मलबे के ढेर, दूषित पानी और मौसम के लगातार 'रेड अलर्ट' से कांपी हिमालयी वादियां

मलबे के ढेर, दूषित पानी और मौसम के लगातार 'रेड अलर्ट' से कांपी हिमालयी वादियां

प्रकृति का ऐसा क्रूर प्रहार शायद ही किसी मुल्क ने हाल के दशकों में झेला हो। पहले भयंकर मानसूनी सैलाब और दरकते पहाड़ों ने चंद घंटों के भीतर हंसते-खेलते गांवों, जलविद्युत परियोजनाओं, कंक्रीट के पुलों और हजारों जिंदगियों को मलबे के नीचे दफन कर दिया। अब जब पानी धीरे-धीरे उतर रहा है, तो जीवित बचे लोगों के सामने जिंदगी बचाने की उससे भी अधिक भयावह जंग शुरू हो चुकी है। नेपाल के बाढ़ प्रभावित इलाकों में इस समय जलजनित महामारियां तेजी से पैर पसार रही हैं, जबकि दूसरी ओर मौसम विज्ञान विभाग द्वारा एक के बाद एक जारी किए जा रहे नए बाढ़ और भूस्खलन के 'रेड अलर्ट' ने आपदा पीड़ितों की रीढ़ में सिहरन पैदा कर दी है। न पीने को साफ पानी है, न सिर छुपाने को सुरक्षित छत, और न ही महामारी से लड़ने के लिए पर्याप्त दवाइयां उपलब्ध हैं।

मलबे और कीचड़ के बीच दूषित पानी का जहर: हैजा, डायरिया और लेप्टोस्पायरोसिस की दस्तक

नेपाल के रसुवा, नुवाकोट, धादिंग, चितवन, काठमांडू घाटी और नवलपरासी जिलों में हालात सबसे ज्यादा विस्फोटक बने हुए हैं। बाढ़ का पानी अपने साथ हजारों टन गाद, कचरा, सीवेज और जानवरों के शव बहाकर लाया था, जो अब धूप निकलने के साथ ही बस्तियों और खेतों में सड़ रहे हैं। इन क्षेत्रों की पेयजल आपूर्ति प्रणालियां, कुएं और नलकूप पूरी तरह से नष्ट या दूषित हो चुके हैं। मजबूरी में लोग वही कीचड़युक्त और बदबूदार पानी पीने को मजबूर हैं, जिसके चलते गांवों में उल्टी, दस्त, तेज बुखार, हैजा (कॉलरा), टाइफाइड और त्वचा संक्रमण के मामले विस्फोट की तरह बढ़ रहे हैं।

स्थानीय स्वास्थ्य केंद्रों और अस्थायी राहत कैंपों में हर घंटे सैकड़ों की संख्या में मरीज पहुंच रहे हैं, जिनमें सबसे ज्यादा तादाद मासूम बच्चों और बुजुर्गों की है। काठमांडू और पोखरा के बड़े अस्पतालों में बेड कम पड़ चुके हैं, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि सुदूर पहाड़ी इलाकों में मौजूद स्वास्थ्य चौकियां खुद मलबे में तब्दील हो चुकी हैं। डॉक्टरों का कहना है कि अगर अगले कुछ दिनों में शुद्ध पेयजल और क्लोरीन की गोलियां युद्धस्तर पर नहीं पहुंचाई गईं, तो बाढ़ से बचे लोग जलजनित बीमारियों और लेप्टोस्पायरोसिस के संक्रमण से दम तोड़ देंगे।

राहत शिविरों में सिसकती जिंदगी: बुनियादी सुविधाओं और खाद्य संकट की मार

जो लोग सैलाब से किसी तरह अपनी जान बचाकर सुरक्षित ऊंचे स्थानों या अस्थायी राहत तंबुओं में पहुंचे हैं, उनके लिए हर एक पल किसी दुस्वप्न से कम नहीं है। स्कूलों, खेल मैदानों और खुले तिरपालों के नीचे हजारों विस्थापित परिवार भूख, प्यास और खौफ के साए में दिन गुजार रहे हैं। एक ही तंबू में दर्जनों लोगों के ठूंसे होने और उचित स्वच्छता (सैनिटेशन) की व्यवस्था न होने के कारण संक्रमण तेजी से एक व्यक्ति से दूसरे में फैल रहा है।

