अडानी ग्रुप का यूरोप में सबसे बड़ा दांव: 3 बिलियन यूरो में इस इंटरनेशनल कंपनी को खरीदने का बाइंडिंग ऑफर
भारतीय उद्योगपति गौतम अडानी का कारोबारी साम्राज्य अब भारत के समुद्री तटों से आगे निकलकर पश्चिमी देशों के ऊर्जा और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क में गहरी पैठ बनाने की तैयारी में है। समूह की प्रमुख कंपनी अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन (APSEZ) ने यूरोप की जानी-मानी लिक्विड स्टोरेज और टर्मिनल ऑपरेटर कंपनी 'इवोस टर्मिनल्स' (Evos Terminals) के अधिग्रहण के लिए लगभग 3 बिलियन यूरो (करीब 3.3 बिलियन अमेरिकी डॉलर यानी 27,000 करोड़ रुपये से अधिक) का बाइंडिंग ऑफर सौंपा है।
यह प्रस्तावित सौदा अडानी ग्रुप के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए जाने वाले सबसे बड़े अधिग्रहणों में से एक माना जा रहा है। यूके के सबसे बड़े पोर्ट ऑपरेटर 'असोसिएटेड ब्रिटिश पोर्ट्स' (ABP) की रेस में पिछड़ने के बाद अडानी समूह ने यूरोपीय महाद्वीप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए यह नया और बेहद आक्रामक रणनीतिक कदम उठाया है।
क्या करती है 'इवोस टर्मिनल्स' और क्यों अडानी की नजर इस पर टिकी?
इवोस टर्मिनल्स यूरोप का एक प्रमुख इंडिपेंडेंट लिक्विड स्टोरेज और टर्मिनल नेटवर्क है, जिसके रणनीतिक टर्मिनल नीदरलैंड्स (एम्सटर्डम, रॉटरडैम), बेल्जियम (घेंट) और जर्मनी (हैम्बर्ग) जैसे वैश्विक व्यापार के सबसे व्यस्त समुद्री केंद्रों पर स्थित हैं।
यह कंपनी पारंपरिक पेट्रोलियम उत्पादों जैसे गैसोलीन और डीजल के अलावा अत्याधुनिक क्लीन एनर्जी और ग्रीन फ्यूल के भंडारण में अग्रणी भूमिका निभाती है। इसमें बायो-डीजल, सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF), ग्रीन नेफ्था, बायो-इथेनॉल, ई-मेथनॉल और पर्यावरण के अनुकूल मरीन फ्यूल्स शामिल हैं।
अडानी पोर्ट्स के लिए इवोस टर्मिनल्स केवल एक पोर्ट या वेयरहाउसिंग बिजनेस नहीं है, बल्कि यह भविष्य के ग्रीन एनर्जी लॉजिस्टिक्स और ट्रांजिशन फ्यूल्स के वैश्विक व्यापार में सीधे प्रवेश करने की सुनहरी चाबी है। अडानी ग्रुप खुद भारत में ग्रीन हाइड्रोजन और रिन्यूएबल एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी निवेश कर रहा है, ऐसे में यूरोप में स्थापित लिक्विड स्टोरेज क्षमता हासिल करना समूह के समग्र ऊर्जा विजन के साथ सटीक मेल खाता है।
'अंबिशन 2031' और अडानी पोर्ट्स की अंतरराष्ट्रीय रणनीति
अडानी पोर्ट्स ने हाल ही में अपने दीर्घकालिक विजन 'अंबिशन 2031' का खाका साझा किया था, जिसके तहत कंपनी दुनिया के शीर्ष वैश्विक पोर्ट और लॉजिस्टिक्स ऑपरेटरों में शुमार होना चाहती है। वित्त वर्ष 2027 के लिए कंपनी ने अपने पूंजीगत व्यय (Capex) अनुमान को ₹12,000-14,000 करोड़ से बढ़ाकर ₹15,000-17,000 करोड़ रुपये कर दिया है।
कंपनी के प्रबंधन ने साफ किया है कि वे एशिया, मध्य पूर्व और यूरोप में लगभग 20 रणनीतिक संपत्तियों (पोर्ट्स और टर्मिनल्स) का सक्रिय मूल्यांकन कर रहे हैं। ओमान के सलालाह पोर्ट से लेकर श्रीलंका के कोलंबो पोर्ट और इजरायल के हाइफा पोर्ट तक, अडानी पोर्ट्स ने हिंद महासागर और भूमध्य सागर के व्यापारिक गलियारों पर मजबूत पकड़ बना ली है। अब यूरोप के औद्योगिक केंद्र में 3 बिलियन यूरो का यह दांव अडानी समूह को पारंपरिक कंटेनर हैंडलिंग से आगे ले जाकर लिक्विड और एनर्जी टर्मिनल सेगमेंट का एक बड़ा वैश्विक खिलाड़ी बना देगा।
वित्तीय स्थिति और कर्ज को लेकर क्या है कंपनी का रुख?
इतने बड़े अंतरराष्ट्रीय अधिग्रहण को लेकर वित्तीय विश्लेषकों की नजर कंपनी की बैलेंस शीट और कर्ज की स्थिति पर भी टिकी हुई है। 30 सितंबर तक के आंकड़ों के अनुसार, अडानी पोर्ट्स के पास लगभग ₹12,502 करोड़ का मजबूत कैश बैलेंस और ₹2,806 करोड़ का फ्री कैश फ्लो उपलब्ध है। कंपनी का नेट डेट-टू-ईबीआईटीडीए (Net Debt-to-EBITDA) अनुपात 1.8 गुना के बेहद सुरक्षित स्तर पर है।
कंपनी प्रबंधन का कहना है कि उनकी बैलेंस शीट इस तरह के बड़े वैश्विक निवेश कार्यक्रम को बिना किसी वित्तीय तनाव के पूरी तरह संभालने में सक्षम है। अडानी पोर्ट्स किसी भी अंतरराष्ट्रीय परिसंपत्ति को खरीदते समय लाभप्रदता, रिटर्न अनुपात, भू-राजनीतिक सुरक्षा और उपयुक्त स्थानीय साझेदारों की मौजूदगी को मुख्य पैमाना बनाता है।
भारतीय कॉरपोरेट जगत और वैश्विक बाजारों पर प्रभाव
यदि यह 3 बिलियन यूरो का सौदा सफलतापूर्वक पूरा हो जाता है, तो यह किसी भी भारतीय इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी द्वारा यूरोप में किए गए सबसे बड़े कैश बायआउट्स में दर्ज होगा। वैश्विक कमोडिटी ट्रेडर्स और लॉजिस्टिक्स दिग्गजों के बीच अडानी का यह कदम भारतीय कॉरपोरेट की बढ़ती ताकत को रेखांकित करता है।
घरेलू शेयर बाजार में हालांकि इस बड़े पूंजीगत सौदे के बाद अल्पकालिक सतर्कता देखी गई, लेकिन लंबी अवधि के संस्थागत निवेशक इसे अडानी पोर्ट्स के रेवेन्यू डाइवर्सिफिकेशन और वैश्विक समुद्री व्यापार में बढ़ती हिस्सेदारी के रूप में देख रहे हैं। आने वाले हफ्तों में इस बाइंडिंग ऑफर पर विक्रेता पक्ष की अंतिम सहमति और नियामक मंजूरियों की प्रक्रिया पर पूरे वैश्विक कारोबारी जगत की नजरें टिकी रहेंगी।