पितृसत्ता और महिला सुरक्षा पर फूटा कृति सेनन का गुस्सा; कहा- समाज की सोच बदलने का आ गया है वक्त

पितृसत्ता और महिला सुरक्षा पर फूटा कृति सेनन का गुस्सा; कहा- समाज की सोच बदलने का आ गया है वक्त

देश में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों, सुरक्षा के सवाल और समाज द्वारा महिलाओं के पहनावे पर की जाने वाली टिप्पणियों को लेकर बॉलीवुड अभिनेत्री कृति सेनन ने बेहद तीखा और संजीदा रुख अपनाया है। हाल के दिनों में सामने आईं उत्पीड़न की घटनाओं और महिलाओं को ही नसीहत देने वाले सामाजिक रवैये पर कृति सेनन ने अपनी बेबाक राय जाहिर की है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में यह रेखांकित किया कि समाज में चल रहा संघर्ष किसी जेंडर वॉर यानी 'पुरुष बनाम महिला' का नहीं है, बल्कि यह लड़ाई उस सड़ी-गली पितृसत्तात्मक सोच और उन लोगों के खिलाफ है जो आज भी महिलाओं पर नियंत्रण साधने को अपनी संस्कृति का हिस्सा मानते हैं। कृति सेनन का यह बयान सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर तेजी से चर्चा का विषय बन गया है।

'यह लड़ाई पुरुष बनाम महिला नहीं, बल्कि पितृसत्तात्मक सोच के खिलाफ है'

कृति सेनन ने महिलाओं से जुड़े गंभीर विमर्श को केवल दो लिंगों के बीच की नफरत में बदलने के चलन को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने साझा किया कि महिलाओं की वास्तविक लड़ाई केवल पुरुषों से नहीं है, बल्कि उन पुरुष-विरोधी या महिला-विरोधी संकीर्ण सोच वाले व्यक्तियों और खास तौर पर उन 'ब्रेनवॉश की गई महिलाओं' से भी है, जो पितृसत्ता को भारतीय समाज का संस्कार मान बैठी हैं।

उनका मानना है कि जब परिवार और समाज के भीतर की महिलाएं ही पितृसत्तात्मक नियमों को ढाल बनाकर दूसरी महिलाओं या बेटियों पर बंदिशें थोपने लगती हैं, तो समस्या और अधिक विकराल हो जाती है। इसलिए जब तक सोच और कंडीशनिंग पर प्रहार नहीं होगा, तब तक महिलाओं को उनका वाजिब हक और सुरक्षित माहौल नहीं मिल सकता।

महिलाओं को नसीहत देने के बजाय पुरुषों को सिखाएं सहमति और आदर

महिला सुरक्षा के नाम पर समाज में अक्सर यह रवैया देखा जाता है कि बेटियों को ही जल्दी घर आने, संभलकर रहने और सीमित कपड़े पहनने के उपदेश दिए जाने लगते हैं। कृति सेनन ने इस विक्टिम ब्लेमिंग (पीड़िता पर ही दोष मढ़ने) की प्रवृत्ति पर सीधा कड़ा प्रहार किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि अब समाज को महिलाओं को सावधान रहने का एक और लेक्चर देने की जरूरत नहीं है।

बल्कि समाज को ऐसे पुरुष तैयार करने होंगे जिन्हें खुद पर काबू रखने के लिए महिलाओं को नियंत्रित करने की आवश्यकता न पड़े। लड़कों और पुरुषों को बचपन से यह सिखाने का समय आ चुका है कि सहमति (कंसेंट) का क्या मतलब होता है, महिलाओं का सम्मान कैसे किया जाता है और अपने खुद के आचरण व व्यवहार की जवाबदेही कैसे तय की जाती है। जो पुरुष सीखने से इनकार करते हैं, उनके गलत व्यवहार के लिए महिलाओं को जिम्मेदार ठहराना तुरंत बंद होना चाहिए।

अपराधों की अनदेखी और महिलाओं के कपड़ों पर दोहरे मापदंड पर नाराजगी

कृति सेनन ने समाज की प्राथमिकताओं और चयनात्मक गुस्से (सेलेक्टिव आउटरेज) पर भी गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने इस विडंबना को उजागर किया कि हमारे समाज में दुष्कर्म, घरेलू हिंसा और दहेज से जुड़ी मौतों पर उतना आक्रोश और उबाल नहीं दिखता, जितना किसी महिला अभिनेत्री के किसी विज्ञापन या सार्वजनिक जीवन में अपनी पसंद के कपड़े पहनने पर मच जाता है।

उन्होंने इस बात पर अफसोस जताया कि जब किसी नाबालिग या बच्ची के साथ कोई जघन्य अपराध होता है, तो लोग अपराधी के अमानवीय कृत्य पर सवाल उठाने के बजाय यह पूछने लगते हैं कि पीड़िता ने क्या पहना था, वह कहां थी या बाहर क्यों गई थी। यह मानसिकता दर्शाती है कि समाज आज भी समस्या की असली जड़ पर बात करने से बचता है।

सोच में आमूलचूल बदलाव और बुनियादी संस्कारों की जरूरत

कृति सेनन के इस कड़े रुख ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक समाज में महिलाओं की सुरक्षा का रास्ता बंदिशों से होकर नहीं गुजरता। जब तक परिवारों में बेटों को मर्यादा और सहमति का पाठ नहीं पढ़ाया जाएगा और महिलाओं को समाज के हर क्षेत्र में बराबरी का इंसान नहीं समझा जाएगा, तब तक ऐसे खोखले उपदेश बेअसर साबित होते रहेंगे। उनका यह बयान आज के दौर में पितृसत्ता और महिला अधिकारों को लेकर चल रही बहसों को एक नई और परिपक्व दिशा देने वाला माना जा रहा है।