स्मृति ईरानी की संसद में वापसी की तैयारी? यूपी से राज्यसभा भेजने की अटकलें तेज; क्या फिर बनेंगी केंद्रीय मंत्री?

स्मृति ईरानी की संसद में वापसी की तैयारी? यूपी से राज्यसभा भेजने की अटकलें तेज; क्या फिर बनेंगी केंद्रीय मंत्री?

उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में प्रदेश कोटे की 10 राज्यसभा सीटों को लेकर राजनीतिक सरगर्मी चरम पर पहुंच गई है। इन सीटों पर होने वाले चुनाव के लिए नामांकन प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के खेमे में उम्मीदवारों के चयन को लेकर गहन मंथन जारी है। सबसे बड़ी चर्चा पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा की राष्ट्रीय महासचिव स्मृति ईरानी को लेकर है। राजनीतिक हलकों में यह प्रबल संभावना जताई जा रही है कि भाजपा स्मृति ईरानी को उत्तर प्रदेश से राज्यसभा भेजकर एक बार फिर संसद के उच्च सदन में उनकी वापसी करा सकती है।

यदि स्मृति ईरानी राज्यसभा पहुंचती हैं, तो भविष्य में होने वाले संभावित केंद्रीय मंत्रिमंडल विस्तार में उन्हें दोबारा मंत्री पद की जिम्मेदारी मिलने की अटकलों को भी बल मिल रहा है। साल 2024 के लोकसभा चुनाव में अमेठी सीट से हारने के बाद पार्टी ने उन्हें संगठन में राष्ट्रीय महासचिव बनाकर पहले ही बड़ा कद दिया था, और अब उन्हें विधायी राजनीति में फिर से सक्रिय करने की तैयारी मानी जा रही है।

यूपी से स्मृति ईरानी पर दांव क्यों लगा सकती है भाजपा?

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, स्मृति ईरानी को राज्यसभा भेजने के पीछे भाजपा की एक सोची-समझी रणनीति दिखाई देती है:

  • प्रखर वक्ता और आक्रामक छवि: संसद और मीडिया में विपक्ष, खासकर कांग्रेस पर तीखा प्रहार करने के लिए भाजपा को एक तेज-तर्रार और प्रभावशाली चेहरे की जरूरत हमेशा महसूस होती है। उच्च सदन में स्मृति ईरानी की मौजूदगी से पार्टी का पक्ष और अधिक मजबूती से रखा जा सकेगा।

  • महिला प्रतिनिधित्व का संतुलन: उत्तर प्रदेश से भाजपा की मौजूदा राज्यसभा सांसद सीमा द्विवेदी और गीता शाक्य का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। ऐसे में महिला कोटे और नेतृत्व को बनाए रखने के लिए स्मृति ईरानी सबसे मजबूत और स्थापित चेहरा मानी जा रही हैं।

  • उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय राजनीति में उपयोग: पार्टी नेतृत्व स्मृति ईरानी के संगठनात्मक और प्रशासनिक अनुभव का लाभ केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर लेना चाहता है।

रेस में और कौन-कौन से नाम आगे?

उत्तर प्रदेश की जिन 10 सीटों पर चुनाव होना है, उनमें से मौजूदा संख्या बल के आधार पर भाजपा गठबंधन को 7 से 8 सीटें आसानी से मिलने की उम्मीद है। पार्टी इस बार सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों को साधने के लिए कई नए चेहरों को मौका दे सकती है:

  • हरीश द्विवेदी: डॉ. दिनेश शर्मा को अंडमान-निकोबार का उपराज्यपाल बनाए जाने के बाद खाली हुई सीट और ब्राह्मण कोटे के समीकरण के तहत पूर्व सांसद व राष्ट्रीय पदाधिकारी हरीश द्विवेदी का नाम सबसे आगे चल रहा है।

  • ओबीसी और दलित चेहरे: गीता शाक्य की जगह उनके सजातीय ममतेश शाक्य, पार्टी के ओबीसी मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष प्रकाश पाल और दलित चेहरों में पूर्व डीजीपी बृजलाल के साथ-साथ विद्यासागर की दावेदारी पर भी विचार चल रहा है।

  • वरुण गांधी और संजीव बालियान: पश्चिम यूपी के राजनीतिक संतुलन और जाट समीकरणों को साधने के लिए पूर्व केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान तथा पूर्व सांसद वरुण गांधी के नामों की भी सियासी हलकों में चर्चा है।

  • केंद्रीय मंत्रियों की स्थिति: मौजूदा राज्यसभा सांसदों में शामिल केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा के कार्यकाल को लेकर भी पार्टी आलाकमान विचार कर रहा है कि उन्हें रिपीट किया जाए या नए चेहरों को तरजीह दी जाए।

विधानसभा में संख्या बल: भाजपा का पलड़ा भारी

403 सदस्यीय उत्तर प्रदेश विधानसभा में मौजूदा संख्या बल के अनुसार भाजपा गठबंधन के पास 285 से अधिक विधायकों का समर्थन है (जिसमें भाजपा के साथ अपना दल-एस, रालोद, सुभासपा और निषाद पार्टी शामिल हैं)। वहीं मुख्य विपक्षी समाजवादी पार्टी-कांग्रेस गठबंधन के पास लगभग 103 से 105 विधायक हैं।

इस गणित के आधार पर 10 में से कम से कम 7 से 8 सीटों पर भाजपा गठबंधन की जीत तय मानी जा रही है, जबकि 2 से 3 सीटें सपा के खाते में जा सकती हैं। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के पास पर्याप्त संख्या बल न होने के कारण उच्च सदन में उसका प्रतिनिधित्व समाप्त होने की कगार पर है।

भाजपा की केंद्रीय चुनाव समिति (CEC) जल्द ही उम्मीदवारों के नामों की आधिकारिक सूची पर मुहर लगाएगी। यदि स्मृति ईरानी के नाम पर अंतिम सहमति बनती है, तो न केवल संसद में उनकी धमक दोबारा लौटेगी, बल्कि केंद्र सरकार में उनके संभावित मंत्री बनने का रास्ता भी पूरी तरह साफ हो जाएगा।