क्या खत्म होने वाला है रूस-यूक्रेन युद्ध? पुतिन अमेरिका और कीव से त्रिपक्षीय शांति वार्ता को हुए तैयार

क्या खत्म होने वाला है रूस-यूक्रेन युद्ध? पुतिन अमेरिका और कीव से त्रिपक्षीय शांति वार्ता को हुए तैयार

रूस और यूक्रेन के बीच वर्षों से जारी विनाशकारी सैन्य संघर्ष के अंत को लेकर अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों में एक नई हलचल देखने को मिली है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अमेरिका और कीव के साथ त्रिपक्षीय शांति वार्ता को दोबारा शुरू करने पर सहमति व्यक्त की है। क्रेमलिन के अधिकारियों के मुताबिक, मॉस्को ने अमेरिका की मध्यस्थता में यूक्रेन के साथ बातचीत की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए अपनी तत्परता दिखाई है। सेंट पीटर्सबर्ग में अमेरिकी विशेष दूत के साथ हुई उच्चस्तरीय बैठक के बाद क्रेमलिन की ओर से यह सकारात्मक संकेत सामने आया है, जिसके बाद यह सवाल तेजी से उठने लगा है कि क्या लंबे समय से खिंच रहा यह युद्ध अब अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहा है।

त्रिपक्षीय वार्ता का नया दौर: नवंबर में शुरू हो सकती है बातचीत की प्रक्रिया

रूस की ओर से सामने आए बयानों के अनुसार, यह वार्ता नवंबर के दूसरे हफ्ते के बाद शुरू करने का प्रस्ताव रखा गया है। इस संभावित बातचीत का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच युद्ध के बाद एक स्थायी सुरक्षा व्यवस्था (Post-Conflict Security System) तैयार करना और युद्धविराम की शर्तों को तय करना है। इससे पहले भी जिनेवा और अबू धाबी में गोपनीय स्तर पर वार्ताएं हुई थीं, लेकिन दोनों पक्षों के कड़े रुख के कारण ठोस परिणाम नहीं निकल सके थे। अब वाशिंगटन के कूटनीतिक दखल और दोनों पक्षों पर बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच मॉस्को का बातचीत के लिए तैयार होना शांति प्रयासों में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

पुतिन की प्रमुख शर्तें: किन मुद्दों पर अड़ा हुआ है रूस?

बातचीत की सहमति के बावजूद पुतिन प्रशासन ने यह साफ कर दिया है कि वह अपनी सुरक्षा चिंताओं और जमीनी हकीकत से कोई समझौता नहीं करेगा। रूस की प्राथमिक शर्तों में यूक्रेन का नाटो में शामिल न होना, यूक्रेन की तटस्थ सैन्य स्थिति सुनिश्चित करना और डोनबास समेत उन क्षेत्रों की मौजूदा स्थिति को स्वीकार करना शामिल है जहां रूसी सेना नियंत्रण में है। इसके अलावा, रूस पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों में ढील और अपनी ऊर्जा सुरक्षा पर लगे प्रतिबंधों को हटाने की मांग भी मेज पर रख रहा है। रूसी विदेश मंत्रालय ने पहले भी स्पष्ट किया है कि बातचीत के दौरान मोर्चे पर सैन्य गतिविधियां तब तक पूरी तरह नहीं रुकेंगी जब तक कि किसी कानूनी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हो जाते।

यूक्रेन और राष्ट्रपति जेलेंस्की का रुख: क्या कीव मानेगा शर्तें?

दूसरी तरफ, यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की का रुख अब भी बेहद सतर्क बना हुआ है। जेलेंस्की का कहना है कि किसी भी स्थायी शांति के लिए दोनों देशों के शीर्ष नेताओं की सीधी बैठक अनिवार्य है। यूक्रेन ने बार-बार दोहराया है कि अपनी संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सीमाओं का सौदा करके शांति समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। हाल के हफ्तों में ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर हमलों को लेकर दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप और तेज हुए हैं, जिसके चलते कीव को संदेह है कि रूस बातचीत के जरिए केवल अपनी सैन्य रणनीतियों को रीग्रुप करने का समय हासिल करना चाहता है। हालांकि, अमेरिकी दबाव और पश्चिमी देशों की घटती सैन्य आपूर्ति के बीच यूक्रेन पर भी बातचीत की मेज पर आने का भारी दबाव है।

वाशिंगटन की मध्यस्थता और भू-राजनीतिक समीकरण

अमेरिका में सत्ता के बदलते रुख और चुनावी प्राथमिकताओं ने इस युद्ध को समाप्त करने के प्रयासों को गति दी है। वाशिंगटन का स्पष्ट संदेश है कि वह युद्ध को अनिश्चितकाल तक फंड करने के पक्ष में नहीं है और दोनों पक्षों को समझौते के रास्ते पर आना होगा। अमेरिकी विशेष दूतों की लगातार मॉस्को और यूरोपीय राजधानियों में आवाजाही यह दर्शाती है कि युद्धविराम का एक ढांचा तैयार करने की गंभीर कोशिशें जारी हैं। भारत और चीन जैसे वैश्विक प्रभाव वाले देश भी लगातार यह दोहराते रहे हैं कि यह दौर युद्ध का नहीं है और विवादों का हल केवल कूटनीति और संवाद से ही संभव है।

क्या सचमुच खत्म होने की कगार पर है युद्ध?

पुतिन का अमेरिका और यूक्रेन के साथ बातचीत के लिए हामी भरना कूटनीतिक स्तर पर एक बड़ी प्रगति जरूर है, लेकिन इसे तुरंत युद्ध का अंत मान लेना जल्दबाजी होगी। दोनों देशों के बीच क्षेत्रीय दावों, सुरक्षा गारंटियों और युद्ध अपराधों की जवाबदेही को लेकर खाई इतनी गहरी है कि समझौते का प्रारूप तैयार करना आसान नहीं होगा। फिर भी, बंद कमरों से निकलकर औपचारिक त्रिपक्षीय वार्ता की मेज पर बैठने की यह सहमति यह उम्मीद जरूर जगाती है कि पिछले कई सालों से जारी रक्तपात और वैश्विक आर्थिक संकट पर पूर्णविराम लगाने की दिशा में पहली बार कोई ठोस आधार तैयार हो रहा है।