'ज्ञानेश कुमार में ऐसा क्या है कि हर किसी पर हमला हो रहा?' अभिजीत दीपके ने मोदी सरकार को घेरा

'ज्ञानेश कुमार में ऐसा क्या है कि हर किसी पर हमला हो रहा?' अभिजीत दीपके ने मोदी सरकार को घेरा

राजधानी दिल्ली के सियासी गलियारों में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर टकराव लगातार बढ़ता जा रहा है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक और राजनीतिक कार्यकर्ता अभिजीत दीपके ने एक बार फिर केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा हमला बोला है। दिल्ली में हालिया विरोध प्रदर्शनों के दौरान विपक्ष के सांसदों, युवा छात्रों और पत्रकारों के साथ पुलिस के कथित दुर्व्यवहार का हवाला देते हुए दीपके ने सीधे तौर पर सवाल उठाया कि ज्ञानेश कुमार में ऐसा क्या खास है कि सरकार उनके बचाव में हर लोकतांत्रिक आवाज को दबाने पर आमादा दिख रही है। हाल ही में दिल्ली पुलिस की हिरासत से रिहा होकर अपने पैतृक गांव पहुंचे दीपके के इस ताजा बयान ने विपक्षी खेमे में हलचल तेज कर दी है और चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर एक नई राष्ट्रीय बहस को जन्म दे दिया है।

मुख्य चुनाव आयुक्त के बचाव में सरकार के रुख पर दीपके का सीधा सवाल

अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया पर अपनी बात रखते हुए बेहद आक्रामक तेवर अपनाए। उन्होंने आरोप लगाया कि राष्ट्रीय राजधानी में कानून-व्यवस्था की आड़ लेकर शांतिपूर्ण आवाज उठाने वालों को कुचला जा रहा है। उन्होंने अपने बयान में कहा कि दिल्ली की सड़कों पर युवाओं को पीटा जा रहा है, पत्रकारों के साथ बदसलूकी हो रही है और यहां तक कि जनता द्वारा चुने गए सांसदों तक को पुलिसिया ज्यादती का सामना करना पड़ रहा है। दीपके ने सवालिया लहजे में पूछा कि ज्ञानेश कुमार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए इतने अपरिहार्य क्यों बन चुके हैं कि उन्हें बचाने की खातिर पूरी व्यवस्था ही जनता और विपक्ष के खिलाफ मोर्चा खोले नजर आ रही है। दीपके का यह सवाल उस समय आया है जब दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर पर प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन को अनुमति देने से इनकार कर दिया था और कई प्रमुख आंदोलनकारियों को हिरासत में ले लिया था।

जंतर-मंतर पर टकराव, हिरासत और हिंगोली तक पहुंचा सियासी घटनाक्रम

इस पूरे विवाद की जड़ें हाल ही में राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शन से जुड़ी हैं। सीजेपी और उसके सहयोगी संगठनों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और कथित अनियमितताओं के विरोध में बड़े पैमाने पर धरने की घोषणा की थी। दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा कारणों और धारा 144 का हवाला देकर प्रदर्शन की इजाजत नहीं दी। इसके बावजूद जब कार्यकर्ता और नेता इकट्ठा होने लगे तो पुलिस ने कड़ा रुख अपनाते हुए अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका समेत कई लोगों को हिरासत में ले लिया। हिरासत के दौरान ही दीपके की दादी का महाराष्ट्र के हिंगोली स्थित पैतृक गांव में निधन हो गया। पुलिस हिरासत से रिहाई मिलने के बाद दीपके सीधे अंतिम संस्कार में शामिल होने हिंगोली पहुंचे। हालांकि, पारिवारिक दुख की इस घड़ी में भी उन्होंने अपने सियासी रुख को कमजोर नहीं होने दिया और वहीं से केंद्र सरकार के खिलाफ अपना तीखा अभियान जारी रखा।

