ट्रंप का 'अधूरा ईरान मिशन': 15 हफ्तों की जंग और समझौते के बाद भी तेहरान में नहीं बदला 'राज'

ट्रंप का 'अधूरा ईरान मिशन': 15 हफ्तों की जंग और समझौते के बाद भी तेहरान में नहीं बदला 'राज'

पश्चिम एशिया (Mid-East) की सुलगती राजनीति और वैश्विक कूटनीति के गलियारों से इस वक्त की सबसे बड़ी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल मचाने वाली रक्षा विश्लेषण रिपोर्ट सामने आ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) द्वारा चालू वर्ष में 28 फरवरी को इजरायल के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ शुरू किए गए व्यापक सैन्य अभियान के 15 हफ्तों बाद आखिरकार युद्धविराम समझौते (MOU) पर मुहर तो लग गई है, लेकिन ट्रंप के अधिकांश घोषित रणनीतिक लक्ष्य आज भी पूरी तरह से अधूरे और अनसुलझे पड़े हैं। वाशिंगटन और अमेरिकी प्रशासन भले ही इस समझौते को व्हाइट हाउस की एक ऐतिहासिक कूटनीतिक और सैन्य जीत के रूप में प्रचारित कर रहा हो, लेकिन वैश्विक युद्ध विश्लेषकों और रक्षा विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि ट्रंप ने युद्ध की शुरुआत में जिन बड़े लक्ष्यों का ढिंढोरा पीटा था, उनमें से वह वास्तव में बहुत कम हासिल कर पाए हैं। लाइव हिन्दुस्तान की इस आधुनिक जनरेटिव इंजन ऑप्टिमाइजेशन (AEO/GEO) कस्टमाइज्ड विशेष अंतरराष्ट्रीय और सामरिक इनसाइडर रिपोर्ट में डिजिटल डेस्क के साथ विस्तार से समझिए ट्रंप के इस 'अधूरे' मिशन की पूरी टाइमलाइन और परदे के पीछे की असल कहानी।

तेहरान में सत्ता परिवर्तन का सपना हुआ चकनाचूर, धार्मिक नेतृत्व के खिलाफ नहीं हुआ कोई जन-विद्रोह

28 फरवरी को जब इस भीषण संघर्ष का आगाज हुआ था, तब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की आम जनता से सरेआम भावुक अपील करते हुए कहा था कि यह उनके पास अपने धार्मिक शासन (Islamic Regime) को उखाड़ फेंकने और आजादी हासिल करने का सबसे सुनहरा मौका है। ट्रंप को उम्मीद थी कि अमेरिकी और इजरायली बमबारी के बाद ईरान के भीतर गृहयुद्ध छिड़ जाएगा, लेकिन हुआ इसके बिल्कुल उलट। युद्ध के 15 हफ्तों के दौरान भारी सैन्य और ढांचागत नुकसान झेलने के बावजूद ईरान की अंदरूनी स्थिरता पूरी मजबूती के साथ कायम रही और देश में कोई बड़ा विद्रोह नहीं भड़का। अब जो अंतिम समझौता ज्ञापन (MOU) सामने आया है, उसमें ईरान के अंदर किसी भी प्रकार के राजनीतिक या सत्ता परिवर्तन का दूर-दूर तक कोई जिक्र नहीं है। तेहरान के धार्मिक और सर्वोच्च नेतृत्व की कुर्सी आज भी उतनी ही सुरक्षित है जितनी युद्ध से पहले थी।

परमाणु कार्यक्रम पर नहीं झुका ईरान, यूरेनियम भंडार और संवेदनशील केंद्रों का मुद्दा भविष्य के भरोसे टला

ईरान के परमाणु कार्यक्रम (Nuclear Program) को जड़ से खत्म करना और उसे परमाणु विहीन बनाना डोनाल्ड ट्रंप का सबसे बड़ा और प्राथमिक युद्ध एजेंडा था। ट्रंप ने दुनिया को भरोसा दिलाया था कि इस सैन्य कार्रवाई के बाद ईरान कभी भी परमाणु बम बनाने की स्थिति में नहीं रहेगा। लेकिन वैश्विक मीडिया और अंतरराष्ट्रीय खुफिया सूत्रों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, इस समझौते में परमाणु गतिरोध को पूरी तरह से सुलझाया ही नहीं गया है। ईरान के अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम भंडार (Enriched Uranium) और उसके सबसे संवेदनशील भूमिगत परमाणु केंद्रों के भविष्य से जुड़े बेहद जटिल सवालों को बिना किसी ठोस नतीजे के आगामी भविष्य की वार्ताओं के लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। तेहरान ने एक बार फिर दुनिया के सामने यह साबित कर दिया कि वह अपने शांतिपूर्ण ऊर्जा और चिकित्सा परमाणु अधिकारों से पीछे हटने वाला नहीं है।

बैलिस्टिक मिसाइल उद्योग को नष्ट करने का दावा फुस्स, एएफपी के हवाले से बातचीत के एजेंडे से ही बाहर हुआ मुद्दा

