'आतंकियों को पनाह कौन दे रहा, जनरलों पर कब होगी कार्रवाई?' पाकिस्तान की टेरर पॉलिसी पर भड़के ANP चीफ ऐमल वली खान
पाकिस्तान का उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत खैबर पख्तूनख्वा (KPK) इस वक्त बारूद के ढेर पर बैठा हुआ है और इसी बीच देश की सुरक्षा नीति और आतंकवाद के खिलाफ चल रहे तथाकथित अभियानों पर बड़ा आंतरिक विस्फोट हुआ है। अवामी नेशनल पार्टी (ANP) के केंद्रीय अध्यक्ष और प्रमुख पश्तून नेता सीनेटर ऐमल वली खान ने पाकिस्तानी सेना के शीर्ष जनरलों और संघीय सरकार की दोहरी टेरर पॉलिसी पर खुलकर हमला बोला है। ऐमल वली खान ने इस्लामाबाद और रावलपिंडी के सैन्य मुख्यालय की नीयत पर सवाल उठाते हुए दो टूक पूछा है कि आखिर दशकों से इन आतंकियों को पाल-पोसकर सीमावर्ती इलाकों में किसने बसाया और उन जनरलों पर देशद्रोह या जवाबदेही की कार्रवाई कब होगी जिन्होंने अपनी रणनीतिक गहराई (स्ट्रेटेजिक डेप्थ) के नाम पर मुल्क को आग की भट्टी में झोंक दिया। खैबर पख्तूनख्वा में चुनी हुई सरकार को निलंबित कर लगाए जा रहे गवर्नर राज और इमरजेंसी को उन्होंने एक सोचा-समझा सियासी ड्रामा करार दिया है।
नवाज, शहबाज और राणा सनाउल्लाह का नाम लेकर दागे सवाल, आतंकवाद को बताया कारोबार
ऐमल वली खान का यह ताजा हमला किसी गोलमोल भाषा में नहीं, बल्कि सत्ताधारी पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) के शीर्ष नेतृत्व का नाम लेकर सामने आया है। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ, वर्तमान प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और पूर्व गृह मंत्री राणा सनाउल्लाह पर तीखे प्रहार करते हुए आरोप लगाया कि ये सभी नेता समय-समय पर आतंकी संगठनों को प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन देते रहे हैं या फिर उनके साथ राजनीतिक समझौते करते रहे हैं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि अगर आतंकवाद और बिगड़ती कानून-व्यवस्था किसी एक प्रांत की चुनी हुई सरकार को बर्खास्त करने का पैमाना बन सकती है, तो फिर यही पैमाना केंद्र की हुकूमत और पूरी शासन प्रणाली पर भी लागू होना चाहिए। एएनपी प्रमुख ने आरोप लगाया कि पाकिस्तान में आतंकवाद अब केवल सुरक्षा समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह हुक्मरानों और सैन्य जनरलों के लिए खरबों रुपये के बजट, अंतरराष्ट्रीय इमदाद और पश्चिमी मुल्कों से डॉलर ऐंठने का एक संगठित कारोबार बन चुका है।
इमरजेंसी और गवर्नर राज सिर्फ बहाना, 18वें संशोधन और NFC अवॉर्ड पर है केंद्र की नजर
खैबर पख्तूनख्वा में आतंकवाद से निपटने के नाम पर केंद्र सरकार द्वारा इमरजेंसी लगाने और गवर्नर राज थोपने की कवायद को ऐमल वली खान ने पूरी तरह खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि आतंकवाद का खात्मा इस कदम का असली मकसद कभी था ही नहीं, बल्कि यह प्रांतीय स्वायत्तता पर डाका डालने की एक बहुत बड़ी साजिश का हिस्सा है। खान ने आगाह किया कि 2010 में संसद द्वारा पारित ऐतिहासिक 18वें संवैधानिक संशोधन को कमजोर करने के लिए यह माहौल तैयार किया जा रहा है। 18वें संशोधन ने पाकिस्तान के छोटे प्रांतों को अपने प्राकृतिक संसाधनों, शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था पर स्वशासन का अधिकार दिया था। इसके साथ ही उन्होंने नेशनल फाइनेंस कमीशन (NFC) अवॉर्ड का मुद्दा उठाते हुए कहा कि केंद्र सरकार प्रांतों के वित्तीय हिस्से को हड़पना चाहती है और इमरजेंसी की आड़ में पूरे खैबर पख्तूनख्वा के प्रशासनिक ढांचे को तोड़कर नए कठपुतली यूनिट बनाने की तैयारी चल रही है।
'40 हजार आतंकियों को किसने दोबारा बसाया?' इमरान खान की पीटीआई पर भी बरसे
ऐमल वली खान का गुस्सा केवल शहबाज शरीफ और फौजी अफसरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) को भी कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने याद दिलाया कि पीटीआई के पिछले कार्यकाल के दौरान अफगानिस्तान से करीब 40 हजार खतरनाक आतंकवादियों को खैबर पख्तूनख्वा के कबायली इलाकों में वापस लाकर बसाने की इजाजत दी गई थी। खान ने कहा कि आज जब वही आतंकी स्थानीय जनता के लिए मौत का पैगाम बन चुके हैं और रोजाना पुलिसकर्मियों व नागरिकों को निशाना बना रहे हैं, तो सेना और पीटीआई दोनों एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अवामी नेशनल पार्टी ने आतंकवाद के खिलाफ सबसे ज्यादा शहादतें दी हैं, उनके सैकड़ों नेता और कार्यकर्ता आत्मघाती हमलों में मारे गए, लेकिन जिन्होंने इन आतंकियों को पनाह दी, आज वे महफूज बंगलों में बैठकर नए नियम बना रहे हैं।
पश्तून जनता का सब्र टूटा: गृहयुद्ध और अलगाववाद की ओर बढ़ता सीमावर्ती इलाका
उत्तर-पश्चिमी सीमा पर पश्तून समुदाय के भीतर बढ़ता आक्रोश अब किसी से छिपा नहीं है। बलूचिस्तान के बाद अब खैबर पख्तूनख्वा में भी सेना की नीतियों के खिलाफ आम नागरिक सड़कों पर उतरने लगे हैं। ऐमल वली खान ने स्पष्ट किया कि जब तक पाकिस्तानी फौज अपनी 'अच्छे तालिबान और बुरे तालिबान' की विनाशकारी नीति को हमेशा के लिए त्याग नहीं देती, तब तक कोई भी सैन्य ऑपरेशन कामयाब नहीं हो सकता। स्थानीय पुलिस को आधुनिक हथियारों से महरूम रखा गया है जबकि सेना बड़े-बड़े बजट लेकर सीमावर्ती इलाकों में तैनात है, फिर भी आतंकी खुलेआम समानांतर सरकार चला रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यदि जनरलों की जवाबदेही तय किए बिना केवल राजनीतिक स्वार्थ के लिए प्रांतों पर असंवैधानिक फैसले थोपे जाते रहे, तो पाकिस्तान की अखंडता को सबसे बड़ा झटका इसी पश्तून बेल्ट से लगेगा, जहां का आवाम अब इस्लामाबाद के हुक्मरानों को शक की नजर से देख रहा है।