अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा आज: 25 करोड़ वोटर तय करेंगे संसद पर किसका होगा राज

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा आज: 25 करोड़ वोटर तय करेंगे संसद पर किसका होगा राज

अमेरिकी लोकतंत्र के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण और तनावपूर्ण चुनावी दिन आ पहुंचा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के ठीक दो साल पूरे होने पर आज देश भर के 25 करोड़ से अधिक पंजीकृत मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर रहे हैं। हालांकि इस चुनाव में राष्ट्रपति पद के लिए सीधे वोट नहीं डाले जा रहे हैं, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे राष्ट्रपति ट्रंप के नेतृत्व, उनकी आर्थिक नीतियों और अंतरराष्ट्रीय फैसलों पर अमेरिकी जनता का सीधा 'रेफरेंडम' (जनमत संग्रह) मान रहे हैं। इस मतदान के जरिए अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस के दोनों सदनों—निचले सदन 'प्रतिनिधि सभा' (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) और उच्च सदन 'सीनेट'—के शक्ति संतुलन का फैसला होना है। सुबह से ही वाशिंगटन डीसी, न्यूयॉर्क, फ्लोरिडा, कैलिफोर्निया, टेक्सास और पेंसिल्वेनिया समेत सभी 50 राज्यों के पोलिंग बूथों पर मतदाताओं की लंबी कतारें देखी जा रही हैं, जबकि 5 करोड़ से अधिक अमेरिकी नागरिक पहले ही मेल-इन बैलेट और अर्ली वोटिंग के जरिए अपना फैसला दर्ज करा चुके हैं।

प्रतिनिधि सभा की सभी 435 और सीनेट की 35 सीटों पर किस्मत का फैसला, जानिए सीटों का गणित

इस मिडटर्म चुनाव में अमेरिकी कांग्रेस की संरचना को पूरी तरह बदलने की क्षमता है। संसद के निचले सदन 'प्रतिनिधि सभा' की सभी 435 सीटों पर एक साथ चुनाव हो रहे हैं, जिनका कार्यकाल दो साल का होता है। प्रतिनिधि सभा में बहुमत का जादुई आंकड़ा 218 सीटों का है। वर्तमान में रिपब्लिकन पार्टी के पास 218 सीटें हैं, जबकि विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के पास 214 सीटें हैं, यानी डेमोक्रेट्स को सदन पर कब्जा करने के लिए केवल 4 सीटों का शुद्ध लाभ (नेट गेन) हासिल करना है। दूसरी ओर, 100 सदस्यों वाली शक्तिशाली सीनेट में बहुमत के लिए 51 सीटों की आवश्यकता होती है। इस समय सीनेट में रिपब्लिकन पार्टी के पास 53-47 का बहुमत है। इस बार सीनेट की 35 सीटों पर मतदान हो रहा है, जिसमें से दो विशेष चुनाव (स्पेशल इलेक्शन) फ्लोरिडा और ओहियो में खाली हुई सीटों को भरने के लिए कराए जा रहे हैं। इसके अलावा, 36 राज्यों में गवर्नर्स (राज्यपालों) और स्थानीय प्रशासनिक पदों के लिए भी जनता अपने मत का प्रयोग कर रही है।

क्या चुनाव हारने पर छिन जाएगी ट्रंप की कुर्सी? समझिए अमेरिकी संविधान की व्यवस्था

आम जनता और वैश्विक दर्शकों के मन में सबसे बड़ा संशय यही रहता है कि क्या मिडटर्म चुनाव हारने पर डोनाल्ड ट्रंप की राष्ट्रपति की कुर्सी चली जाएगी? इसका सीधा और स्पष्ट संवैधानिक उत्तर है—नहीं। अमेरिकी संविधान के तहत राष्ट्रपति का कार्यकाल पूरे चार वर्षों का होता है, इसलिए नतीजों के चाहे जो भी आंकड़े आएं, डोनाल्ड ट्रंप 20 जनवरी 2029 तक संवैधानिक रूप से अमेरिका के राष्ट्रपति बने रहेंगे। लेकिन यदि उनकी रिपब्लिकन पार्टी प्रतिनिधि सभा या सीनेट में अपना बहुमत खो देती है, तो ट्रंप अपने शेष दो वर्षों के कार्यकाल में राजनीतिक रूप से 'लेम डक' (शक्तिहीन) राष्ट्रपति बनकर रह जाएंगे। अमेरिकी प्रणाली में कानून बनाने और देश का बजट (फेडरल स्पेंडिंग) पास करने की असली ताकत संसद के पास होती है। यदि संसद पर डेमोक्रेट्स का नियंत्रण हो गया, तो ट्रंप की घरेलू नीतियों, टैक्स रिफॉर्म्स और बजट प्रस्तावों पर पूरी तरह ब्रेक लग जाएगा।

