शहबाज शरीफ की जाएगी कुर्सी? पूर्व मंत्री का सनसनीखेज दावा- पाकिस्तान में पीएम नहीं, जनरल असीम मुनीर ले रहे हैं सारे फैसले

शहबाज शरीफ की जाएगी कुर्सी? पूर्व मंत्री का सनसनीखेज दावा- पाकिस्तान में पीएम नहीं, जनरल असीम मुनीर ले रहे हैं सारे फैसले

पड़ोसी देश पाकिस्तान की राजनीति में एक बार फिर तख्तापलट और भारी उथल-पुथल की सुगबुगाहट तेज हो गई है। देश के पूर्व वित्त मंत्री मिफ्ताह इस्माइल ने एक पॉडकास्ट में बेहद चौंकाने वाला दावा करते हुए कहा है कि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का कार्यकाल अब अंतिम सांसें गिन रहा है और साल 2026 उनके लिए बतौर प्रधानमंत्री आखिरी साल साबित हो सकता है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब शहबाज सरकार अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी कूटनीतिक सफलताओं का ढिंढोरा पीट रही है, लेकिन अंदरूनी हकीकत इसके उलट बेहद कमजोर नजर आ रही है।

गृह मंत्री के एक ट्वीट से खुला राज, पीएम को छोड़ 'जनरल' को दी गई बधाई

मिफ्ताह इस्माइल ने अपने दावों को पुख्ता करने के लिए पाकिस्तान के मौजूदा गृह मंत्री मोहसिन नकवी के एक सोशल मीडिया पोस्ट का हवाला दिया। उन्होंने बताया कि ईरान के साथ हुए एक बेहद महत्वपूर्ण और रणनीतिक समझौते के बाद, गृह मंत्री नकवी ने देश के वास्तविक मुखिया यानी फील्ड मार्शल जनरल असीम मुनीर को तो बधाई दी, लेकिन देश के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का नाम तक नहीं लिया। इस्माइल के मुताबिक, यह घटना साफ करती है कि सरकार के भीतर और कैबिनेट मंत्रियों को भी अच्छी तरह पता है कि सत्ता का असली रिमोट कंट्रोल किसके हाथ में है।

4 साल से आर्थिक नरक झेल रहा है पाकिस्तान, रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची बेरोजगारी

शहबाज शरीफ की प्रशासनिक नाकामियों को उजागर करते हुए पूर्व वित्त मंत्री ने आर्थिक मोर्चे पर सरकार को बुरी तरह घेरा है। उन्होंने कहा कि बीते चार साल पाकिस्तान के इतिहास में आर्थिक रूप से सबसे काले साल रहे हैं। देश की विकास दर (GDP) पूरी तरह वेंटिलेटर पर है, जबकि महंगाई और गरीबी ने आम जनता की कमर तोड़ दी है। पाकिस्तान में बेरोजगारी इस समय कई दशकों के सर्वोच्च स्तर पर पहुंच चुकी है, जिससे युवाओं में सरकार के खिलाफ भारी आक्रोश है और देश गृहयुद्ध जैसे हालात की तरफ बढ़ रहा है।

रोजमर्रा के काम कर रहे हैं पीएम, बड़े फैसलों पर सेना का पूर्ण कब्जा

इस्माइल ने पाकिस्तान के मौजूदा सत्ता समीकरण का विश्लेषण करते हुए कहा कि इस समय देश के सभी महत्वपूर्ण नीतिगत, आंतरिक सुरक्षा और रणनीतिक फैसलों पर पाकिस्तानी सेना (रावलपिंडी) का पूर्ण और सीधा प्रभाव है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की भूमिका केवल रोजमर्रा के प्रशासनिक कार्यों और कागजों पर दस्तखत करने तक ही सीमित रह गई है। बड़े और निर्णायक राष्ट्रीय मुद्दों पर प्रधानमंत्री को विश्वास में भी नहीं लिया जा रहा है, जिससे यह साफ है कि देश में अघोषित रूप से सैन्य शासन लागू हो चुका है।

जनता में खत्म हुई लोकप्रियता, क्या सेना ढूंढ रही है शहबाज का विकल्प?

मिफ्ताह इस्माइल का मानना है कि शहबाज शरीफ की इस दुर्दशा के पीछे उनकी लगातार गिरती राजनीतिक लोकप्रियता है। किसी भी लोकतांत्रिक देश में जनसमर्थन सबसे बड़ी ताकत होती है, लेकिन शहबाज सरकार पूरी तरह से जनाधार खो चुकी है। इस्माइल ने रणनीतिक इशारा करते हुए कहा कि जब कोई नेता जनता के बीच अपनी स्वीकार्यता पूरी तरह खो देता है, तो देश का शक्तिशाली 'सत्ता प्रतिष्ठान' (एस्टेब्लिशमेंट/सेना) भी उसे ज्यादा दिनों तक कुर्सी पर बनाए रखने का जोखिम नहीं उठाता। ऐसे में 2026 में शहबाज शरीफ की विदाई तय मानी जा रही है।