मतदाता सूची और एसआईआर विवाद ने कैसे पकड़ी आग

सीजेपी की तरफ से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ चलाए जा रहे इस अभियान के केंद्र में स्पेशल समरी रिवीजन (SIR) और मतदाता सूचियों में कथित हेरफेर का गंभीर मुद्दा है। संगठन का दावा है कि बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं और पारदर्शी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। आंदोलनकारियों की प्रमुख मांगों में ज्ञानेश कुमार का तत्काल इस्तीफा, मतदाता सूची प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना और मुख्य चुनाव आयुक्त के चयन के लिए स्वतंत्र व निष्पक्ष व्यवस्था सुनिश्चित करना शामिल है। इस मुद्दे ने तब और अधिक तूल पकड़ लिया जब संसद के भीतर और बाहर विपक्षी दलों ने भी चुनाव आयोग की कार्यशैली पर सवाल खड़े करने शुरू कर दिए। महुआ मोइत्रा समेत कई विपक्षी सांसदों ने चुनाव आयोग के मौजूदा नेतृत्व को लेकर सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर खुलकर नाराजगी जताई थी।

सांसदों की सुरक्षा और लोकतांत्रिक मर्यादा पर दीपके की चिंता

अपने हालिया बयान में दीपके ने खासतौर पर सांसदों के साथ हुए कथित व्यवहार को रेखांकित किया है। उनका कहना है कि जब देश की सर्वोच्च पंचायत यानी संसद के सदस्यों को अपनी बात रखने या प्रदर्शनकारियों के हक में खड़े होने पर दिल्ली की सड़कों पर रोका जाता है और उनके साथ धक्का-मुक्की होती है, तो यह लोकतंत्र के बुनियादी ढांचे पर गहरा प्रहार है। दीपके का तर्क है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था को किसी भी प्रकार के राजनीतिक दबाव से पूरी तरह मुक्त और पारदर्शी होना चाहिए। यदि जनता या जन-प्रतिनिधि किसी संवैधानिक पद पर बैठे अधिकारी के निर्णयों पर संदेह व्यक्त करते हैं, तो सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह संवाद स्थापित करे, न कि पुलिसिया बल का इस्तेमाल करके आवाज उठाने वालों को दबाने का प्रयास करे।

दिल्ली पुलिस से नए सिरे से अनुमति मांगने की तैयारी में सीजेपी

हिरासत से रिहा होने के बाद सीजेपी नेतृत्व ने साफ कर दिया है कि वे अपने आंदोलन से पीछे हटने वाले नहीं हैं। पार्टी के नेताओं का कहना है कि उन्होंने किसी भी ऐसे बॉन्ड या अंडरटेकिंग पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं जो उन्हें लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करने से रोक सके। संगठन के प्रमुख नेता आशुतोष रांका के अनुसार वे सोमवार को एक बार फिर दिल्ली पुलिस के अधिकारियों से मिलकर जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण सत्याग्रह और धरने की नई तारीख के लिए विधिवत आवेदन करेंगे। उनका कहना है कि संविधान हर नागरिक को अपनी असहमति दर्ज कराने का अधिकार देता है और वे पूरी तरह शांतिपूर्ण व अनुशासित तरीके से अपनी मांगों को देश के सामने रखेंगे।

चुनाव आयोग की साख और आगे की सियासत का रुख

संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता और निष्पक्षता को लेकर उठ रहे ये सवाल केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रह गए हैं। महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली तक इस मुद्दे ने राजनीतिक रंग ले लिया है। जहां सत्ता पक्ष का मानना है कि चुनाव आयोग पर लगाए जा रहे आरोप राजनीति से प्रेरित हैं और संवैधानिक संस्थाओं की छवि धूमिल करने की साजिश का हिस्सा हैं, वहीं दीपके और उनके सहयोगी इसे स्वतंत्र चुनावों के भविष्य से जुड़ा अस्तित्व का संघर्ष बता रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद अहम होगा कि दिल्ली पुलिस सीजेपी को जंतर-मंतर पर धरने की अनुमति देती है या नहीं। साथ ही, संसद के आगामी सत्रों में विपक्षी दल दीपके द्वारा उठाए गए इन सवालों और सांसदों पर कथित कार्रवाई के मुद्दे को किस स्तर तक आगे ले जाते हैं, इस पर पूरे देश की नजरें टिकी रहेंगी।