अहोई अष्टमी 2026 : संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए व्रत से पहले जुटा लें ये जरूरी सामान
सनातन धर्म में माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, उत्तम स्वास्थ्य, सुरक्षा और उज्ज्वल भविष्य के लिए वर्ष भर कई कठिन व्रत रखती हैं, जिनमें कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को पड़ने वाला अहोई अष्टमी व्रत सबसे प्रमुख और फलदायी माना जाता है। करवा चौथ के ठीक चार दिन बाद आने वाला यह पावन पर्व विशेष रूप से उत्तर भारत के उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और मध्य प्रदेश में अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो माताएं इस दिन निर्जला या फलाहार रहकर विधि-विधान से अहोई माता (देवी पार्वती के मातृत्व स्वरूप) की उपासना करती हैं, उनकी संतानों पर आने वाले समस्त कष्ट, व्याधियां और अकाल मृत्यु का भय स्वतः ही समाप्त हो जाता है। जिन दंपतियों को संतान प्राप्ति में बाधाएं आ रही हों या जिनकी संतानों की कुंडली में बालारिष्ट दोष हो, उनके लिए भी यह व्रत साक्षात संजीवनी के समान फलदायी सिद्ध होता है। इस व्रत की पूजा संध्या काल में की जाती है और इसके लिए अनेक विशेष व पारंपरिक वस्तुओं की आवश्यकता होती है। यदि पूजा की सामग्री अधूरी रह जाए तो विधान में व्यवधान उत्पन्न होता है, इसलिए व्रत रखने वाली माताओं को पूजा के सभी जरूरी सामान समय रहते एकत्र कर लेने चाहिए ताकि पूजन सात्विक और त्रुटिहीन तरीके से संपन्न हो सके।
अहोई माता की पूजा के लिए प्राथमिक सामग्री: गेरू से लेकर चौकी और कलश तक की सूची
अहोई अष्टमी के पूजन को प्रारंभ करने के लिए सबसे पहले पूजा स्थल को तैयार करने से संबंधित वस्तुओं की आवश्यकता होती है। प्राचीन काल से ही घरों में अहोई अष्टमी की सुबह पूजा वाले कमरे की दीवार को लीपकर उस पर गेरू और पिसे हुए चावल के लेप (ऐपन) से अहोई माता का पारंपरिक चित्र उकेरने की प्रथा रही है। इस चित्र में अहोई माता के साथ उनके सात पुत्र, सेही (साही जानवर) और उसकी मांद की आकृतियां बनाई जाती हैं। आधुनिक समय में यदि दीवार पर चित्र बनाना संभव न हो, तो बाजार में मिलने वाला अहोई माता का रंगीन कैलेंडर या पोस्टर लाकर पूजा स्थल की दीवार पर चिपकाया जा सकता है। पूजा के लिए लकड़ी का एक साफ पाटा या चौकी चाहिए, जिस पर बिछाने के लिए बिना कटा-फटा लाल या पीला नया सूती वस्त्र होना अनिवार्य है। माता के सम्मुख स्थापित करने के लिए एक मिट्टी अथवा पीतल का कलश या लोटा चाहिए, जिसमें स्वच्छ जल भरा जाता है। इसके साथ ही कलश के मुख पर रखने के लिए आम या अशोक के पांच पत्ते, नारियल, रोली, कुमकुम, हल्दी की गांठ, बिना टूटे हुए साबुत चावल (अक्षत), कलावा (मौली धागा), चंदन, धूपबत्ती, अगरबत्ती, कर्पूर और अखंड जोत के लिए शुद्ध देसी घी व रुई की बत्तियां तैयार रखनी चाहिए।
स्याहू की माला और चांदी के मनके: अहोई अष्टमी की सबसे पवित्र और अनिवार्य वस्तु
अहोई अष्टमी के पूजन की सबसे विशिष्ट और अनिवार्य सामग्री 'स्याहू' यानी चांदी की अहोई माता की माला होती है। यह चांदी का एक छोटा सा पेंडेंट या लॉकेट होता है, जिसमें अहोई माता और सेही की आकृति अंकित होती है। इस चांदी की अहोई को एक लाल या पीले रंग के कलावे (कच्चे सूत) में पिरोया जाता है। पारंपरिक नियम के अनुसार इस माला में चांदी के दो गोल मनके (दाने) भी डाले जाते हैं। परिवार की परंपरा के अनुसार जितने जीवित पुत्र या संतानें होती हैं, उतने चांदी के दाने इस माला में जोड़े जाते हैं, अथवा विवाह के बाद हर वर्ष व्रत करने पर एक-एक दाना बढ़ाया जाता है। पूजा के समय इस स्याहू की माला को अहोई माता के चित्र के समक्ष रखकर रोली, चावल और दूध से विधिवत पूजा जाता है। जब शाम को पूजा और कथा पूरी हो जाती है तथा तारों को अर्घ्य दे दिया जाता है, तब माताएं इस स्याहू की माला को अपने गले में धारण करती हैं। यह माला संतान की सुरक्षा के लिए एक अभेद्य रक्षा कवच का प्रतीक मानी जाती है, जिसे दिवाली के दिन तक या फिर कुछ क्षेत्रों में भैया दूज तक गले में पहनकर रखने का कड़ा विधान है।
