रूस से तेल खरीदने पर भारत को धमकाने वाले ट्रंप के बदले सुर: बोले- रूसी डीजल हमारे लिए नहीं, दुनिया के लिए है; प्रतिबंधों में दी छूट

रूस से तेल खरीदने पर भारत को धमकाने वाले ट्रंप के बदले सुर: बोले- रूसी डीजल हमारे लिए नहीं, दुनिया के लिए है; प्रतिबंधों में दी छूट

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार और कूटनीति के मंच पर अमेरिका का दोहरा मापदंड एक बार फिर दुनिया के सामने बेनकाब हो गया है। रूस-यूक्रेन संघर्ष की शुरुआत से ही भारत द्वारा अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदने को लेकर आंखें तरेरने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सुर अब पूरी तरह बदल चुके हैं। कल तक भारत, चीन और अन्य व्यापारिक साझेदारों पर 100 फीसदी तक दंडात्मक टैरिफ लगाने और द्वितीयक प्रतिबंधों (Secondary Sanctions) की धौंस जमाने वाले ट्रंप अब खुद रूस के साथ हुए अप्रत्याशित डीजल समझौते का पुरजोर बचाव करते नजर आ रहे हैं। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ हुई बातचीत के बाद जब अमेरिका के भीतर ही रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक सांसदों ने ट्रंप को घेरना शुरू किया, तो उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि यह डीजल अमेरिका के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के बाजार में ईंधन की बढ़ती कीमतों को थामने के लिए जारी किया जा रहा है।

क्या है पुतिन-ट्रंप की डीजल डील? अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने दी 2027 तक छूट

हाल ही में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की थी कि रूस अंतरराष्ट्रीय बाजार में तत्काल 3 लाख टन से अधिक डीजल की आपूर्ति करेगा। इसके बाद नवंबर में 5 लाख टन और उसके तुरंत बाद 10 लाख टन अतिरिक्त डीजल की खेप जारी की जाएगी। इस आपूर्ति को कानूनी रूप से संभव बनाने के लिए अमेरिकी ट्रेजरी विभाग (वित्त मंत्रालय) ने एक अस्थायी लाइसेंस जारी करते हुए वैश्विक बाजारों में रूसी डीजल के निर्यात पर लगे प्रतिबंधों में 7 अप्रैल 2027 तक के लिए ढील दे दी है। ट्रंप ने वाशिंगटन में संवाददाताओं से बात करते हुए अपने इस कदम को सही ठहराया और कहा, "यह डीजल का समझौता है, हमारे लिए नहीं। इसे दुनिया के बाजार के लिए जारी किया जा रहा है ताकि वहां कीमतों के संकट को कम किया जा सके। जब डीजल रिफाइनरियां बंद होती हैं तो असर पूरी दुनिया पर पड़ता है।"

भारत पर टैरिफ की तलवार और खुद के लिए सहूलियत: वाशिंगटन की दोहरी नीति

ट्रंप का यह बदला हुआ रुख इसलिए सबसे ज्यादा चर्चा में है क्योंकि ठीक तीन हफ्ते पहले ही अमेरिकी कांग्रेस ने 'लिंडसे ओ. ग्राहम रूस और ईरान पर प्रतिबंध अधिनियम 2026' पारित किया था। इस कानून के तहत राष्ट्रपति को अधिकार दिया गया था कि वे रूस से तेल और पेट्रोलियम उत्पाद खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ और आर्थिक बंदिशें लगा सकते हैं। उस वक्त वाशिंगटन ने भारत को परोक्ष चेतावनी देते हुए रूस से दूरी बनाने की नसीहत दी थी। भारत हमेशा से यह साफ करता रहा है कि 140 करोड़ नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है और वह बाजार की प्रतिस्पर्धी दरों पर ही तेल खरीदता है। अब जब अमेरिका में खुद डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं, तो ट्रंप ने अपने ही बनाए प्रतिबंधों की धज्जियां उड़ाते हुए मॉस्को से सीधा रास्ता खोल दिया है।

अमेरिकी मिडटर्म चुनाव और महंगाई: क्यों बैकफुट पर आए डोनाल्ड ट्रंप?

ट्रंप के इस यू-टर्न के पीछे कोई वैश्विक परोपकार नहीं, बल्कि उनकी अपनी घरेलू राजनीतिक मजबूरी छिपी है। अमेरिका में नवंबर में कांग्रेस के बेहद अहम मध्यावधि (मिडटर्म) चुनाव होने हैं। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और युद्ध के चलते वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और रिफाइंड ईंधनों की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है। अमेरिका में डीजल की खुदरा कीमतें 6 डॉलर प्रति गैलन के पार पहुंच गई हैं, जिससे ट्रांसपोर्टेशन, खेती और लॉजिस्टिक्स की लागत में भारी इजाफा हुआ है। अमेरिकी ट्रक चालक और किसान महंगाई से कराह रहे हैं, जिससे राष्ट्रपति ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी की अप्रूवल रेटिंग्स में भारी गिरावट आई है। मतदाताओं के आक्रोश से बचने और चुनाव से पहले ईंधन की कीमतों को नीचे लाने के लिए ही ट्रंप प्रशासन को रूस के आगे झुकना पड़ा है।

अमेरिका के अपने ही सांसदों ने खोला मोर्चा: 'सहयोगियों से धोखा और पुतिन को तोहफा'

ट्रंप के इस दोहरे रवैये का विरोध अब अमेरिका के कैपिटल हिल में गूंज रहा है। रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक दोनों ही दलों के वरिष्ठ सीनेटरों और सांसदों ने ट्रंप को एक साझा पत्र लिखकर इस डील को तुरंत रद्द करने की मांग की है। अमेरिकी सांसदों ने दो टूक शब्दों में कहा है कि यह फैसला हमारे सहयोगियों के साथ विश्वासघात और हमारे विरोधी (रूस) के लिए एक तोहफा है। सांसदों का तर्क है कि जहां एक तरफ अमेरिका अपने मित्र देशों जैसे भारत पर रूसी तेल न खरीदने का दबाव बनाता है, वहीं दूसरी तरफ रूस को डीजल बेचने की छूट देकर व्लादिमीर पुतिन के युद्ध तंत्र को अरबों डॉलर का आर्थिक सहारा दे रहा है।

नई दिल्ली का मजबूत स्टैंड: भारतीय विदेश नीति की नैतिक जीत

भारत के कूटनीतिक हलकों में ट्रंप के इस ताजा बयान को भारतीय विदेश नीति और राष्ट्रीय हितों की नैतिक जीत के रूप में देखा जा रहा है। भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर बार-बार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह स्पष्ट करते रहे हैं कि ऊर्जा खरीद को लेकर पश्चिमी देशों का नजरिया पाखंड से भरा रहा है। जब यूरोप और अमेरिका अपनी जरूरत के हिसाब से रूसी गैस और ईंधन की परिभाषा बदलते हैं, तो भारत को नैतिकता का पाठ पढ़ाने का उन्हें कोई अधिकार नहीं है। ट्रंप द्वारा वैश्विक बाजार में संतुलन के नाम पर रूसी डीजल की वकालत करना इस बात का सीधा प्रमाण है कि रूस की ऊर्जा आपूर्ति के बिना वैश्विक अर्थव्यवस्था चल ही नहीं सकती—यही बात भारत पहले दिन से कह रहा था।