डेमोक्रेट्स की वापसी हुई तो ट्रंप प्रशासन पर चलेगा संसदीय जांच और समन का चाबुक

यदि विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी निचले सदन (प्रतिनिधि सभा) में 4 सीटें छीनकर बहुमत हासिल कर लेती है, तो वाशिंगटन की सत्ता का स्वरूप रातों-रात बदल जाएगा। निचले सदन पर नियंत्रण मिलने का मतलब है कि सभी प्रमुख संसदीय समितियों (जैसे हाउस ओवरसाइट, ज्यूडिशियरी और फॉरेन अफेयर्स) की अध्यक्षता डेमोक्रेट्स के हाथों में आ जाएगी। विपक्षी सांसद ट्रंप प्रशासन के पिछले दो वर्षों के नीतिगत फैसलों, विदेशी व्यापार समझौतों, आव्रजन (इमिग्रेशन) पर लिए गए कड़े प्रशासनिक आदेशों और वित्तीय रिकॉर्ड्स की उच्चस्तरीय संसदीय जांच शुरू कर सकेंगे। समितियों के पास कैबिनेट मंत्रियों और शीर्ष अधिकारियों को समन भेजकर तलब करने का कानूनी अधिकार होगा। इसके अलावा, अमेरिकी संविधान के तहत राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग (इम्पीचमेंट) की प्रक्रिया शुरू करने का एकाधिकार केवल प्रतिनिधि सभा के पास ही होता है। हालांकि, राष्ट्रपति को पद से हटाने के लिए सीनेट में दो-तिहाई बहुमत की दरकार होती है, लेकिन महाभियोग की कार्यवाही ट्रंप के लिए भारी राजनीतिक सिरदर्द साबित हो सकती है।

महंगाई, टैरिफ और विदेश नीति बने सबसे बड़े चुनावी मुद्दे, बैटलग्राउंड सीटों पर महा-मुकाबला

इस बार का मिडटर्म चुनाव पूरी तरह से घरेलू अर्थव्यवस्था, बढ़ती महंगाई और आक्रामक विदेश नीतियों के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा है। चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों और एग्जिट अनुमानों के अनुसार, अमेरिकी जनता का एक बड़ा तबका दैनिक उपभोग की वस्तुओं की बढ़ती कीमतों, गिरती बचत और आयात शुल्क (टैरिफ) के कारण उपजी वित्तीय चुनौतियों को लेकर चिंतित दिखा है। वहीं दूसरी ओर पश्चिम एशिया का सैन्य तनाव और वैश्विक व्यापार युद्ध भी मतदान के रुझानों को प्रभावित कर रहे हैं। सीनेट के नियंत्रण के लिहाज से मेन (Maine), ओहियो (Ohio), टेक्सास (Texas) और कंसास (Kansas) जैसी 8 से 10 बैटलग्राउंड सीटों पर कांटे की टक्कर चल रही है, जहां जीत-हार का अंतर चंद हजार वोटों पर टिक सकता है। यदि रिपब्लिकन पार्टी सीनेट में अपनी बढ़त बरकरार रखने में कामयाब रहती है, तो ट्रंप को संघीय जजों और कैबिनेट नियुक्तियों को हरी झंडी दिलाने में कोई दिक्कत नहीं होगी।

भारत, चीन और दुनिया भर के वित्तीय बाजारों की नजरें वॉशिंगटन के नतीजों पर

अमेरिकी मिडटर्म चुनावों के परिणामों का व्यापक असर केवल अमेरिका की सीमाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका सीधा प्रभाव अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, रक्षा संधियों और वैश्विक वित्तीय बाजारों पर पड़ता है। भारत के दृष्टिकोण से देखा जाए तो ट्रंप की एच-1बी वीजा नीतियां, टैरिफ नीतियां और द्विपक्षीय व्यापार वार्ताएं इस बात पर निर्भर करेंगी कि अमेरिकी कांग्रेस में संतुलन कैसा रहता है। यदि अमेरिकी संसद में सत्ता विभाजित (स्प्लिट कांग्रेस) होती है, तो राष्ट्रपति के एकतरफा और आक्रामक व्यापारिक फैसलों पर अंकुश लगने की संभावना बढ़ जाती है, जिससे वैश्विक बाजारों में स्थिरता आती है। वहीं यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व के संकटों के लिए अमेरिकी सैन्य और वित्तीय सहायता का भविष्य भी इसी नई कांग्रेस की मंजूरी पर टिका होगा। मतदान संपन्न होने के बाद आज देर रात से नतीजों और रुझानों का सिलसिला शुरू हो जाएगा, जो यह तय करेगा कि अमेरिका का अगला राजनीतिक अध्याय ट्रंप के वर्चस्व का होगा या फिर विपक्ष की घेराबंदी का।