सिंधु जल संधि पर भारत के कड़े रुख से पाकिस्तान में मचा हाहाकार, पानी की भारी किल्लत

सिंधु जल संधि पर भारत के कड़े रुख से पाकिस्तान में मचा हाहाकार, पानी की भारी किल्लत

भारतीय उपमहाद्वीप के दो पड़ोसी देशों के बीच दशकों से चला आ रहा जल बंटवारा विवाद अब एक बेहद गंभीर और ऐतिहासिक मोड़ पर पहुंच चुका है। भारत द्वारा सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty - IWT) को निलंबित करने और इसके पुनरीक्षण को लेकर अपनाए गए कड़े और सख्त रुख के कारण पाकिस्तान में अभूतपूर्व जल संकट पैदा हो गया है। पाकिस्तान के जल संसाधन मंत्रालय और सिंचाई विभागों से आ रही रिपोर्टों के मुताबिक, देश की प्रमुख नदियों में पानी का प्रवाह रिकॉर्ड 22 प्रतिशत तक कम हो गया है। इस अचानक आई जल कमी के कारण पाकिस्तान के कृषि क्षेत्रों, पनबिजली परियोजनाओं और शहरी इलाकों में पीने के पानी के लिए भयंकर हाहाकार मच गया है। भारत के इस कूटनीतिक और रणनीतिक प्रहार ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और उनके प्रशासनिक महकमे की रातों की नींद उड़ा कर रख दी है।

नदियों में 22% गिरा पानी का स्तर, पंजाब और सिंध प्रांत में सूखे जैसे हालात

सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी प्रमुख नदियों के पानी पर पूरी तरह निर्भर रहने वाले पाकिस्तान के दो सबसे बड़े और उपजाऊ राज्यों—पंजाब और सिंध—में स्थिति बेहद भयावह होती जा रही है। नहरों में पानी का बहाव थमने और जलस्तर में 22 फीसदी की भारी गिरावट दर्ज किए जाने के बाद से किसानों की खड़ी फसलें सूखने की कगार पर पहुंच गई हैं। पाकिस्तान का कृषि क्षेत्र, जो वहां की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है, इस जल संकट की वजह से पूरी तरह तबाह होने के कगार पर है। कपास, गेहूं और चावल की पैदावार में भारी गिरावट की आशंका जताई जा रही है। स्थानीय प्रांतीय सरकारों ने पानी की आपातकालीन राशनिंग लागू कर दी है, जिससे किसानों और आम नागरिकों के बीच आक्रोश और हिंसक झड़पों की खबरें भी सामने आने लगी हैं।

आखिर क्यों भारत ने उठाया सिंधु जल संधि को लेकर इतना कठोर और निर्णायक कदम?

वर्ष 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से भारत और पाकिस्तान के बीच हुई 'सिंधु जल संधि' को दुनिया की सबसे टिकाऊ संधियों में से एक माना जाता था। हालांकि, पिछले कुछ दशकों में पाकिस्तान द्वारा भारत के खिलाफ प्रायोजित आतंकवाद, जम्मू-कश्मीर में अशांति फैलाने की लगातार कोशिशों और संधि के प्रावधानों का दुरुपयोग करके भारत की रन-ऑफ-द-रिवर जलविद्युत परियोजनाओं (जैसे रैटल और किशनगंगा) में अड़ंगा लगाने की आदतों से तंग आकर भारत ने रुख सख्त कर लिया है। भारत सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि "रक्त और पानी एक साथ नहीं बह सकते"। भारत ने संधि में संशोधन और अपनी जल जरूरतों को प्राथमिकता देने के लिए प्रक्रियाएं तेज कर दी हैं, जिसके तहत अपनी सीमाओं के भीतर पानी के अधिकतम उपयोग और भंडारण क्षमताओं को बढ़ाया जा रहा है।

शहबाज शरीफ सरकार के लिए दोहरी मुसीबत, अर्थव्यवस्था पर मंडराया कंगाली का खतरा

पहले से ही भारी विदेशी कर्ज, रिकॉर्ड तोड़ महंगाई और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए यह जल संकट एक विनाशकारी झटके की तरह सामने आया है। यदि समय रहते फसलों की सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिला, तो पाकिस्तान में खाद्यान्न संकट (Food Crisis) और विकराल रूप ले लेगा, जिससे देश में भुखमरी की स्थिति पैदा हो सकती है। इसके अलावा, नदियों का पानी कम होने से पाकिस्तान की जलविद्युत परियोजनाएं भी ठप पड़ रही हैं, जिससे बिजली उत्पादन में भारी कटौती करनी पड़ रही है। शहबाज शरीफ सरकार अब अंतरराष्ट्रीय मंचों और विश्व बैंक का दरवाजा खटखटाने की कोशिश कर रही है, लेकिन भारत के कड़े और तार्किक रुख के आगे इस्लामाबाद को कोई खास राहत मिलती नजर नहीं आ रही है।

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और भविष्य में जल संकट का विकराल रूप

भारत द्वारा जल संसाधनों के रणनीतिक प्रबंधन ने यह साबित कर दिया है कि अगर पाकिस्तान अपनी नापाक हरकतों और भारत विरोधी गतिविधियों को बंद नहीं करता है, तो भारत के पास ऐसे कई गैर-सैन्य विकल्प मौजूद हैं जो विरोधी देश की रीढ़ तोड़ सकते हैं। जल विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में यदि पानी का बहाव इसी तरह प्रभावित रहा, तो पाकिस्तान का उद्योग और कृषि पूरी तरह ठप हो जाएगा। अब गेंद पूरी तरह से पाकिस्तान के पाले में है—उसे यह तय करना होगा कि वह आतंकवाद का रास्ता चुनता है या फिर अपनी जनता की प्यास और आजीविका बचाने के लिए भारत के साथ शांतिपूर्वक वार्ता की मेज पर आता है।