चीन से आ रही नई तबाही? नेपाल-तिब्बत सीमा पर ग्लेशियल झील में खतरनाक ओवरफ्लो शुरू, अगले 72 घंटे बेहद नाजुक; भारत तक हाई अलर्ट
नेपाल के रसुवा जिले में 26 अगस्त को आई प्रलयंकारी बाढ़ की तबाही के घाव अभी भरे भी नहीं थे कि तिब्बत के ऊपरी हिमालयी क्षेत्र से एक और बड़े संकट की घंटी बज गई है। उपग्रह से प्राप्त ताजी तस्वीरों और भूगर्भीय निगरानी प्रणालियों ने संकेत दिया है कि नेपाल-चीन सीमा के ठीक पार, तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र (TAR) के ऊंचे पहाड़ों में स्थित एक विशाल ग्लेशियल झील का मुहाना खतरनाक स्तर तक ओवरफ्लो होने लगा है। भूवैज्ञानिकों और आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि प्राकृतिक मलबे का यह बांध अगले 72 घंटों के भीतर टूटता है, तो भोटेकोशी और त्रिशूली नदी घाटी में पहले से कहीं अधिक भीषण जलप्रलय आ सकती है। इस चेतावनी के सामने आते ही नेपाल प्रशासन ने नदी तटीय इलाकों में रहने वाले हजारों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने के निर्देश जारी कर दिए हैं, वहीं भारत के सीमावर्ती जिलों में भी निगरानी बढ़ा दी गई है।
तिब्बत के ऊपरी जलक्षेत्र में क्या हो रहा है? सैटेलाइट तस्वीरों ने बढ़ाई चिंता
रसुवा त्रासदी की शुरुआती जांच के दौरान वैज्ञानिकों ने पाया था कि ल्हेंदे खोला और भोटेकोशी के उद्गम क्षेत्रों में विशाल हिमस्खलन और चट्टानों के गिरने से प्राकृतिक अवरोध बने थे। अब ताजा सैटेलाइट डेटा से पता चला है कि चीनी सीमा के अंदर, अत्यधिक ऊंचाई पर मौजूद एक अन्य ग्लेशियल झील में असामान्य हलचल हो रही है। पिछले कुछ दिनों में तापमान में हुई मामूली वृद्धि और मलबे के दबाव के कारण झील का जलस्तर रिकॉर्ड स्तर तक बढ़ चुका है। पानी अब झील के बाहरी किनारे (मोरेन) के ऊपर से बहना शुरू हो गया है। भूविज्ञान की भाषा में इसे 'ओवरटोपिंग' कहा जाता है, जो किसी भी प्राकृतिक बांध के टूटने का सबसे पहला और खतरनाक चरण होता है।
72 घंटों की समयसीमा और GLOF का गंभीर खतरा
आपदा वैज्ञानिकों के अनुसार, अगले 72 घंटे इस पूरे इलाके के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ग्लेशियल झीलों के किनारे किसी कंक्रीट से नहीं, बल्कि बर्फ, मिट्टी और ढीले पत्थरों (मोरेन) से बने होते हैं। जब पानी इन पत्थरों के ऊपर से तेजी से बहता है, तो वह बांध की नींव को काटना शुरू कर देता है। जैसे ही कटाव एक निश्चित गहराई तक पहुंचता है, पूरा मोरेन बांध अचानक ढह जाता है, जिससे अरबों लीटर पानी और लाखों टन मलबा कुछ ही मिनटों में बाहर निकल जाता है। इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहा जाता है। यदि यह अवरोध टूटा, तो भोटेकोशी नदी में पानी की गति और मलबे का घनत्व इतना अधिक होगा कि निचले इलाकों में लोगों को संभलने के लिए मात्र 15 से 20 मिनट का समय मिलेगा।
भोटेकोशी और त्रिशूली बेसिन में फिर मच सकता है हाहाकार
रसुवागढ़ी, तिमुरे, स्याफ्रुबेसी और नुवाकोट जैसे इलाके पहले ही 26 अगस्त की बाढ़ में भारी नुकसान झेल चुके हैं। यदि तिब्बत से पानी का नया सैलाब आता है, तो पहले से कमजोर हो चुके पुल, सड़कें और राहत शिविर सीधे इसकी जद में आ जाएंगे। इसके अलावा, त्रिशूली और भोटेकोशी नदी बेसिन पर स्थित जो जलविद्युत परियोजनाएं हालिया आपदा में बच गई थीं या आंशिक रूप से प्रभावित हुई थीं, उनके लिए यह नया प्रवाह पूरी तरह विनाशकारी साबित हो सकता है। पहाड़ी संकरी घाटियों में पानी का स्तर 10 से 15 मीटर तक ऊपर उठने की आशंका जताई जा रही है, जो तलहटी में बसी बस्तियों को जलमग्न कर सकता है।
भारत के बिहार और उत्तर प्रदेश पर क्या होगा असर?
