सऊदी, अमेरिका और इजरायल के लगातार हमलों के बाद भी क्यों नहीं टूटे हूती? जानिए उनकी असली ताकत और रणनीतिक चक्रव्यूह
पश्चिम एशिया (Middle East) के युद्धक्षेत्र में आधुनिक सैन्य इतिहास का सबसे बड़ा विरोधाभास देखने को मिल रहा है। एक तरफ दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका, आधुनिक तकनीक से लैस इजरायल और अरब जगत की सबसे अमीर सेनाओं में शुमार सऊदी अरब का गठबंधन है; तो दूसरी तरफ चप्पल पहनकर लड़ने वाले यमन के शिया विद्रोही 'हूती' (अंसारुल्लाह)। पिछले एक दशक से सऊदी अरब के 'ऑपरेशन डिसीसिव स्टॉर्म' से लेकर हाल के महीनों में अमेरिकी-ब्रिटिश नौसेना के 'ऑपरेशन प्रॉस्पेरिटी गार्जियन' और इजरायली वायुसेना के भीषण हवाई हमलों के बावजूद हूतियों का हौसला नहीं टूटा है। वे न सिर्फ लाल सागर (Red Sea) के अंतरराष्ट्रीय शिपिंग लेन को बाधित किए हुए हैं, बल्कि तेल अवीव और खाड़ी के ठिकानों तक बैलिस्टिक मिसाइलें और आत्मघाती ड्रोन दागने में सक्षम हैं। यह सवाल पूरी दुनिया के सुरक्षा विश्लेषकों को हैरान कर रहा है कि लगातार हमलों के बावजूद हूती झुकने को तैयार क्यों नहीं हैं और उन्हें यह अटूट ताकत कहां से मिल रही है?
1. ईरान की 'एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस' और आधुनिक हथियारों की स्मगलिंग
हूतियों की अजेय दिखती सैन्य ताकत का सबसे बड़ा और प्राथमिक स्रोत ईरान है। ईरान ने हूतियों को अपने 'एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस' (प्रतिरोध की धुरी) का सबसे मजबूत समुद्री मोहरा बना रखा है।
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हाई-टेक हथियारों की आपूर्ति: पश्चिमी और यूएन (UN) रिपोर्टों के अनुसार, ईरान की कुद्स फोर्स (IRGC) गुप्त जहाजों, पारंपरिक नावों (Dhows) और ओमान व लाल सागर के गुप्त रास्तों से हूतियों तक मिसाइल कंपोनेंट्स और ड्रोन पार्ट्स पहुंचाती है।
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तकनीकी रिवर्स-इंजीनियरिंग: ईरान से केवल तैयार हथियार नहीं आते, बल्कि हूती इंजीनियरों को तेहरान और लेबनानी हिजबुल्लाह द्वारा ऐसी ट्रेनिंग दी गई है कि वे पुराने सोवियत संघ और यमनी सेना के रॉकेट्स को मॉडिफाई करके आधुनिक गाइडेड मिसाइल और 'सम्माद' व 'कासिफ' जैसे लो-कॉस्ट आत्मघाती ड्रोन खुद असेंबल कर लेते हैं।
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लागत का बड़ा अंतर: अमेरिका और इजरायल हूतियों के जिस एक सस्ते ड्रोन (लागत करीब 2 से 10 लाख रुपये) को मार गिराने के लिए मिसाइल दागते हैं, उस एक इंटरसेप्टर (जैसे SM-2 या पैट्रियट) की कीमत 15 से 30 करोड़ रुपये होती है। यह आर्थिक गणित हूतियों के पक्ष में काम करता है।
2. यमन का दुर्गम भूगोल: भूमिगत सुरंगे और पहाड़ों का अभेद्य किला
हूतियों की जीवित रहने की क्षमता का दूसरा सबसे बड़ा राज यमन का भौगोलिक ढांचा है। उत्तरी यमन का इलाका बेहद शुष्क, संकरा और ऊंचे-ऊंचे पत्थरीले पहाड़ों से घिरा हुआ है।
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हूतियों ने सादा और सना के पहाड़ी इलाकों में सैकड़ों किलोमीटर लंबी गहरी भूमिगत सुरंगें (Underground Bunkers) और गुफाएं बना रखी हैं।
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वे अपने मिसाइल लॉन्चर्स और ड्रोन वर्कशॉप्स को इन पहाड़ों की गहराइयों में छुपाकर रखते हैं।