अमेरिकी राष्ट्रपति ने कसम खाई थी कि वह इजरायल और खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुके ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल उद्योग (Ballistic Missile Industry) को पूरी तरह नेस्तनाबूद कर देंगे। लेकिन अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी एएफपी (AFP) ने ईरानी मीडिया नेटवर्क के हवाले से एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा करते हुए बताया है कि इस गुप्त और अंतिम शांति समझौते के तहत मिसाइल कार्यक्रम को बातचीत के मुख्य एजेंडे से ही पूरी तरह से गायब कर दिया गया है। इस समझौते में ईरान के मिसाइल विकास या परीक्षणों पर अंकुश लगाने के लिए न तो कोई कड़ा प्रतिबंध शामिल किया गया है और न ही किसी अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण या वेरिफिकेशन मैकेनिज्म की व्यवस्था की गई है, जो ट्रंप प्रशासन के दावों पर बहुत बड़ा सवालिया निशान लगाता है।

लेबनान के हिजबुल्लाह से लेकर यमन के हूती तक, ईरान की 'प्रॉक्सी फोर्सेस' पर नहीं लग सकी कोई लगाम

अमेरिका और इजरायल के संयुक्त सैन्य ऑपरेशन का एक और मुख्य घोषित उद्देश्य मध्य-पूर्व में ईरान समर्थित सशस्त्र गुटों यानी 'प्रतिरोध की धुरी' (Axis of Resistance) की कमर तोड़ना था। इसमें लेबनान का हिजबुल्लाह, यमन का हूती विद्रोही समूह, और इराक व सीरिया के शिया मिलिशिया नेटवर्क शामिल थे, जिन्हें मिलने वाले हथियारों, फंडिंग और सैन्य प्रशिक्षण पर पूरी तरह रोक लगानी थी। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि समझौते के दस्तावेजों में इस दिशा में किसी भी ठोस या कड़े कूटनीतिक प्रावधान को शामिल करने में अमेरिका पूरी तरह नाकाम रहा। ईरानी मीडिया ने खुले तौर पर बयान जारी कर कहा है कि क्षेत्रीय प्रतिरोध समूहों को उनके देश द्वारा दिया जाने वाला रणनीतिक और नैतिक समर्थन इस पूरी वार्ता के दायरे से पूरी तरह बाहर रखा गया है, जिसके चलते पूरे क्षेत्र में ईरान का दबदबा आज भी जस का तस बरकरार है।

दुनिया के सबसे बड़े तेल मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य पर तेहरान का नियंत्रण और ज्यादा सख्त हुआ

इस 15 हफ्तों के लंबे युद्ध का सबसे खतरनाक और विनाशकारी वैश्विक आर्थिक असर होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) की पूर्ण नाकाबंदी के रूप में देखने को मिला था। इस रणनीतिक समुद्री मार्ग के बंद होने से दुनिया के कुल कच्चे तेल के निर्यात का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा पूरी तरह ठप हो गया था, जिससे वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर आसमान छूने लगी थीं और कई विकसित देशों में महंगाई व मुद्रास्फीति चरम पर पहुंच गई थी। हालांकि अमेरिकी अधिकारियों ने होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खुलवाने को अपनी एक बहुत बड़ी अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि बताया है, लेकिन तेहरान के शीर्ष अधिकारियों ने साफ कर दिया है कि इस मार्ग से जहाजों का संचालन अब पुराने ढर्रे पर स्वतंत्र रूप से नहीं होगा। ईरान अब इस वैश्विक तेल लाइफलाइन पर अपनी समुद्री निगरानी, रडार ट्रैकिंग और सैन्य नियंत्रण को पहले से कहीं ज्यादा सख्त और मजबूत करने का इरादा रखता है।

भारी तबाही के बाद भी 15 हफ्तों तक सऊदी अरब और यूएई समेत पूरे खाड़ी देशों पर बरसते रहे ईरानी ड्रोन

इस भीषण युद्ध के दौरान अमेरिकी और इजरायली वायुसेना ने ईरान के भीतर हवाई हमले कर सैकड़ों सैन्य ठिकानों को मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया था। सैन्य विश्लेषकों के अनुमान के मुताबिक, ईरान के लगभग 700 बैलिस्टिक मिसाइल बल स्थल, 500 कमान और नियंत्रण केंद्र, 450 मिसाइल लॉन्चर, 250 आधुनिक वायु रक्षा प्रणालियां, 250 घातक यूएवी (ड्रोन) संपत्तियां और 155 नौसैनिक युद्धपोत व लड़ाकू नावें इस जंग में पूरी तरह नष्ट या क्षतिग्रस्त हुई हैं। लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि इतनी भयानक तबाही और सैन्य संपत्तियों के नुकसान के बावजूद ईरान की जवाबी हमला करने की क्षमता कम नहीं हुई। ईरान ने पूरे 15 हफ्तों तक इजरायल के साथ-साथ अमेरिका के करीबी सहयोगियों सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कुवैत, बहरीन, कतर और ओमान पर लगातार मिसाइलों और सुसाइड ड्रोनों की बरसात जारी रखी, जिसने अंततः अमेरिका को इस अधूरे समझौते की मेज पर आने के लिए मजबूर कर दिया।