अस्पताल में इलाज या जान का जोखिम? खतरनाक बैक्टीरिया से 30 दिन में 77% मरीजों की मौत, नई स्टडी में खुलासा

अस्पताल में इलाज या जान का जोखिम? खतरनाक बैक्टीरिया से 30 दिन में 77% मरीजों की मौत, नई स्टडी में खुलासा

अस्पताल वह जगह मानी जाती है जहां गंभीर से गंभीर बीमारी से जूझ रहा व्यक्ति स्वस्थ होने और नई जिंदगी की उम्मीद लेकर पहुंचता है। लेकिन हाल ही में सामने आई एक चौंकाने वाली वैज्ञानिक रिसर्च ने देश की स्वास्थ्य व्यवस्था और अस्पतालों के भीतर सुरक्षा मानकों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार, अस्पतालों की लापरवाही और साफ-सफाई में मामूली चूक के चलते मरीज ऐसे खतरनाक संक्रमण (Hospital-Acquired Infection) की चपेट में आ रहे हैं, जिस पर जीवनरक्षक एंटीबायोटिक दवाएं भी असर नहीं कर पा रही हैं।

कर्नाटक के एक निजी अस्पताल में भर्ती वयस्क मरीजों पर की गई इस लंबी स्टडी में पाया गया कि खतरनाक बैक्टीरिया की चपेट में आने वाले 76.6 प्रतिशत यानी लगभग 77 फीसदी मरीजों की मौत संक्रमण की पुष्टि होने के महज 30 दिनों के भीतर हो गई। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इसे बेहद गंभीर और चिंताजनक स्थिति करार दिया है, क्योंकि अस्पताल के भीतर मिलने वाला यह संक्रमण मरीज के शरीर को भीतर से खोखला कर रहा है।

क्या है 'एसिनेटोबैक्टर बाउमानी' सुपरबग और यह क्यों बना काल?

इस पूरे शोध के केंद्र में एक बेहद कुख्यात बैक्टीरिया है, जिसे मेडिकल साइंस में 'एसिनेटोबैक्टर बाउमानी' (Acinetobacter baumannii) कहा जाता है। यह बैक्टीरिया मुख्य रूप से अस्पतालों के आईसीयू (ICU), वेंटिलेटर, सर्जिकल वार्ड और आपातकालीन कमरों के नम वातावरण में पनपता है।

जुलाई 2021 से दिसंबर 2023 के बीच किए गए इस अध्ययन के दौरान 154 मरीजों के रक्त नमूनों में एसिनेटोबैक्टर बाउमानी बैक्टीरिया की मौजूदगी की पुष्टि हुई थी। यह साधारण बैक्टीरिया नहीं है, बल्कि यह एक 'मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट सुपरबग' के रूप में विकसित हो चुका है। इसका सीधा अर्थ यह है कि जिन शक्तिशाली एंटीबायोटिक दवाओं के जरिए आम तौर पर बैक्टीरिया का खात्मा किया जाता है, वे दवाएं इस पर बेअसर साबित हुईं। दवा का असर न होने के कारण संक्रमण तेजी से पूरे शरीर में फैल गया और मरीजों की हालत सुधरने के बजाय लगातार बिगड़ती चली गई।

30 दिनों में 118 मौतें: शुरुआती 7 दिन साबित हुए सबसे ज्यादा घातक

इस अध्ययन के जो आंकड़े सामने आए हैं, वे रौंगटे खड़े कर देने वाले हैं। खून में संक्रमण की पुष्टि वाले कुल 154 मरीजों में से 118 मरीजों ने 30 दिनों के भीतर अपनी जान गंवा दी।

इससे भी ज्यादा डरावनी बात यह रही कि संक्रमण का पता चलने के शुरुआती 7 दिनों के अंदर ही 57.1 फीसदी मरीजों की मौत दर्ज की गई। यह इस बात का सीधा प्रमाण है कि बैक्टीरिया कितनी आक्रामकता से कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली (Immune System) वाले मरीजों पर हमला करता है। अधिकांश मरीज पहले से ही किसी अन्य गंभीर बीमारी या सर्जरी के चलते अस्पताल में भर्ती थे, और इस बैक्टीरियल अटैक ने उनके अंगों को पूरी तरह विफल (Multi-Organ Failure) कर दिया।

फेफड़ों का संक्रमण और कैथेटर की गंदगी बनी मुख्य जरिया

शोधकर्ताओं ने जब यह पड़ताल की कि आखिर यह जानलेवा बैक्टीरिया मरीजों के खून तक कैसे पहुंचा, तो दो सबसे बड़े मार्ग सामने आए:

  1. फेफड़ों का संक्रमण (निमोनिया): लगभग 51 फीसदी मरीजों में यह बैक्टीरिया सबसे पहले फेफड़ों के रास्ते दाखिल हुआ। वेंटिलेटर पर रहने वाले मरीजों में 'वेंटिलेटर एसोसिएटेड निमोनिया' (VAP) के जरिए यह श्वसन नली से होते हुए रक्तप्रवाह (Bloodstream) तक पहुंच गया।

  2. कैथेटर और आईवी लाइन (Catheter Associated): करीब 29 प्रतिशत मामलों में संक्रमण की सीधी वजह नस में लगी कैथेटर नली बनी। कैथेटर वह प्लास्टिक की पतली नली होती है जिसका उपयोग मरीज को ड्रिप, जरूरी तरल पदार्थ और दवाएं देने या यूरिन पास कराने के लिए किया जाता है। यदि कैथेटर लगाते समय या उसकी देखभाल में स्टेरलाइजेशन (रोगाणुनाशन) के कड़े नियमों का पालन न किया जाए, तो यह नली सीधे बैक्टीरिया को खून में प्रवेश करा देती है।

अस्पतालों की लापरवाही पर विशेषज्ञ डॉक्टरों की कड़ी चेतावनी

संक्रामक रोग विशेषज्ञों का कहना है कि यह रिपोर्ट पूरे हेल्थकेयर सिस्टम के लिए खतरे की घंटी है। अस्पतालों में बायो-मेडिकल वेस्ट का सही निस्तारण न होना, उपकरणों को पूरी तरह से विसंक्रमित (Sterilize) न करना, और डॉक्टरों व नर्सिंग स्टाफ द्वारा बार-बार दस्ताने न बदलना या हाथों को सही ढंग से सैनिटाइज न करना संक्रमण की चेन को बढ़ावा देता है।

विशेषज्ञों का जोर है कि आईसीयू और वेंटिलेटर यूनिट्स में कड़े प्रोटोकॉल लागू किए जाने चाहिए। बिना सही कल्चर टेस्ट के अंधाधुंध ब्रॉड-स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक्स देने की आदत ने बैक्टीरिया को और ज्यादा ताकतवर बना दिया है। जब तक अस्पताल अपनी हाइजीन ऑडिट और संक्रमण नियंत्रण नीतियों को युद्धस्तर पर दुरुस्त नहीं करेंगे, तब तक ऐसे अदृश्य सुपरबग्स के कारण मरीजों की जान पर खतरा मंडराता रहेगा।