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जब विदेशी लड़ाकू विमान हमला करने आते हैं, तो हूतियों के लड़ाके इन सुरक्षित बंकरों में चले जाते हैं। विमानों के जाते ही वे मोबाइल ट्रकों से मिसाइल दागकर चंद मिनटों में दोबारा पहाड़ों में ओझल हो जाते हैं। अमेरिका या सऊदी अरब के पास ग्राउंड ट्रूप्स (जमीन पर सेना) उतारने का विकल्प नहीं है, और केवल हवाई हमलों से पहाड़ों के सीने में छिपे छापामारों को खत्म नहीं किया जा सकता।
3. यमनी सेना के शस्त्रागार पर कब्जा और 20 साल का युद्ध अनुभव
हूती कोई कल पैदा हुआ उग्रवादी संगठन नहीं हैं। उन्होंने 2004 से 2010 के बीच यमन की तत्कालीन सरकार से 6 बड़े युद्ध लड़े।
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साल 2014-15 में जब हूतियों ने राजधानी सना पर कब्जा किया, तो यमन के पूर्व राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह की वफादार नियमित सेना के ब्रिगेड और उनका पूरा सरकारी शस्त्रागार हूतियों के हाथ लग गया।
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सेना के हजारों मिसाइल ऑपरेटर, रडार टेक्नीशियन और प्रशिक्षित कमांडो हूती विद्रोहियों के साथ मिल गए।
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इससे उन्हें न केवल भारी तोपखाना, टैंक और स्कड मिसाइलें मिलीं, बल्कि एक पेशेवर सेना का तकनीकी दिमाग भी मिल गया, जिसे उन्होंने ईरानी मदद से और आधुनिक बना लिया।
4. खोने के लिए कुछ नहीं: 'शहादत' की विचारधारा और आंतरिक अर्थव्यवस्था
आमतौर पर किसी देश या सत्ता पर जब बमबारी होती है, तो वहां की अर्थव्यवस्था, फैक्ट्रियां और पुल तबाह होते हैं, जिससे सरकार झुक जाती है। लेकिन यमन पिछले एक दशक से दुनिया के सबसे भीषण मानवीय संकट और गरीबी से जूझ रहा है।
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बुनियादी ढांचे का अभाव: हूतियों के पास ऐसा कोई आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर ही नहीं बचा है जिसके बर्बाद होने का उन्हें डर हो। उनके पास 'खोने के लिए कुछ नहीं' वाली स्थिति है।
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कट्टर धार्मिक विचार और भर्ती: हूती आंदोलन की जड़ें जैदी शिया संप्रदाय के धार्मिक गौरव और पश्चिमी-इजरायली विरोध पर टिकी हैं। जब भी उन पर विदेशी बम गिरते हैं, तो वे इसे जनता के सामने 'विदेशी आक्रमण' के रूप में पेश करते हैं, जिससे स्थानीय जनजातियों से उन्हें हजारों नए लड़ाकों की भर्ती आसानी से मिल जाती है।
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टैक्स और बंदरगाहों से कमाई: हूती अपने नियंत्रण वाले इलाकों में टेलीकॉम, तेल आयात, स्थानीय व्यापारियों पर भारी टैक्स और हुदैदा व मोचा जैसे बंदरगाहों से अवैध वसूली के जरिए अपनी समानांतर अर्थव्यवस्था चलाते हैं, जिससे उनके लड़ाकों को लगातार पैसा और राशन मिलता रहता है।
5. कूटनीतिक कवच: सऊदी की मजबूरी और वैश्विक दबाव
हूतियों के न टूटने के पीछे एक बड़ा कारण भू-राजनीतिक मजबूरी भी है। सऊदी अरब अब इस जंग से बाहर निकलना चाहता है क्योंकि वह अपने 'विजन 2030' के तहत देश को पर्यटन और बिजनेस हब बनाना चाहता है। अगर सऊदी अरब हूतियों पर दोबारा बड़ा जमीनी हमला करता है, तो हूती उसकी तेल रिफाइनरियों और हवाई अड्डों पर मिसाइलें बरसा सकते हैं, जिससे सऊदी की पूरी अर्थव्यवस्था खतरे में पड़ जाएगी। इसी डर से सऊदी अरब हूतियों के खिलाफ सीधे युद्ध में दोबारा उतरने से बच रहा है।
वहीं, अमेरिका और पश्चिमी देश भी जानते हैं कि यमन में जमीनी सेना उतारने का मतलब एक और 'वियतनाम' या 'अफगानिस्तान' जैसे अंतहीन दलदल में फंसना होगा। यही वजह है कि पश्चिमी हमले केवल रणनीतिक ठिकानों पर सीमित बमबारी तक रुक जाते हैं, और इसी झिझक का फायदा उठाकर हूती विद्रोही लाल सागर में आज भी सीना ताने खड़े हैं।