'पूर्व CJI चंद्रचूड़ खुद को बहुत महान समझते थे...' सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकीलों ने उठाए गंभीर सवाल
देश की शीर्ष अदालत के 50वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में दो साल का लंबा कार्यकाल पूरा करने वाले जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ भारतीय न्यायिक इतिहास के सबसे चर्चित और मुखर जजों में गिने जाते हैं। उनके कार्यकाल के दौरान सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग, अदालतों का आधुनिकीकरण, तकनीक का विस्तार और कई ऐतिहासिक संवैधानिक पीठों के फैसले चर्चा का केंद्र बने रहे। हालांकि, उनके पद से हटने के बाद अब सुप्रीम कोर्ट बार और वरिष्ठ अधिवक्ताओं के एक बड़े तबके की ओर से उनके कार्यकाल, कार्यशैली और छवि निर्माण को लेकर खुलकर असंतोष और तीखी आलोचनाएं सामने आ रही हैं।
अदालत के गलियारों और कानूनी मंचों पर कई प्रमुख वकीलों ने यह आरोप लगाया है कि पूर्व सीजेआई की सार्वजनिक छवि और उनके वास्तविक प्रशासनिक कामकाज के बीच एक बड़ा विरोधाभास था। अधिवक्ताओं का कहना है कि जहां एक ओर व्यापक प्रचार-प्रसार और सेमिनारों के जरिए एक प्रगतिशील और महान जज की छवि गढ़ी गई, वहीं दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट के भीतर प्रशासनिक स्तर पर मुकदमों की लिस्टिंग, संवेदनशील याचिकाओं के आवंटन और वकीलों के साथ व्यवहार को लेकर कई गंभीर विसंगतियां बरकरार रहीं।
'धारणा और हकीकत में जमीन-आसमान का फर्क': वकीलों का सीधा प्रहार
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकीलों का मुख्य आरोप इस बात पर केंद्रित है कि जस्टिस चंद्रचूड़ का पूरा ध्यान अपनी न्यायिक बौद्धिकता और मीडिया परसेप्शन (धारणा) को चमकाने पर अधिक रहा। वकीलों के अनुसार, कोर्ट रूम में सुनवाई के दौरान बड़ी-बड़ी लोकतांत्रिक, नागरिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों से जुड़ी मौखिक टिप्पणियां तो खूब की जाती थीं, लेकिन जब अंतिम आदेश या राहत देने की बारी आती थी, तो कई मामलों में नतीजा इसके बिल्कुल उलट होता था।
वरिष्ठ अधिवक्ताओं का तर्क है कि अदालतें केवल भाषणों, व्याख्यानों और दार्शनिक उद्धरणों से नहीं चलतीं, बल्कि उनकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि आम नागरिक को त्वरित, निष्पक्ष और ठोस न्याय मिल रहा है या नहीं। कई मामलों में गंभीर जमानत याचिकाओं और नागरिक अधिकारों से जुड़े मुकदमों को महीनों तक सुनवाई के लिए सूचीबद्ध न किए जाने को लेकर बार के सदस्यों में भारी नाराजगी देखी गई।
रोस्टर प्रणाली और केस लिस्टिंग पर खड़े किए सवाल
वकीलों द्वारा उठाए गए आरोपों में सबसे बड़ा और संवेदनशील मुद्दा 'मास्टर ऑफ रोस्टर' (Master of Roster) की शक्तियों के इस्तेमाल से जुड़ा है:
-
संवेदनशील मुकदमों का आवंटन: अधिवक्ताओं ने आरोप लगाया कि राजनीतिक और संवेदनशील मामलों को वरिष्ठता क्रम को दरकिनार करते हुए चुनिंदा बेंचों के पास भेजने की परंपरा उनके कार्यकाल में भी पूरी तरह पारदर्शी नहीं हो सकी।
-
लिस्टिंग की अनिश्चितता: बार के कई प्रमुख सदस्यों ने सीजेआई को पत्र लिखकर और सार्वजनिक रूप से यह शिकायत की थी कि सुप्रीम कोर्ट की नई रजिस्ट्री प्रणाली के बावजूद महत्वपूर्ण मामलों की लिस्टिंग में भारी अनियमितताएं रहीं; कुछ मामलों को रातों-रात लिस्ट कर लिया गया, जबकि सामान्य नागरिकों और विचाराधीन कैदियों की अर्जियां महीनों तक दबी रहीं।
-
संवैधानिक पीठों का गठन: यह सवाल भी उठाया गया कि कई दूरगामी प्रभाव वाले संवैधानिक मामलों—जैसे चुनावी बॉन्ड या नागरिकता से जुड़े मुद्दों—पर सुनवाई का समय और प्राथमिकता तय करने में प्रशासनिक संतुलन का अभाव दिखा।
कॉलेजियम और जजों की नियुक्ति पर भी उठे सवाल
सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों में जजों की नियुक्ति और पदोन्नति को लेकर बनी कॉलेजियम प्रणाली के संचालन पर भी कई सवालिया निशान खड़े किए गए हैं। आलोचकों का कहना है कि न्यायपालिका में खाली पड़े पदों को तेजी से भरने और उच्च न्यायपालिका में विविधता लाने के वादे धरातल पर पूरी तरह प्रभावी साबित नहीं हुए।
कई उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों और सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नति को लेकर सरकार और कॉलेजियम के बीच के गतिरोध पर जिस दृढ़ता की उम्मीद बार को थी, उसमें समझौते का भाव देखा गया। इसके अलावा सेवानिवृत्ति के करीब आते-आते धार्मिक और निजी आयोजनों में सरकारी शीर्ष नेतृत्व की मौजूदगी ने भी न्यायिक स्वतंत्रता की स्थापित सीमाओं को लेकर वकीलों के बीच तीव्र असंतोष पैदा किया।
न्यायिक विरासत का निष्पक्ष मूल्यांकन
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी सीजेआई का कार्यकाल केवल उनकी लोकप्रियता या लिखे गए लंबे-चौड़े फैसलों के आधार पर नहीं आंका जा सकता। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने निस्संदेह डिजिटलीकरण, दिव्यांगों के लिए अदालत परिसर की सुगमता और लैंगिक समानता (Gender Neutrality) के क्षेत्र में ऐतिहासिक प्रशासनिक सुधार किए।
किंतु इसके साथ ही, बार के अनुभवी वकीलों द्वारा खुलकर लगाए जा रहे ये आरोप यह दर्शाते हैं कि न्यायिक संस्था के भीतर पारदर्शिता, मामलों के समान आवंटन और संस्थागत गरिमा को बनाए रखने के मोर्चे पर पूर्व सीजेआई की कार्यशैली से बार का एक मजबूत वर्ग असंतुष्ट रहा है। सुप्रीम कोर्ट के भीतर से उठ रही यह आवाज भारतीय न्यायपालिका में आंतरिक सुधारों और सीजेआई की प्रशासनिक शक्तियों की जवाबदेही को लेकर एक नई बहस को जन्म दे रही है।