अहोई माता को क्या-क्या चढ़ाएं: पारंपरिक आठ पूड़ी, हलवा, फल और सात्विक भोग
अहोई माता की पूजा में ऋतु फल और पारंपरिक घर में बने व्यंजनों का भोग अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। चूंकि यह पूजा अष्टमी तिथि को होती है, इसलिए भोग की सामग्रियों में 'आठ' की संख्या का विशेष धार्मिक महत्व होता है। भोग के लिए शुद्ध घी में बनी हुई आठ मीठी पूड़ियां या आठ आटे के पुए (गुलगुले) बनाए जाते हैं। कई परिवारों में आठ पूड़ी के साथ सूजी या आटे का शुद्ध देसी घी का हलवा बनाकर अर्पित किया जाता है। इसके अलावा एक कटोरी में उबले हुए सादे चावल और कच्चा गाय का दूध मिलाकर 'दूध-भात' का भोग विशेष रूप से तैयार किया जाता है, जो अहोई माता को अत्यंत प्रिय माना गया है। फलों में जलफल यानी सिंघाड़ा इस दिन अनिवार्य रूप से चढ़ाया जाता है, क्योंकि शरद ऋतु के आगमन पर सिंघाड़ा स्वास्थ्य और शीतलता का प्रतीक होता है। इसके साथ ही साबुत ईख (गन्ना), पत्ते सहित हरी मूली, बेर, मखाना, सीताफल, सेब और अनार जैसे मौसमी फल माता को अर्पित करने के लिए पूजा की थाली में सजाए जाते हैं। ताजे लाल या पीले पुष्प, गेंदे के फूलों की माला और तुलसी दल भी माता की चौकी पर समर्पित किए जाते हैं।
कथा श्रवण और अर्घ्य की सामग्री: गेहूं के दाने, करवे का जल और तारों की उपासना
अहोई अष्टमी के दिन शाम के समय माताएं समूह में बैठकर या परिवार के साथ अहोई माता की व्रत कथा सुनती हैं। कथा सुनते समय हाथ में रखने के लिए गेहूं या ज्वार के सात या आठ साबुत दाने अवश्य होने चाहिए। कथा समाप्त होने के बाद इन दानों को संभालकर रखा जाता है और बाद में तारों को अर्घ्य देते समय या गमले में विसर्जित करने के काम में लाया जाता है। कथा के समय एक मिट्टी के करवे में या लोटे में जल भरकर रखा जाता है। करवा चौथ की तरह ही इस करवे के ढक्कन पर गेहूं के दाने और थोड़ा सा गुड़ रखा जाता है। अहोई अष्टमी का व्रत चंद्रमा के दर्शन से नहीं, बल्कि शाम को आकाश में तारों के उदय होने पर संपन्न होता है। तारों को अर्घ्य देने के लिए एक तांबे या पीतल का लोटा, थोड़ा सा कच्चा दूध, रोली, चावल और एक साफ छलनी या लोटे से सीधे अर्घ्य देने की व्यवस्था रखनी चाहिए। जैसे ही गोधूलि बेला के बाद आकाश में पहले तारे दिखाई देते हैं, माताएं करवे के जल से तारों को अर्घ्य देती हैं, संतान की लंबी उम्र की प्रार्थना करती हैं और उसके बाद ही जल ग्रहण कर अपना व्रत खोलती हैं।
सास के आदर हेतु बायने की सामग्री और अहोई अष्टमी पर ध्यान रखने योग्य नियम
पूजा और अर्घ्य के उपरांत घर के वरिष्ठजनों का आशीर्वाद लेना इस व्रत का अंतिम और अनिवार्य चरण है, जिसे 'बायना निकालना' या 'मनसना' कहा जाता है। सास, जेठानी या किसी आदरणीय बुजुर्ग सुहागिन महिला को भेंट करने के लिए बायने की सामग्री पहले से ही एक थाली में सजाकर रख लेनी चाहिए। इस थाली में एक नई साड़ी या वस्त्र, सुहाग की सामग्री (बिंदी, चूड़ी, सिंदूर, महावर, मेहंदी), सामर्थ्य अनुसार नकद दक्षिणा, आठ पूड़ियां, हलवा और मौसमी फल रखे जाते हैं। पूजा के अंत में इस थाली पर हाथ फेरकर इसे सास के चरण छूकर सादर समर्पित किया जाता है। इस दिन कुछ विशेष सावधानियां बरतना भी अत्यंत आवश्यक है। अहोई अष्टमी के पावन दिन व्रत करने वाली माताओं को किसी भी प्रकार की धारदार वस्तु जैसे चाकू, कैंची, सुई या दरांती का प्रयोग करने से पूर्णतः बचना चाहिए। न तो इस दिन कपड़े सिलने चाहिए और न ही जमीन खोदने का कोई काम करना चाहिए। इसके अलावा भोजन में प्याज, लहसुन या किसी भी प्रकार के तामसिक पदार्थों का प्रवेश घर में वर्जित होना चाहिए। पूर्ण श्रद्धा, सात्विकता और संपूर्ण सामग्री के साथ की गई यह आराधना अहोई माता को प्रसन्न कर आपकी संतान के जीवन को दीर्घायु, विद्या, बुद्धि और अपार ऐश्वर्य से परिपूर्ण करती है।