'लद्दाख में वो हो रहा जो चीन तिब्बत में भी नहीं करता': सोनम वांगचुक के बयान पर भड़की निर्वासित तिब्बती सरकार
लद्दाख के पर्यावरण और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक द्वारा दिए गए एक बयान ने हिमालयी क्षेत्र की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है। लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने और पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर लंबे समय से आंदोलन कर रहे वांगचुक ने लेह में एक सभा को संबोधित करते हुए लद्दाख की मौजूदा प्रशासनिक स्थिति की तुलना सीधे तौर पर चीनी कब्जे वाले तिब्बत से कर दी। वांगचुक ने दावा किया कि लद्दाख में आज ऐसा दमन हो रहा है, जैसा चीन भी तिब्बत में नहीं करता। इस बयान पर हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में स्थित केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (सीटीए - Central Tibetan Administration), जिसे आम बोलचाल में निर्वासित तिब्बती सरकार कहा जाता है, ने अत्यंत कड़ा एतराज जताया है और इस पूरी तुलना को तथ्यात्मक रूप से गलत, गैर-जिम्मेदाराना और भ्रामक करार दिया है।
सोनम वांगचुक का विवादित बयान: लोकतंत्र के नाम पर उठाए सवाल
लेह में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान जनता को संबोधित करते हुए सोनम वांगचुक ने अपने पुराने आंदोलन और लद्दाख के अधिकारों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जब भारत और चीन के बीच चुनाव की बात आई थी, तो लद्दाख ने स्वेच्छा से भारत के साथ रहना चुना क्योंकि भारत एक मजबूत और जीवंत लोकतंत्र है, जहां लोग स्वाभिमान के साथ सिर उठाकर जी सकते हैं।
वांगचुक ने आरोप लगाते हुए कहा:
"लद्दाख के एक तरफ चीन था और दूसरी तरफ भारत। हमने भारत को इसलिए चुना क्योंकि हमें भरोसा था कि यहां लोकतंत्र है और हम सिर उठाकर जी सकेंगे। लेकिन आज लद्दाख में जिस तरह की ज्यादतियां और दमन हो रहा है, मेरे विचार से वैसा तो चीन भी तिब्बत में नहीं कर रहा है।"
उन्होंने पिछले वर्षों के प्रदर्शनों, पुलिस कार्रवाइयों और केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद स्थानीय प्रतिनिधियों की शक्तियों में कमी का हवाला देते हुए यह तुलना पेश की।
केंद्रीय तिब्बती प्रशासन का तीखा पलटवार: 'यह जमीनी हकीकत से परे'
सोनम वांगचुक के इस बयान के सामने आते ही धर्मशाला स्थित केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (CTA) ने आधिकारिक बयान जारी कर उनकी टिप्पणी की कड़ी निंदा की। सीटीए के आधिकारिक प्रवक्ता तेनजिन लेकशे ने कहा कि वांगचुक का यह बयान न केवल पूरी तरह गलत है, बल्कि यह तिब्बत के भीतर चल रहे वास्तविक और क्रूर दमनकारी हालात को भी नजरअंदाज करता है।
सीटीए की ओर से जारी बयान में स्पष्ट किया गया:
"सोनम वांगचुक द्वारा लद्दाख के हालात की तुलना तिब्बत से किया जाना पूरी तरह अनुचित (misplaced) और गलत (inaccurate) है। यह बयान तिब्बत के अंदर की जमीनी सच्चाई को नहीं दर्शाता। तिब्बत लगातार चीन के निरंकुश और तानाशाही शासन के अधीन है, जहां तिब्बती नागरिकों के मौलिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता का व्यवस्थित तरीके से हनन हो रहा है, और उनकी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को मिटाने के प्रयास चरम पर हैं।"
तिब्बती प्रशासन ने रेखांकित किया कि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (CPC) के शासन में किसी भी तरह के विरोध या लोकतांत्रिक असंतोष की कोई गुंजाइश नहीं है, जबकि भारत एक संवैधानिक लोकतंत्र है जहां नागरिकों को शांतिपूर्ण विरोध और अपनी बात रखने की पूरी आजादी प्राप्त है।
चीन के तिब्बत में दमन का इतिहास और तुलना की खामी
राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों ने भी वांगचुक के इस बयान को गैर-जिम्मेदाराना ठहराया है। दशकों से तिब्बत में चीनी हुकूमत द्वारा बौद्ध मठों पर कड़ी निगरानी रखी जाती है, तिब्बती भाषा और संस्कृति के शिक्षण पर प्रतिबंध लगाए गए हैं, और लाखों बच्चों को तथाकथित औपनिवेशिक बोर्डिंग स्कूलों में जबरन भेजा जा रहा है ताकि उनकी पहचान मिटाई जा सके। दलाई लामा की तस्वीर रखना तक वहां संगीन जुर्म माना जाता है। मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, तिब्बत में किसी भी प्रकार के विरोध की सजा सीधे गायब होना या लंबी जेल होती है। ऐसे में एक लोकतांत्रिक देश में शांतिपूर्ण धरने, अनशन और मीडिया में खुलकर बयान देने की आजादी का उपयोग करते हुए यह कहना कि लद्दाख के हालात तिब्बत से बदतर हैं, पूरी तरह तथ्यों से परे और तिब्बतियों के ऐतिहासिक दर्द का उपहास उड़ाने जैसा है।
लद्दाख आंदोलन और वांगचुक के रुख पर उठते सवाल
सोनम वांगचुक पिछले कई वर्षों से लेह एपेक्स बॉडी (Leh Apex Body) और करगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) के बैनर तले लद्दाख के लिए राज्य का दर्जा और संविधान की छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा उपायों की मांग को लेकर मुखर रहे हैं। हालांकि, चीन और तिब्बत से तुलना करने वाले उनके ताजा बयान ने देश के भीतर और तिब्बती समुदाय के बीच भारी असंतोष पैदा कर दिया है। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने सवाल उठाया है कि सीमांत और रणनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र में बैठकर देश की लोकतांत्रिक छवि को इस तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करना किसी भी नागरिक अधिकार कार्यकर्ता को शोभा नहीं देता। तिब्बती समुदाय से जुड़े प्रतिनिधियों ने भी नाराजगी जताते हुए कहा कि जिस भारत ने परम पावन दलाई लामा और लाखों तिब्बती शरणार्थियों को दशकों तक सम्मान और पनाह दी, उस लोकतांत्रिक व्यवस्था की तुलना चीनी साम्यवादी क्रूरता से करना अत्यंत निंदनीय है।