'क्या गुजरात पाकिस्तान या बांग्लादेश में है?' 72वें नेशनल अवॉर्ड विवाद पर फूटा परेश रावल का गुस्सा

'क्या गुजरात पाकिस्तान या बांग्लादेश में है?' 72वें नेशनल अवॉर्ड विवाद पर फूटा परेश रावल का गुस्सा

72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों (National Film Awards) के ऐलान के बाद जहां विजेताओं के खेमे में जश्न का माहौल है, वहीं पुरस्कार चयन प्रक्रिया और क्षेत्रीय सिनेमा के प्रतिनिधित्व को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। भारतीय सिनेमा के वरिष्ठ अभिनेता और पूर्व सांसद परेश रावल ने जूरी और चयन समिति के रवैये पर कड़ा एतराज जताया है। गुजराती सिनेमा की कथित उपेक्षा से बेहद आहत परेश रावल का गुस्सा सोशल मीडिया और मीडिया बयानों के जरिए खुलकर सामने आया है। उन्होंने सीधे तौर पर सवाल दागते हुए पूछा कि क्या गुजरात भारत का हिस्सा नहीं है, क्या यह पाकिस्तान या बांग्लादेश में स्थित है? उनके इस तीखे बयान ने फिल्म उद्योग से लेकर सियासी और सांस्कृतिक गलियारों तक खलबली मचा दी है।

गुजराती सिनेमा की अनदेखी पर बरसे परेश रावल

परेश रावल ने राष्ट्रीय पुरस्कारों की घोषणा के बाद अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि भारतीय सिनेमा में हर भाषा और हर राज्य के उम्दा काम को बराबर सम्मान मिलना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि पिछले कुछ वर्षों में गुजराती सिनेमा ने रचनात्मकता, विषय-वस्तु और तकनीकी दृष्टि से असाधारण प्रगति की है। 'हेल्लारो', 'कच्छ एक्सप्रेस' और कई अन्य लीक से हटकर बनी फिल्मों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना बटोरी है। इसके बावजूद 72वें राष्ट्रीय पुरस्कारों के मुख्य और प्रमुख संवर्गों में गुजराती फिल्मों की गैर-मौजूदगी बेहद निराशाजनक और चिंताजनक है।

'क्या गुजरात पाकिस्तान या बांग्लादेश में है?'— तीखे सवाल से सिस्टम को घेरा

अपने बेबाक अंदाज के लिए मशहूर परेश रावल ने कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि जब राष्ट्रीय पुरस्कारों का चयन होता है, तो ऐसा लगता है कि कुछ खास क्षेत्रीय भाषाओं को ही तवज्जो दी जाती है, जबकि अन्य को दरकिनार कर दिया जाता है। उन्होंने तंज कसते हुए पूछा, "क्या गुजरात भारत के नक्शे पर नहीं दिखता? क्या गुजरात पाकिस्तान या बांग्लादेश में है जो उसकी कला, संस्कृति और बेहतरीन फिल्मों को राष्ट्रीय मंच पर पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया?" अभिनेता का कहना है कि यह केवल फिल्मों का अपमान नहीं है, बल्कि उन सभी कलाकारों, निर्देशकों और तकनीशियनों के पसीने का अपमान है जो सीमित बजट और संसाधनों के बावजूद विश्वस्तरीय कंटेंट बना रहे हैं।

जूरी के मूल्यांकन और चयन प्रक्रिया पर उठाए सवाल

परेश रावल ने सिर्फ गुस्सा ही जाहिर नहीं किया, बल्कि पुरस्कारों के लिए गठित चयन समिति और जूरी पैनल के मूल्यांकन के तरीकों पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कारों में निष्पक्षता पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। अगर जूरी के सदस्य क्षेत्रीय भाषाओं की गहरी समझ नहीं रखते या फिल्मों को पूरी संवेदनशीलता से नहीं देखते, तो ऐसे फैसले ही सामने आते हैं। उन्होंने मांग की कि जूरी में सभी प्रमुख भाषाई सिनेमा के मर्मज्ञों को शामिल किया जाना चाहिए, ताकि किसी भी भाषा की उत्कृष्ट कृति बिना पहचान के पीछे न छूट जाए।

सोशल मीडिया और इंडस्ट्री में छिड़ी जोरदार बहस

परेश रावल के इस तीखे बयान के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बहस तेज हो गई है। गुजराती फिल्म जगत के कई प्रमुख निर्देशकों, अभिनेताओं और सिनेप्रेमियों ने परेश रावल के स्टैंड का पुरजोर समर्थन किया है। लोगों का कहना है कि जहां एक तरफ तमिल, तेलुगु, मलयालम और हिंदी सिनेमा को बड़े स्तर पर पहचान मिल रही है, वहीं गुजराती, मराठी और असमिया जैसी भाषाओं के सशक्त सिनेमा को अकसर मुख्यधारा की चकाचौंध में किनारे कर दिया जाता है। परेश रावल की इस बेबाक टिप्पणी ने अब चयन समिति और केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के नीतिगत ढांचे पर भी चर्चा छेड़ दी है।