्री की सुचारू आपूर्ति के लिए विशेष ग्रीन कॉरिडोर बनाए गए हैं। रक्सौल-बीरगंज, सोनौली-भैरहवा, रुपैडिहा-नेपालगंज और पानीटंकी-काकड़भिट्टा सीमा चौकियों पर सीमा शुल्क (कस्टम) औपचारिकताओं को शिथिल कर राहत सामग्री से लदे वाहनों को 24 घंटे प्राथमिकता के आधार पर पास किया जा रहा है।
राहत कोष से खरीदी जा रही भारी मशीनरी, सीमेंट, स्टील और आवश्यक खाद्यान्न भारत के सीमावर्ती व्यापारिक केंद्रों से तेजी से काठमांडू और प्रभावित पहाड़ी जनपदों की ओर भेजे जा रहे हैं। स्थानीय स्तर पर भारतीय और नेपाली सामाजिक संस्थाएं भी कंधे से कंधा मिलाकर प्रभावित परिवारों की सेवा में जुटी हुई हैं, जो दोनों देशों के बीच सदियों पुराने अटूट सांस्कृतिक और मानवीय संबंधों को एक बार फिर प्रमाणित करता है।