शिशुओं के लिए दूध, गर्भवती महिलाओं के लिए जरूरी पोषण और बुजुर्गों के लिए जीवनरक्षक दवाइयों का घोर अकाल पड़ चुका है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राहत एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि मुख्य राजमार्ग, जैसे बेत्रावती-रसुवागढ़ी और पृथ्वी राजमार्ग कई जगहों पर पूरी तरह टूट चुके हैं। सड़क मार्ग पूरी तरह कट जाने के कारण राहत सामग्री से लदे ट्रक मीलों दूर फंसे हैं और हवाई मार्ग से केवल सीमित इलाकों तक ही मदद पहुंच पा रही है।

मौसम विभाग के लगातार 'रेड अलर्ट' से दहशत: विस्थापितों के पास भागने की भी जगह नहीं

महामारी के इस खौफनाक मंजर के बीच नेपाल के राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण (NDRRMA) द्वारा लगातार जारी किए जा रहे नए अलर्ट ने लोगों की कमर तोड़ दी है। मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि तिब्बत सीमा और हिमालयी जलग्रहण क्षेत्रों में दोबारा भारी बारिश हो सकती है, जिससे भोटेकोशी, त्रिशूली, नारायणी और बागमती नदियों का जलस्तर फिर से खतरे के निशान को पार कर सकता है।

प्रशासन द्वारा लाउडस्पीकरों और मोबाइल संदेशों के जरिए निचले इलाकों को फौरन खाली करने की चेतावनी दी जा रही है, लेकिन सवाल यह उठता है कि जिन लोगों के घर पहले ही बह चुके हैं, वे अब जाएं तो जाएं कहां? लगातार हो रही बारिश और रात के अंधेरे में पहाड़ों से गिरते भारी पत्थरों की आवाजें लोगों की नींद उड़ा चुकी हैं। हर नया सायरन और अलर्ट पीड़ितों के दिल में एक नई दहशत भर देता है कि कहीं बचा-खुचा सहारा भी अगली लहर में न बह जाए।

स्वास्थ्य तंत्र पूरी तरह बेपटरी: डेंगू और वेक्टर जनित बीमारियों का नया हमला

बाढ़ के थमने के बाद रुके हुए गंदे पानी और कीचड़ के विशाल दलदल ने मच्छरों के लिए मुफीद प्रजनन स्थल तैयार कर दिया है। तराई के जिलों चितवन, नवलपरासी के साथ-साथ पहाड़ी घाटियों में भी डेंगू और वायरल बुखार के मामलों में अप्रत्याशित उछाल देखा जा रहा है। नेपाल में पहले से ही स्वास्थ्य संसाधनों की कमी रही है, लेकिन इस आपदा ने पूरे ढांचे को घुटनों पर ला दिया है।

पैरासिटामोल, ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्ट (ORS), एंटीबायोटिक्स और आईवी ड्रिप्स जैसी सबसे बुनियादी मेडिकल सप्लाइज भी खत्म होने की कगार पर हैं। ग्रामीण इलाकों में तैनात स्वास्थ्यकर्मी बिना पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के लगातार काम कर रहे हैं, जिससे उनके खुद बीमार पड़ने का खतरा बढ़ गया है। नेपाल के सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) से तुरंत मेडिकल इमरजेंसी घोषित कर बड़े पैमाने पर मोबाइल मेडिकल यूनिट्स भेजने की गुहार लगाई है।

भारत के सीमावर्ती राज्यों में भी अलर्ट: गंडक और कोसी बेसिन पर मंडराता खतरा

नेपाल में मची इस तबाही का सीधा असर भारतीय सीमा पर भी साफ दिखाई दे रहा है। नेपाल से निकलने वाली नदियों का पानी बिहार के पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, सारण और उत्तर प्रदेश के महाराजगंज, कुशीनगर जिलों में भारी दबाव बना रहा है। वाल्मीकि नगर बैराज और कोसी बराज पर जलस्तर की निगरानी 24 घंटे की जा रही है।

भारतीय प्रशासन ने न केवल सीमावर्ती इलाकों में हाई अलर्ट जारी किया है, बल्कि सीमा पार से फैलने वाली महामारियों को रोकने के लिए मेडिकल स्क्रीनिंग टीमें भी तैनात की हैं। दोनों देशों की भौगोलिक निकटता के कारण नेपाल में फैल रही संक्रामक बीमारियों का असर सीमावर्ती भारतीय गांवों पर भी पड़ने का गंभीर खतरा पैदा हो गया है, जिसके चलते राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) और स्वास्थ्य विभाग पूरी मुस्तैदी से हालात पर नजर बनाए हुए हैं।

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