हिमालय की नदियां भौगोलिक सीमाओं में नहीं बंधी हैं। नेपाल की त्रिशूली और भोटेकोशी नदियां आगे चलकर नारायणी (गंडक) नदी प्रणाली का हिस्सा बनती हैं, जो सीधे भारत के बिहार राज्य में वाल्मीकि नगर के रास्ते प्रवेश करती है। यदि नेपाल के ऊपरी हिस्से में दूसरा फ्लैश फ्लड आता है, तो गंडक और कोसी बेसिन में भारी मात्रा में पानी और गाद का दबाव बढ़ेगा। इससे बिहार के पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, सारण और उत्तर प्रदेश के महाराजगंज व कुशीनगर जैसे सीमावर्ती जिलों में अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। इसे देखते हुए भारतीय जल आयोग (CWC) और सीमा सुरक्षा बल (SSB) के जवान भी जलस्तर पर लगातार नजर रख रहे हैं।
दोनों देशों की एजेंसियां अलर्ट पर, निकासी और बचाव की आपात तैयारी
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए नेपाल और चीन की संबंधित आपदा प्रबंधन एजेंसियों के बीच आपातकालीन समन्वय शुरू हो गया है। चीनी हाइड्रोलॉजिकल स्टेशन रियल-टाइम जलप्रवाह का डेटा काठमांडू स्थित नियंत्रण कक्ष के साथ साझा कर रहे हैं। नेपाल के गृह मंत्रालय ने रसुवा, नुवाकोट, धादिंग और चितवन जिलों के स्थानीय प्रशासन को 'रेड अलर्ट' पर रहने का निर्देश दिया है। नदी के किनारों पर सायरन और लाउडस्पीकर के माध्यम से ग्रामीणों को ऊपरी पहाड़ी इलाकों में शरण लेने की चेतावनी दी जा रही है। साथ ही, नेपाली सेना और सशस्त्र पुलिस बल के त्वरित प्रतिक्रिया दलों (QRT) को लाइफबोट और हेलीकॉप्टरों के साथ स्टैंडबाय पर रखा गया है ताकि किसी भी आपात स्थिति में तत्काल रेस्क्यू अभियान शुरू किया जा सके।
भविष्य का संकट: हिमालय में बार-बार क्यों बन रहे हैं ऐसे जल बम?
ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के कारण पूरे हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियर बहुत तेजी से सिकुड़ रहे हैं। विशेषज्ञों का आकलन है कि नेपाल और तिब्बत के पहाड़ों में 2,000 से अधिक ऐसी ग्लेशियल झीलें हैं, जिनमें से कम से कम 47 झीलें कभी भी फटने की कगार पर हैं। जब तक इन खतरनाक झीलों की नियमित निगरानी, पानी की नियंत्रित निकासी (साइफनिंग) और अर्ली वार्निंग सेंसरों की स्थापना नहीं की जाती, तब तक हिमालय की इन घाटियों में रहने वाले लाखों लोगों के सिर पर यह अनदेखा जल बम हमेशा लटकता रहेगा।