सऊदी प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का ऐतिहासिक फैसला

सऊदी प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का ऐतिहासिक फैसला

पश्चिम एशिया यानी मिडल ईस्ट की भू-राजनीति और सुरक्षा समीकरणों में एक बहुत ही बड़ा और अप्रत्याशित मोड़ सामने आया है। लाल सागर (Red Sea) में यमन के हूति विद्रोहियों (Houthi Rebels) के लगातार बढ़ते मिसाइल और ड्रोन हमलों से निपटने के लिए इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (Benjamin Netanyahu) द्वारा दिए गए साझा सैन्य गठबंधन के प्रस्ताव को सऊदी अरब के शक्तिशाली क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने पूरी तरह से ठुकरा दिया है। सऊदी अरब ने साफ कर दिया है कि वह हूतियों के खिलाफ किसी भी तरह के सीधे सैन्य अभियान या गठबंधन में इजरायल को अपने साथ शामिल नहीं करेगा। रियाद के इस सख्त और दोटूक रुख से तेल अवीव (इजरायल) के प्रशासनिक और सुरक्षा गलियारों में भारी खलबली मच गई है, क्योंकि इजरायल को उम्मीद थी कि अब्राहम एकॉर्ड्स के विस्तार और अरब-इजरायल संबंधों के नए दौर में सऊदी अरब हूतियों के खिलाफ उसका खुलकर साथ देगा।

आखिर सऊदी प्रिंस को सता रहा है किस बात का बड़ा डर, क्यों लिया यह रणनीतिक फैसला?

सऊदी अरब द्वारा इजरायल के इस लुभावने ऑफर को ठुकराने के पीछे कोई जल्दबाजी नहीं, बल्कि बेहद ही सोची-समझी कूटनीतिक रणनीति और क्षेत्रीय सुरक्षा का बड़ा डर छिपा हुआ है। दरअसल, सऊदी अरब पिछले कई सालों से यमन के साथ सीधे युद्ध में उलझा हुआ था, जिसके चलते हूतियों ने सऊदी अरब की प्रमुख तेल रिफाइनरियों (जैसे अरामको के ठिकानों) और नागरिक हवाई अड्डों पर घातक मिसाइल हमले किए थे। इन हमलों से सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा था। लंबे समय के बाद चीन की मध्यस्थता से सऊदी अरब और ईरान के बीच कूटनीतिक संबंध फिर से बहाल हुए हैं, और यमन में शांति प्रक्रिया की शुरुआत हुई है। अगर सऊदी प्रिंस अब इजरायल के साथ मिलकर हूतियों पर हमला करते हैं, तो यमन में चल रही शांति वार्ता पूरी तरह से ध्वस्त हो जाएगी और हूतियों के साथ-साथ ईरान का गुस्सा एक बार फिर सऊदी अरब की सरजमीं पर फूट सकता है।

लाल सागर में जारी समुद्री संकट और इजरायल की अकेले पड़ने की मजबूरी

इजरायल और गाजा संघर्ष के शुरू होने के बाद से ही यमन के हूतियों ने लाल सागर से गुजरने वाले इजरायल-संबद्ध और पश्चिमी देशों के व्यापारिक जहाजों पर हमले तेज कर दिए हैं। अमेरिका और ब्रिटेन ने 'ऑपरेशन प्रॉस्परिटी गार्जियन' के तहत हूतियों के ठिकानों पर कई बार हवाई हमले किए हैं, लेकिन इसके बावजूद हूतियों की हमलावर क्षमता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। नेतन्याहू चाहते थे कि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे प्रमुख खाड़ी देश खुलकर इजरायल के साथ खड़े हों ताकि लाल सागर के समुद्री व्यापार मार्ग को सुरक्षित बनाया जा सके और हूतियों पर चौतरफा कूटनीतिक व सैन्य दबाव बनाया जा सके। हालांकि, सऊदी अरब के इस इंकार ने इजरायल को इस क्षेत्र में रणनीतिक रूप से काफी हद तक अलग-थलग कर दिया है, जिससे इजरायल को अब लाल सागर के मोर्चे पर अकेले या केवल अमेरिका के भरोसे ही आगे बढ़ना पड़ेगा।

रियाद की नई विदेश नीति, आर्थिक विकास और विजन 2030 पर ध्यान केंद्रित करने की योजना

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का मुख्य ध्यान इस समय देश को तेल पर निर्भरता से बाहर निकालकर 'विज़न 2030' (Vision 2030) के तहत एक वैश्विक पर्यटन, व्यापार और तकनीकी हब बनाने पर है। इसके लिए रियाद को पूरे मिडल ईस्ट क्षेत्र में स्थिरता और शांति की सख्त जरूरत है। सऊदी अरब अच्छी तरह जानता है कि इजरायल के साथ खुलकर किसी भी सैन्य गठजोड़ में शामिल होने से पूरे अरब जगत और मुस्लिम दुनिया में उसकी छवि को नुकसान पहुंचेगा, और साथ ही उसके अपने महत्वाकांक्षी आर्थिक प्रोजेक्ट्स (जैसे नियोम सिटी) सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील और खतरे में पड़ जाएंगे। इसलिए, सऊदी अरब ने इजरायल के साथ सामान्यीकरण (Normalization) की बातचीत को भी फिलहाल गाजा में पूर्ण युद्धविराम और स्वतंत्र फिलिस्तीन राज्य की शर्त से जोड़ रखा है।

मिडल ईस्ट के बदलते समीकरण और आने वाले समय में वैश्विक कूटनीति की दिशा

सऊदी अरब के इस कड़े रुख ने यह साबित कर दिया है कि अब खाड़ी देश अमेरिका या इजरायल के दबाव में आकर अपनी सुरक्षा प्राथमिकताओं से समझौता करने के मूड में बिल्कुल नहीं हैं। ईरान के साथ रिश्तों में आई नरमी और क्षेत्रीय स्थिरता को प्राथमिकता देने के सऊदी अरब के इस फैसले से मिडल ईस्ट में शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल गया है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद अहम होगा कि इजरायल इस कूटनीतिक झटके के बाद हूतियों की चुनौती से कैसे निपटता है और क्या अमेरिका लाल सागर में जहाजों की सुरक्षा के लिए किसी नए कूटनीतिक रास्ते की तलाश करता है या फिर सैन्य तनाव और गहराता है।